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राज्य सूचना आयोग खुद कर रहा सूचना के अधिकार का उल्लंघन

सूचना का अधिकार कानून, जिसे संक्षेप में आरटीआई भी कहते हैं, आगामी 12 अक्टूबर को अपने अस्तित्व के 18 बसंत पूरे करने वाला है। बिहार राज्य सूचना आयोग और तमाम लोक सूचना प्राधिकार उम्र के इसी दहलीज पर हैं।

Novinar Mukesh Reported By Novinar Mukesh |
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सूचना का अधिकार कानून, जिसे संक्षेप में आरटीआई भी कहते हैं, आगामी 12 अक्टूबर को अपने अस्तित्व के 18 बसंत पूरे करने वाला है। बिहार राज्य सूचना आयोग और तमाम लोक सूचना प्राधिकार उम्र के इसी दहलीज पर हैं। यह कानूनी व्यस्कता की उम्र मानी जाती है। सामान्य रूप से उम्र के इस पड़ाव पर परिपक्वता आनी शुरू हो जाती है। शासन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और लोकतंत्र में नागरिकों की सहभागिता बढ़ाने के आदर्शों को ध्यान में रख कर भारतीय संसद द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारतीय संसद में पारित किया गया था।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत कोई भी नागरिक सरकार द्वारा वित्त पोषित विभागों, संस्थाओं से 150 शब्दों में किसी सूचना की मांग कर सकता है जिसे मुहैया कराना लोक सूचना पदाधिकारी की हैसियत से काम कर रहे अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

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इस अधिनियम की धारा 4(1)(ख) व 4(2) के तहत कानून लागू होने के 120 दिन के भीतर सभी लोक प्राधिकारियों द्वारा लोक सूचना प्राधिकारियों के नाम, पदनाम और अन्य जानकारी प्रकाशित किए जाने और हर साल अपडेट करने का प्रावधान है।


सूचना प्राप्ति में आवेदकों को होने वाली दिक्कतें

अस्तित्व में आने से लेकर अब तक सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के जरिये नागरिकों ने तमाम तरह की सूचनाएँ प्राप्त कीं। अपनी भूमि के अधिकार अभिलेख (खाता-खतियान) से जुड़ी सूचनाएँ, जमाबंदी, बन्दोबस्ती, कल्याण योजनाओं, सरकारी निर्माण, चुनाव आदि से जुड़ी सूचनाओं को पाने के लिए नागरिक आगे आते रहे और लोक सूचना पदाधिकारियों को वो सूचनाएँ साझा करनी पड़ीं। इसका दूसरा पहलू यह है कि इस अधिनियम के इस्तेमाल से कई गड़बड़ियाँ भी उजागर हुईं और कई बार लोक सूचना अधिकारियों द्वारा सूचना नहीं देने, सूचना छिपा लेने, गलत सूचना दे देने की बातें भी सामने आई।

लोक सूचना पदाधिकारी द्वारा आवेदनों के ट्रांसफर में देरी

सीमांचल के कई लोक प्राधिकारी इस अधिनियम के तहत भेजी जाने वाली सूचना को 30 दिनों की तय समयसीमा बीत जाने के बाद भेजते हैं। कुछ मामलों में लोक सूचना प्राधिकारों द्वारा आवेदनों के ट्रांसफर में समयसीमा का ध्यान नहीं रखा जाता।

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सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6, आवेदनों के ट्रांसफर की स्पष्ट समयसीमा का जिक्र करती है। धारा 6 यह व्यवस्था करती है कि आवेदक द्वारा गलत विभाग से माँग ली गई सूचना का आवेदन रद्द नहीं किया जाएगा। इन आवेदनों को उपयुक्त लोक सूचना प्राधिकारों को ट्रांसफर कर दिया जाएगा। किसी भी लोक प्राधिकार द्वारा अंतरण योग्य आवेदन की प्राप्ति के पाँच दिन की समय सीमा में उसे सम्बन्धित लोक सूचना प्राधिकारों को अंतरित कर दिया जाना है।

सीमांचल में आरटीआई से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं

करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी अंचल, प्रखंड, अनुमंडल व जिला स्तर पर कई विभागों के कार्यालय हैं, जहाँ सूचना पट्ट (नोटिस बोर्ड) संधारण की परम्परा नहीं है। जहाँ है, वहाँ भी सम्बन्धित लोक सूचना पदाधिकारी और अपीलीय प्राधिकार का नाम, पता सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए उपलब्ध नहीं है। इससे अंचल कार्यालय, प्रखंड कार्यालय, अनुमंडल कार्यालय, विभागीय कार्यालय, समाहरणालय आदि से जुड़े कामों, सुविधाओं के लिए लोगों को भटकना पड़ता है। सीमांचल के नागरिकों की अशिक्षा इस लाचार स्थिति को बढ़ावा ही देती है।

अधिकांश विभागों की वेबसाइट और जिलों की आधिकारिक वेबसाइट पर विभाग अथवा जिला क्षेत्रांतर्गत सभी लोक सूचना पदाधिकारी व अपीलीय प्राधिकार की सूचना उपलब्ध नहीं है।

राज्य सूचना आयोग का प्रावधान

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15(1) बिहार राज्य सूचना आयोग के गठन की व्यवस्था करती है। इस निकाय को एक मुख्य सूचना आयुक्त और जरूरत के अनुसार अधिकतम दस राज्य सूचना आयुक्त से मिलाकर बनाए जाने का प्रावधान है। इनकी नियुक्ति एक समिति करती है जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री, विधान सभा में विपक्ष का नेता, मुख्यमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री सदस्य होते हैं।

दो राज्यों के सूचना आयोग की वेबसाइट का तुलनात्मक अध्ययन

आंध्र प्रदेश राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर वर्तमान राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और छह राज्य सूचना आयुक्तों की प्रोफाइल मौजूद है जिसमें उनके नाम, ई मेल, फोन नम्बर्स, सम्पर्क पता, संक्षिप्त परिचय के अलावा करिक्युलम विटाइ यानी सीवी तक अपलोडेड है।

वहीं, बिहार राज्य सूचना आयोग में राज्य मुख्य सूचना आयुक्त के एक पद और राज्य सूचना आयुक्तों के तीन पदों का सृजन किया गया है। राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर राज्य मुख्य सूचना आयुक्त नरेन्द्र कुमार सिन्हा और दो राज्य सूचना आयुक्तों ओम प्रकाश व प्रमोद कुमार ठाकुर का एक संक्षिप्त परिचय मौज़ूद है। लेकिन, उनकी ई-मेल आईडी, मोबाइल नंबर, सीवी आदि की जानकारी मौज़ूद नहीं है। बीते साल के अप्रैल माह में फूल चंद्र चौधरी और त्रिपुरारी शरण की नियुक्ति बतौर राज्य सूचना आयुक्त की गई है।

आंध्र प्रदेश राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर जिलावार विभागीय लोक सूचना पदाधिकारियों की सूची खोजे जाने की व्यवस्था की गई है। हालांकि, जिलावार लोक सूचना पदाधिकारियों की खोज करते समय पर्याप्त आंकड़े मौज़ूद नहीं हैं। वहीं, न तो बिहार राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर और न ही सरकारी विभागों की वेबसाइट पर सभी लोक सूचना पदाधिकारियों, अपीलीय प्राधिकारों की सूची मौज़ूद है। हालांकि, एक राज्यादेश के जरिये बिहार में रहने वाले बीएसएनएल बेसिक फोन उपभोक्ताओं के लिए इस अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्ति के लिए कॉल सेंटर की सुविधा मुहैया कराई गई है। लेकिन यह काल सेंटर लम्बे समय से काम नहीं कर रहा है।

आंध्र प्रदेश राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर राज्य मुख्य सूचना आयुक्त सहित सभी आयुक्तों की जानकारी के साथ उनको सौंपे गए विभागों की सूची भी दर्ज़ है। वहीं, बिहार राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर राज्य मुख्य सूचना आयुक्त सहित अन्य सूचना आयुक्तों को आबंटित विभागों की जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 25 के तहत हर साल के अंत में राज्य सूचना आयोग द्वारा एक रिपोर्ट बनाने व उसकी एक प्रति सरकार को भेजे जाने का प्रावधान है। आंध्र प्रदेश राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर साल 2006 से 2014 तक की वार्षिक रिपोर्ट दर्ज़ है। बिहार राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर ऐसी कोई सालाना रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।

आंध्र प्रदेश राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर राज्य मुख्य सूचना आयुक्त सहित सभी सूचना आयुक्त द्वारा पारित निर्णयों की जानकारी अपलोडेड है। बिहार राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर बिहार राज्य सूचना आयोग के महत्तवपूर्ण निर्णयों का एक खंड है, लेकिन इसके तहत लेशमात्र आँकड़े उपलब्ध नहीं है।
हालांकि, ‘’सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम सम्बन्धी निर्गत आदेश’’ खंड के तहत करीब बीते साल की गिनती के निर्णयों की जानकारी उपलब्ध करायी गई है। इसके अतिरिक्त राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर कुछ खंड ऐसे हैं जिन पर जानकारी प्राप्ति की कोशिश का परिणाम घंटों की बफरिंग के रूप में सामने आता है।

सेवानिवृत नौकरशाहों का पार्किंग एरिया

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत दूसरी अपील के लिए बनी राज्य सूचना आयोग को मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्यमंत्री द्वारा नामित मंत्री की समिति सेवानिवृत्त नौकरशाहों के पार्किंग एरिया के रूप में विकसित कर रही है। साल 2006 से 2020 तक के बिहार के सात पूर्व राज्य सूचना आयुक्तों में से छह सेवानिवृत्त नौकरशाह और एक पत्रकार रहे हैं। साल 2006 से 2019 तक बिहार के चार राज्य मुख्य सूचना आयुक्तों में से तीन नौकरशाह और एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश रहे हैं।

 

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को लोकतंत्र का सबसे जरूरी हिस्सा माने जाने वाले नागरिक समूह को सरकारी योजनाओं, कल्याण कार्यक्रमों से अलग रखने की शासकीय परम्परा को समाप्त करने की दिशा में किए गए कारगर उपाय के तौर पर देखा गया।

अस्तित्व में आने के लगभग दो दशक पूरा होने के दौरान सूचना का अधिकार अधिनियम ने नागरिकों को सशक्त करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी सहभागिता बढ़ाई है। इसके बावजूद बिहार में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत गठित शीर्ष निकाय राज्य सूचना आयोग को इस कानून के प्रावधानों के अनुपालन की दिशा में कई काम करने हैं जिनमें से एक है अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर मौज़ूद और अपलोड की जाने वाली सूचनाओं को नियमित अंतराल पर अपडेट करते रहना। इसलिए नागरिकों के अंतिम वर्ग तक सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की सुगम पहुँच बनाने के लिए बिहार राज्य सूचना आयोग को सूचनाओं के सहज प्रकटीकरण या सार्वजनिक करने की दिशा में तेजी से काम करना चाहिए।

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मधेपुरा में जन्मे नोविनार मुकेश ने दिल्ली से अपने पत्रकारीय करियर की शुरूआत की। उन्होंने दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर , एडीआर, सेहतज्ञान डॉट कॉम जैसी अनेक प्रकाशन के लिए काम किया। फिलहाल, वकालत के पेशे से जुड़े हैं, पूर्णिया और आस पास के ज़िलों की ख़बरों पर विशेष नज़र रखते हैं।

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3 thoughts on “राज्य सूचना आयोग खुद कर रहा सूचना के अधिकार का उल्लंघन

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