
AIMIM की जीत कितनी धमाकेदार है इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं कि AIMIM के सभी पांच प्रत्याशी 23,000 से ज़्यादा वोटों के मार्जिन से जीते हैं, पार्टी के दो अन्य उम्मीदवार करीबी मुक़ाबले में दूसरे स्थान पर रहे, उसके अलावा दो उम्मीदवार 22% से ज़्यादा वोट लाये और दो अन्य उम्मीदवार 11% से ज़्यादा वोट लाकर तीसरे स्थान पर रहे।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सीमांचल के जिलों में एनडीए और महागठबंधन के साथ-साथ जन सुराज और एआईएमआईएम समेत कई दलों के उम्मीदवार मैदान में हैं।

क्या जन सुराज ने महागठबंधन से ज़्यादा मुसलमानों को टिकट दिया?

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में भी सात महिलाओं को टिकट दिया था, लेकिन साल 2020 के विधानसभा चुनाव में महज एक महिला को टिकट मिला था। लेकिन कोई भी महिला जीत नहीं सकी।

गोपाल पिछले तीन विधानसभा चुनावों में लगातार हार का सामना कर चुके हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में 5वीं तक की पढ़ाई कर पाने वाले बच्चों की संख्या कुल आबादी का महज 22.67 प्रतिशत है। वहीं, महज 14.71 प्रतिशत लोग ही 10वीं तक पढ़ पा रहे हैं।

अनूप लाल मंडल, केवर्त समाज से आते हैं, जिनकी बिहार में अनुमानित आबादी लगभग 2.65 लाख है। हालांकि, केवर्त समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि नीतीश सरकार ने जातिगत सर्वेक्षण में केवर्त समाज को कई हिस्सों में बांट दिया, जिसकी वजह से उनकी आबादी कम दिख रही है।

बीजद और राजद नेताओं की प्रतिक्रिया में थोड़ा अंतर है। जहां बीजद के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर पांडियन की तीखी आलोचना की, वहीं, राजद के भीतर से संजय यादव के खिलाफ बयानबाजी सिर्फ लालू यादव के परिवार से ही हो रही है। उनके कुनबे के बाहर के नेताओं की तरफ से अब तक उनके खिलाफ सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है।

29 अगस्त को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना शुरू करने का ऐलान किया।

बिहार में SIR की प्रक्रिया में भारी गड़बड़ियां सामने आई हैं, जहां कटिहार के नेटू आलम जैसे जीवित लोग आधिकारिक रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिए गए हैं। रौशनी जैसी मजदूर महिलाएं कागज़ात बनवाने के लिए हफ़्तों भटक रही हैं, बदरुद्दीन को डर है कि कहीं उन्हें विदेशी न करार दे दिया जाए, और मजुना खातून डेढ़ महीने से प्रपत्र खोज रही हैं।

इन दोनों मामलों में जिस तरह सत्ताधारी दल से नजदीकी होते ही उच्च अदालत ने संगीन मामलों में भी संदेह का लाभ देते हुए दोनों नेताओं को बरी कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सत्ताधारी पार्टियां न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं?

कैम्प के बाहर खड़े 75 साल के अनिसुर रहमान घुसपैठ वाले बयान से खासा नाराज नजर आये। कटिहार के सिम्हारिया निवासी अनिसुर रहमान सवाल पूछते हैं, "हमलोगों के दादा-परदादा यहीं रहते रहते गुज़र गए... अभी हमलोग कैसे घुसपैठी बन गए?"