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जातीय जनगणना में गरीबों के कच्चे मकानों को पक्का न बताए सरकार: अख्तरुल ईमान

एक प्रेस वार्ता के दौरान अख्तरुल ईमान ने कहा कि जातीय जनगणना के तहत भवनों की गणना में कंडिका आठ, छह और कंडिका आठ, सात में बड़ी त्रुटि रह गयी है।

syed jaffer imam Reported By Syed Jaffer Imam |
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एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने बिहार में चल रही जातीय जनगणना का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश इंडिया में 1931 में जातीय जनगणना हुई थी, जिसके आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण के मामले तय पाए थे। “साल 1951 में जातीय जनगणना करवाई गई थी लेकिन किसी कारण वर्ष वह प्रकाशित नहीं हो पाई थी। इस समय केंद्र सरकार की इच्छा के खिलाफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना कराने का फैसला लिया। हमारी पार्टी इसका समर्थन करती है,” उन्होंने कहा।

समर्थन देने के बावजूद अख्तरुल ईमान ने इस पर सवाल भी खड़े किये हैं। उन्होंने कहा कि पांच सौ करोड़ से अधिक की राशि खर्च कर जनगणना का कार्य किया जा रहा है। बिहार के आम लोगों के खून और पसीने के पैसे से यह जनगणना हो रही है। वह चाहते हैं कि इस गणना में सिर्फ जाति की जनगणना ना हो, बल्कि उनका सामाजिक और आर्थिक मूल्यांकन भी किया जाए।

एक प्रेस वार्ता के दौरान अख्तरुल ईमान ने कहा कि जातीय जनगणना के तहत भवनों की गणना में कंडिका आठ, छह और कंडिका आठ, सात में बड़ी त्रुटि रह गयी है। गरीबों के जर्जर दीवार और बगैर पक्के की छत वाले मकान को भी पक्के मकान में शुमार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पक्का मकान 2011 अधिनयम के तहत पक्की छत विहीन व पक्की दीवारों वाले मकान को कच्चा मकान माना गया है। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की साझा आपदा नियमावली में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि बिना पक्की छत वाले सभी मकान कच्चे मकान कहलाएंगे।


अख्तरुल ईमान का मानना है कि कच्चे मकानों की गलत गणना होने से इसका प्रभाव आगे चलकर आर्थिक सर्वेक्षण और उससे बनने वाली योजनाओं पर पड़ेगा। इसके लिए उन्होंने बिहार सरकार से जातीय जनगणना की निर्देशिका में सुधार कर बिना पक्की छत वाले तमाम मकानों को कच्चा मकान घोषित करने की मांग की है।

एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समाधान यात्रा पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “किसी बीमार को सेहतमंद होने का सर्टिफिकेट देना उस बीमार के साथ दुश्मनी है। मुख्यमंत्री समाधान यात्रा में आ रहे है, समाधान किसका होता है? समस्याओं का, जिसका पहले ही समाधान हो चुका है उसका समाधान नहीं, लोकार्पण कर सकते हैं।”

“अगर जिला प्रशासन ऐसा कर रहा है तो यह दोषी है या शायद वहीं से यह निर्देश है कि इसी बहाने चमकते हुए शहरों को दिखाया जाए। जैसे मोदी जी ने अमेरिका के सदर के आने पर ग़रीबों की बस्तियों को छुपाने के लिए एक दीवार बना दी थी। अगर ये भी वही करना चाहते हैं तो आलोचना के पात्र हैं ये लोग। आप समाधान यात्रा में आ रहे हैं तो इलाके की समस्याओं को देखें, जिसका समाधान हो चुका है वह देखना ज़रूरी नहीं है” अख्तरुल ईमान कहते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि सीमांचल में बाढ़ प्रभावित इलाकों में लगभग 5,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं। उस पर सरकार ने अब तक क्या किया। नगर क्षेत्र में 2017 में माझिया पल टूट गया, अब तक उसके लिए कुछ नहीं किया गया।

उन्होंने इस मौके पर 2024 लोकसभा चुनाव में एआईएमआईएम द्वारा सीमांचल की कई सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही। साथ ही साथ दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक आबादी की आवाज़ उठाने वाले तमाम राजनीतिक पार्टियों को साथ में आकर चुनाव लड़ने की उम्मीद ज़ाहिर की।

उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर किए गए एक सवाल के जवाब में कहा, “बीजेपी से अलग रहकर अगर कोई बिहार का बेटा प्रधानमंत्री की लड़ाई में आगे है, तो मैं समझता हूं कि बिहार वासियों को उसका समर्थन करना चाहिए।”

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सैयद जाफ़र इमाम किशनगंज से तालुक़ रखते हैं। इन्होंने हिमालयन यूनिवर्सिटी से जन संचार एवं पत्रकारिता में ग्रैजूएशन करने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी पत्रकारिता (पीजी) की पढ़ाई की। 'मैं मीडिया' के लिए सीमांचल के खेल-कूद और ऐतिहासिक इतिवृत्त पर खबरें लिख रहे हैं। इससे पहले इन्होंने Opoyi, Scribblers India, Swantree Foundation, Public Vichar जैसे संस्थानों में काम किया है। इनकी पुस्तक "A Panic Attack on The Subway" जुलाई 2021 में प्रकाशित हुई थी। यह जाफ़र के तखल्लूस के साथ 'हिंदुस्तानी' भाषा में ग़ज़ल कहते हैं और समय मिलने पर इंटरनेट पर शॉर्ट फिल्में बनाना पसंद करते हैं।

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