
बिहार के अररिया ज़िले के फारबिसगंज क्षेत्र में भूजल अब पीने योग्य नहीं रह गया है। दूषित हवा में बदबू और बीमारी के सूक्ष्मजीव मौजूद होने से ग्रामीणों ने अपनी और मवेशियों की तबीयत लगातार बिगड़ते रहने पर ‘मैं मीडिया’ से बातचीत करते हुए इलाक़े के मांस फ़ैक्ट्रियों को जवाबदेह क़रार दिया है।

बिहार में हीट वेव या लू से होने वाली मौतों के आंकड़े अलग-अलग सरकारी दस्तावेज़ों में अलग-अलग नजर आते हैं, जिससे वास्तविक स्थिति को समझना मुश्किल हो जाता है।

मधुबनी जिले के मधवापुर प्रखंड के उतरा गांव के लोगों की दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है। यहां के लोगों के दिन की शुरुआत इस चिंता से होती है कि पीने और दैनिक इस्तेमाल के लिए पानी का इंतजाम कैसे होगा। तकरीबन 300 से अधिक घरों वाले इस गांव में पेयजल की भारी किल्लत है, […]

1990 के दशक के बाद से परिस्थितियां बदलने लगीं। इसके दो कारण बताए जाते हैं। पहला कारण है जलवायु परिवर्तन यानी कि मौसम की अनियमितता और दूसरा कारण है चीनी मिलों का बंद हो जाना।

जूट एक आर्द्र उष्णकटिबंधीय फसल है, जिसे लगभग 2500 मिलीमीटर समान रूप से वितरित वर्षा, 34°C अधिकतम व 15°C न्यूनतम तापमान और लगभग 65% आर्द्रता की आवश्यकता होती है। 15°C से कम या 43°C से अधिक तापमान तथा जलभराव इसकी वृद्धि के लिए हानिकारक हैं।

रेयाजुल जैसे हज़ारो लोग बिहार में वार्षिक बाढ़ विभीषिका का शिकार होते हैं और दशकों के इंतज़ार के बाद भी उनका पुनर्वास नहीं हो पाता है। सहरसा जिले में कोसी नदी हर साल अपने रौद्र रूप से तबाही मचाती है।

बिहार के अरवल ज़िले में जहां कभी बुद्ध के शिष्य मूँग-दाल और मरुआ खाकर उनकी वाणी लोगों तक ले जाते थे और जहां कभी आर्यभट्ट ने दाल-रोटी खाई थी - क्या है वहाँ के दलहन उगाने वाले किसानों का हाल ? क्या है दलहन का हाल

दशकों से मुज़फ्फरपुर भारत की लीची राजधानी के तौर पर जाना जाता रहा है। यहां के कांटी गांव का भी लीची उत्पादन में अहम योगदान रहा है। लेकिन अब यहां के किसान दो तरफा परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

“मकई काफी पौष्टिक होती है। हमारे लिए यह एक फसल है, लेकिन हाथियों के लिए यह भोजन है। वह यह नहीं देखते कि यह जंगल में उगा है या इंसानों द्वारा — उनके लिए यह सिर्फ खाने का स्रोत है।"

वेटलैंड पोर्टल पर बिहार के 71 हेल्थ कार्ड अपलोड किए गए हैं। बिहार में मौजूद छह रामसर स्थलों में से, पोर्टल पर केवल दो स्थलों कबरताल और गोगाबिल के हेल्थ कार्ड उपलब्ध हैं।

बिहार में खुले वन (लगभग 4.1 प्रतिशत) सबसे अधिक हैं, इसके बाद मध्यम घने वन (करीब 3.5 प्रतिशत) आते हैं, जबकि अत्यंत सघन वन केवल लगभग 0.4 प्रतिशत ही हैं। यानी राज्य में ज्यादातर वन ऐसे हैं जहां पेड़ों की सघनता कम है, जबकि घने और बेहतर गुणवत्ता वाले जंगल बहुत सीमित हैं।

बिहार के किशनगंज जिले के किसान मोहम्मद नइमुद्दीन ने तीन एकड़ जमीन में मक्का की खेती की थी, जिस पर करीब तीन लाख रुपये का खर्च आया। यह रकम उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिए कर्ज लेकर लगाई थी। फसल कटाई के लिए तैयार थी, लेकिन एक रात आई आंधी और बारिश ने सब […]