Thursday, August 18, 2022

WATCH: स्लैब में बिहारी मजदूर ही नहीं, उनके परिवारों के सपने भी दब गये

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Aaquil Jawed
Aaquil Jawed is the founder of The Loudspeaker Group, known for organising Open Mic events and news related activities in Seemanchal area, primarily in Katihar district of Bihar. He writes on issues in and around his village.

ताजीब आलम, मोहम्मद मोबिद, मोहम्मद सोहेल, मोहम्मद शमीम। ये चार नाम उन मजदूरों के हैं, जो अपने परिवार के सदस्यों की जिंदगी थोड़ी बेहतर बनाने या यूं कह लीजिए कि जीने लायक बनाने के लिए अपने घर से 2000 किलोमीटर दूर पुणे गये थे।

उनके परिवार के लोग इस उम्मीद में थे कि वहां से नियमित पैसा आएगा, तो यहां सबकुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि पैसे की जगह उनकी मौत की खबर आएगी।

कटिहार (Katihar News) के रहने वाले आलम, मोबिद, सोहेल और शमीम समेत पांच मजदूरों की पिछले दिनों पुणे (Pune Building Collapse) में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करते हुए स्लैब गिरने से मौत हो गई थी।

मारे गये इन मज़दूरों के परिवार काफी गरीब हैं और पुणे में हुए हादसे के बाद उनके लिए जिंदगी पहाड़ बन गई है।

ताजीब आलम का घर बाहर से जितना बदहाल लग रहा है, अंदर भी उतनी ही बदहाली है। कदवा प्रखंड के मंझोक गांव में महानंदा नदी के किनारे बांध से सटे इस घर के ऊपर हालात ने ऐसी-ऐसी जिम्मेदारियां दी हैं कि कल्पना करना भी मुश्किल है।

ताजीब के पिता शाहिद आलम घर के गार्जियन हैं। उनके घर में कमाने वाले दो बेटे थे। इन्हीं दोनों की कमाई से घर भी चलता था और बच्चों की परवरिश भी होती थी।

मोहम्मद शाहिद आलम के 4 बच्चों के अलावा उनके बड़े भाई के 6 बच्चे भी साथ रहते हैं। 2017 में ठनका गिरने की वजह से शाहिद आलम के बड़े भाई और उनकी पत्नी के साथ एक बच्चे की मौत हो गई थी। तब से ही बड़े भाई के 6 बच्चे (दो बेटा चार बेटी) की जिम्मेदारी शाहिद आलम के सिर पर आ गई। जब उनके बड़े भाई की मौत हुई थी, तब उनकी सबसे छोटी बच्ची सिर्फ 8 महीने की थी। लेकिन, अब ताजीब आलम की मौत ने पिता शाहिद आलम को तोड़ कर रख दिया है।

इनके पास खुद की जमीन भी नहीं है। 2 साल पहले प्रलयकारी बाढ़ ने इनके घर और जमीन को निगल लिया। तब से ये विस्थापितों की जिंदगी जी रहे हैं। मात्र मजदूरी ही जीवनयापन का जरिया है।

ताजीब आलम के भाई मोहम्मद अंजार अभी पुणे में ही थे लेकिन वह दूसरी जगह काम कर रहे थे। मोहम्मद अंजार कहते हैं कि घटना से कुछ देर पहले अपने भाई से फोन पर बात भी की थी। फोन पर ताजीब बता रहा था कि वह जहां काम कर रहा है वहां बहुत खतरा है इसीलिए जल्दी से कहीं दूसरी जगह जाएगा।

मोहम्मद अंजार ने बताया कि जिस जगह यह घटना हुई वहां पर उस दिन सभी नए मजदूरों को भेजा गया था क्योंकि पुराने मजदूरों को खतरे का आभास हो चुका था इसीलिए उस दिन कोई भी पुराना मजदूर काम पर नहीं गया।

अंजार आलम का कहना है कि उनके भाई की मौत नहीं बल्कि हत्या हुई है।

मुआवजे के नाम पर बिहार सरकार की तरफ से 2 लाख रुपए और ठेकेदार की तरफ से एक लाख रुपए मुआवजा मिला है।
लेकिन वह चाहते हैं कि इस लापरवाही की जांच हो और अपराधी को सजा मिले।

झुके हुए खंभों के साथ यह झुका हुआ कच्चा मकान पुणे हादसे में मरने वाले 50 वर्षीय मजदूर मोहम्मद मोबिद का है। मकान बताता है कि मोदी मोबिद के परिवार में गरीबी का क्या आलम है।

मो. मोबिद को एक बेटा और 5 बेटियां हैं। दो बेटियों का निकाह हो चुका है, लेकिन दहेज देना बाकी है। ससुराल वाले दहेज मांग रहे थे और घर की मरम्मत भी करनी थी, इसीलिए मोहम्मद मोबिद पैसे कमाने के लिए पुणे जाने पर मजबूर हुए।

मोहम्मद मोबिद की मां का कहना है कि उनके पांच बेटों में से दो बेटे अब नहीं रहे। सालों पहले उनका एक जवान बेटा इश्तियाक मेले में गया था, लेकिन फिर कभी वह वापस घर नहीं लौटा। और अब एक और बेटा हमसे बिछड़ गया। उनके पति की भी मौत सालों पहले हो चुकी थी। अब वह खुद को बहुत अकेला महसूस करती हैं और अपनी किस्मत पर रो रही हैं।

मोबिद की पत्नी का कहना है कि वह अपने घर को बनाने और उससे भी ज्यादा अपनी बेटियों की शादी करवाने लिए परेशान रहते थे। दहेज में सामान और मोटरसाइकिल की मांग लड़के वालों की तरफ से की जाती थी। खेती-बाड़ी के लिए भी कोई जमीन नहीं होने के कारण वह प्रवासी मजदूर बनने को मजबूर हो गए। ठेकेदार की तरफ से आश्वासन दिया गया है कि जब उनकी बेटी की शादी होगी तो उन्हें आर्थिक मदद दी जाएगी।

आजमनगर प्रखंड के लश्कर बाड़ी गांव के 22 वर्षीय मोहम्मद सोहेल ने भी पुणे हादसे में अपनी जान गंवाई है। मोहम्मद सोहेल के साथ उनके भाई मो. साहिल भी मजदूरी करते थे। हादसे में उनकी जान तो बच गई है लेकिन अभी वह अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। घर में खाने को पैसे नहीं थे और 3 जवान बहन की शादी भी करवानी थी, लेकिन उम्र थी, तो लोगों की सलाह पर उन्होंने आधार कार्ड में उम्र बढ़ा दी थी और पुणे काम करने चले गये थे।

सोहेल के सबसे बड़े भाई की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। पिता की भी मृत्यु बहुत पहले हो चुकी है इसीलिए छोटा होने के बावजूद घर की जिम्मेदारी इन्हीं दोनों भाइयों के कंधे पर आ गई। जिसका निर्वहन वे जिम्मेदारी से कर रहे थे।

मोहम्मद सोहेल की मां का रो रो कर बुरा हाल है‌। वह ठीक से बात भी नहीं कर पा रही है। सोहेल की चाची ने बताया कि दोनों भाई 22 दिन पहले ही काम करने पुणे गये थे। जाने से पहले कह रहा था कि इस बार घर आकर खुद शादी भी करेगा और घर भी बनाएगा।

उनकी चाची का कहना है कि घर का एक बेटा तो खत्म हो चुका है और दूसरा जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है। ऐसे में घर कैसे चलेगा। घायलों को सरकार ने ₹50 हजार रुपए दिये हैं , लेकि इससे परिवार न को कोई फायदा नहीं होगा।

सजाउल आलम भी उसी जगह काम करते थे, लेकिन घटना के वक्त वह कहीं गये हुए थे। जब वापस लौटे तो देखा कि भयावह हादसा हो गया है जिसमें उनके गांव के मोहम्मद सोहेल की मृत्यु हो गई है।

चश्मदीद सजाउल आलम ने कहा कि इंजीनियर द्वारा राॅड बचाने के लिए वेस्ट लोहे को वेल्डिंग कर लगवाया जा रहा था, इसलिए यह घटना हुई। घटनास्थल पर सेफ्टी का ख़्याल भी नहीं रखा जा रहा था।

मृतकों में शामिल आजमनगर प्रखंड की नेमौल पंचायत के पाचकोनिया गांव निवासी मो. शमीम भी शामिल थे।

उनकी तीन साल की बेटी सानिया फातमा को नहीं मालूम कि अब उनके पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उनकी पत्नी साहेनूर खातून कहती हैं कि बीच-बीच में अपने पिता के पास जाने के लिए रोती है।

मृतक मो. शमीम की पत्नी साहेनूर खातून कहती हैं कि उनकी तीन बेटी और एक बेटा हैं। बड़ी बेटी की उम्र अब शादी की हो चली है। खेती-बाड़ी के लिए कोई जमीन नहीं होने कि वजह से और यहां कोई रोजगार नहीं मिला, तो वह पुणे जाने को मजबूर हो गए। चार महीने पहले पुणे गए थे। जाने से पहले उन्होंने कहा था कि इस बार घर आने के बाद सबसे पहले बड़ी बेटी की शादी करेगा।

मो. शमीम की मां समिदन खातून कहती हैं कि शमीम जब छोटा बच्चा था, तभी उसके पिता की भी मौत हो गई थी। उनके तीन बेटों में से शमीम सबसे ज्यादा जिम्मेदार था।

खुद की जमीन नहीं होने की वजह से वह मजदूरी करने बाहर गया था। वह कहती हैं कि अब खाने के भी लाले पड़ जाएंगे।

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