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जातिगत जनगणना क्या होती है? इसके क्या फ़ायदे, क्या नुक़सान हैं?

भारत में आखिरी बार जाति के आधार पर जनगणना ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1931 में हुई थी। इसके बाद 1941 में भी जातिगत जनगणना हुई, लेकिन इसके आंकड़े पेश नहीं किए गए थे।

Ariba Khan Reported By Ariba Khan |
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खबरों में क्यों ?

लंबे समय से चली आ रही मांग और कड़े सियासी दांव पेच के बाद बिहार में आखिरकार जातिगत जनगणना का काम शुरू हो गया है। 7 जनवरी 2023 से नीतीश सरकार ने बिहार में जातिगत जनगणना का काम शुरू किया है। जातियों की गिनती का काम दो चरणों में पूरा होगा। पहले चरण में घरों की गिनती होगी और दूसरे चरण में जातियों को गिना जाएगा।

बता दें कि बिहार सरकार लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग कर रही थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 18 फरवरी 2019 और फिर 27 फरवरी 2020 को जातीय जनगणना का प्रस्ताव बिहार विधानसभा और विधान परिषद में पास कराया था। हालांकि, केंद्र सरकार इसके खिलाफ रही है। केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर साफ कर दिया था कि जातिगत जनगणना नहीं कराई जाएगी।

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राष्ट्रीय स्तर पर जनगणना से इनकार के बाद बिहार सरकार ने बिहार में जातिगत जनगणना कराने का निर्णय लिया। इसकी जिम्मेदारी सामान्य प्रशासन विभाग को दी गई है और इसी साल मई तक जातिगत जनगणना का काम पूरी तरह निपटाने का लक्ष्य रखा गया है।


ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर जातिगत जनगणना क्या होती है ? इसका इतिहास क्या है, इसके क्या फायदे और नुकसान क्या हैं, तथा बिहार में इसका खास महत्व क्यों है? यह सब आपको बताने की कोशिश करेंगे आज के इस खास वीडियो में।

जातिगत जनगणना क्या होती है ?

भारत में हर 10 साल में एक बार जनगणना की जाती है। इससे सरकार को विकास योजनाएं तैयार करने में मदद मिलती है। किस तबके को कितनी हिस्सेदारी मिली, कौन हिस्सेदारी से वंचित रहा, इसके माध्यम से इन सब बातों का पता चलता है। जातिगत जनगणना से आशय यह है कि जब देश में जनगणना की जाए तो इस दौरान लोगों से उनकी जाति भी पूछी जाए। इससे देश की आबादी के बारे में तो पता चलेगा ही, साथ ही इस बात की जानकारी भी मिलेगी कि देश में कौन सी जाति के कितने लोग रहते है। सीधे शब्दों में कहें तो जाति के आधार पर लोगों की गणना करना ही जातीय जनगणना होता है।

आखिरी बार कब हुई थी जातिगत जनगणना ?

भारत में आखिरी बार जाति के आधार पर जनगणना ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1931 में हुई थी। इसके बाद 1941 में भी जातिगत जनगणना हुई, लेकिन इसके आंकड़े पेश नहीं किए गए थे। अगली जनगणना 1951 में हुई लेकिन तब तक देश आजाद हो चुका था और आजादी के बाद इस जनगणना में सिर्फ अनुसूचित जातियों और जनजातियों को ही गिना गया। मतलब देश की आजादी के बाद साल 1951 में अंग्रेजों की दी हुई जातिगत जनगणना की नीति में बदलाव कर दिया गया, जो साल 2011 में की गई आखिरी जनगणना तक जारी रहा।

इसी बीच साल 1990 में केंद्र सरकार ने मंडल आयोग की एक सिफारिश को लागू किया था। इसके अंतर्गत पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27% आरक्षण देने की बात थी। इस फैसले ने भारत, खासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया।

जानकारों का मानना है कि भारत में ओबीसी आबादी कितनी प्रतिशत है, इसका कोई ठोस प्रमाण फिलहाल नहीं है। मंडल कमीशन के आंकड़ों के आधार पर कहा जाता है कि भारत में ओबीसी आबादी 52 प्रतिशत है। हालांकि, मंडल कमीशन ने साल 1931 की जनगणना को ही आधार माना था। केंद्र सरकार अभी भी जाति के आधार पर कई नीतियां तैयार करती है, जिसका आधार 1931 की जनगणना है। ताजा उदाहरण नीट परीक्षा का ही है, जिसमें मोदी सरकार ने ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने की बात कही है।

कैसे होगी जनगणना ?

फिलहाल बिहार में की जा रही इस जातिगत जनगणना को दो चरणों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। 7 जनवरी से शुरू हुए पहले चरण में करीब 5.18 लाख सरकारी कर्मचारी 2 करोड़ 58 लाख 90 हजार 497 परिवारों तक पहुंचेंगे। यह चरण 21 जनवरी तक चलेगा, जिसमें सभी आवासीय परिसरों की गिनती होगी। उनमें रहने वाले परिवारों के मुखिया का नाम अंकित होगा और परिवार के सभी सदस्यों की जानकारी रजिस्टर में दर्ज की जाएगी। इसके अलावा सभी मकानों को राज्य सरकार की तरफ से एक मकान नंबर दिया जाएगा।

दूसरे चरण में एक से 30 अप्रैल तक जाति और आर्थिक जनगणना का काम होगा। इसमें लोगों के शिक्षा का स्तर, नौकरी के प्रकार जैसे – प्राइवेट, सरकारी, गजटेड, नॉन-गजटेड आदि के बारे में पूछा जाएगा। घर में कौन सा वाहन है, कितने और कौन से मोबाइल फोन हैं, किस काम में दक्षता है, आय के अन्य साधन क्या हैं, परिवार में कितने कमाने वाले सदस्य हैं, एक व्यक्ति की कमाई पर कितने लोग आश्रित हैं, मूल जाति और उपजाति क्या है, गांव में जातियों की कितनी संख्या है, यह सब बातें पूछी जाएंगी। साथ ही जाति प्रमाण पत्र से जुड़े सवाल भी पूछे जाएंगे।

जाति और आर्थिक जनगणना कराने की जिम्मेदारी बिहार के सामान्य प्रशासन विभाग को दी गई है। इसके लिए जिला स्तर पर डीएम ने नोडल पदाधिकारी नियुक्त किए हैं। बात करें इसमें आने वाले खर्च की, तो जातीय जनगणना के लिए 500 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है जो बढ़ भी सकता है।

जातीय जनगणना के समर्थन में तर्क

तार्किक ढंग से अगर देखा जाए तो जातिगत जनगणना के फायदे और नुकसान दोनों ही हैं। जो लोग जातिगत जनगणना के समर्थन में हैं इसके फायदे गिनाते हुए कुछ तर्क देते हैं।

उनका मानना है कि नए आंकड़े जाति के संदर्भ में स्पष्ट जानकारी देने का काम करेंगे। अभी के दौर में बिहार में अलग-अलग जातियां अपनी तादाद को करीब-करीब कहकर बताती हैं। जैसे यादव करीब 16 फीसदी हैं तो ब्राह्मण तकरीबन 6 फीसदी। लेकिन इस जनगणना के बाद तस्वीर एकदम साफ हो जाएगी। ‘करीब-करीब’ का फासला बिल्कुल ही खत्म हो जाएगा।

इसके अलावा जातीय जनगणना से सरकार को विकास की योजनाओं का खाका तैयार करने में मदद मिलेगी। राज्य के विकास के लिए सरकार कई तरह की नीतियां बनाती है, लेकिन इसमें जाति के शामिल न होने से कई बार दिक्कत भी सामने आती है।‌ जनगणना से बिहार में विकास का ये पैमाना दुरुस्त हो जाएगा।

तीसरा तर्क यह है कि जातीय जनगणना के बाद यह साफ हो जाएगा कि कौन सी जाति आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ी हुई है। ऐसे में उन जातियों तक इसका सीधा लाभ पहुंचाने के लिए नए सिरे से योजनाएं बनाई जा सकती हैं। उन जातियों को समाज में उचित जगह दिलाने की कोशिश में ये जनगणना मददगार साबित होगी।

विपक्ष का तर्क

लेकिन जो लोग इसके विरोध में हैं वे भी इसके नुकसान गिनाते हुए अपने तर्क पेश करते हैं। उनका मानना है कि एक बार इस जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक हो जाएंगे, तो वो जातियां जो अब पिछड़ी हुई पाई जाएंगी, वे राजनीतिक दलों के सीधे टारगेट पर होंगी। ऐसे में तकरीबन सभी दल सिर्फ उसी वोट बैंक को हासिल करने की होड़ में लग जाएंगे। परिणाम ये होगा कि समावेशी विकास की अवधारणा को गहरी चोट पहुंचेगी।

इसके अलावा जातीय जनगणना से परिवार नियोजन कार्यक्रम को भी नुकसान की आशंका है। जनगणना के बाद अगर किसी जाति या समाज को पता चला कि उनकी तादाद कम है, तो वो अपनी जनसंख्या बढ़ाने की होड़ में लग सकते हैं। जाहिर है कि इसका सीधा असर परिवार नियोजन कार्यक्रम पर पड़ेगा और जनसंख्या को काबू में रखने की कवायद को झटका लग सकता है।

केंद्र सरकार का रुख

आइए अब जानते हैं कि केंद्र सरकार या भाजपा का क्या रुख है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से केंद्र सरकार से राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना की मांग करते रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार जातिगत जनगणना के लिए पहले ही मना कर चुकी है। आज भले ही बीजेपी संसद में इस तरह की जातिगत जनगणना पर अपनी राय कुछ और रख रही हो, लेकिन 10 साल पहले जब बीजेपी विपक्ष में थी, तब उनके नेता ख़ुद इसकी मांग करते थे।

भाजपा नेता, गोपीनाथ मुंडे ने 2011 की जनगणना से ठीक पहले 2010 में संसद में कहा था, “अगर इस बार भी जनगणना में हम ओबीसी की जनगणना नहीं करेंगे, तो ओबीसी को सामाजिक न्याय देने के लिए और 10 साल लग जाएंगे, हम उन पर अन्याय करेंगे।”

इतना ही नहीं, पिछली सरकार में जब राजनाथ सिंह गृह मंत्री थे, उस वक़्त 2021 की जनगणना की तैयारियों का जायज़ा लेते समय 2018 में एक प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने माना था कि ओबीसी पर डेटा नई जनगणना में एकत्रित किया जाएगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि सत्ता में आते ही पार्टियां इस तरह की जनगणना के खिलाफ क्यों हो जाती हैं?

इसको इस तरह समझते हैं कि मान लीजिए जातिगत जनगणना होती है तो अब तक की जानकारी में जो आंकड़े हैं, वे ऊपर नीचे हो सकते हैं। फर्ज कीजिए कि ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत से घटकर 40 फीसदी रह जाती है, तो हो सकता है कि राजनीतिक पार्टियों के ओबीसी नेता एकजुट हो कर कहें कि ये आँकड़े सही नहीं हैं। अब मान लीजिए इनका प्रतिशत बढ़ कर 60 हो गया, तो इस जाति की रहनुमाई करने वाले नेता कहेंगे कि उनका आरक्षण प्रतिशत बढ़ाया जाए।

इन सबको देखते हुए बिहार की जातिगत जनगणना पर राजनीतिक दलों की गहरी नज़र है। माना जा रहा है कि इस जनगणना के जरिए कमंडल की राजनीति यानी दक्षिणपंथी राजनीति का मुकाबला करने के लिए जातिगत राजनीति को मजबूत किया जाएगा।

बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि इस जातिगत जनगणना का बिहार और देश की राजनीति पर क्या असर होता है।

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अरीबा खान जामिया मिलिया इस्लामिया में एम ए डेवलपमेंट कम्युनिकेशन की छात्रा हैं। 2021 में NFI fellow रही हैं। ‘मैं मीडिया’ से बतौर एंकर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट जुड़ी हैं। महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर खबरें लिखती हैं।

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