भारत के कई हिस्सों में नवरात्रि की धूम है. इस दौरान हिंदू देवी दुर्गा की विधिवत पूजा होती है जिन्हें नारी शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है. लेकिन बिहार के विश्व प्रसिद्ध नालंदा ज़िले के एक मंदिर में नवरात्रि के दौरान महिलाओं का ही प्रवेश वर्जित रहता है।

जैनियों के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पावापुरी से लगभग तीन किलोमीटर दूर घोसरावां में मां आशापूरी का पावन धाम है। मां आशापूरी के रूप में देवी दुर्गा की पूजा यहां होती है। लेकिन दुर्गा पूजा के सबसे महत्त्वपूर्ण अवसर यानी कि नवरात्रि के दौरान इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहता है। नवरात्र में इस मंदिर के अंदर महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकतीं, बाहर से ही प्रार्थना करती हैं।

मंदिर में प्रवेश वर्जित क्यों रहता है, इस संबंध में यहां के पुजारी बताते हैं कि नवरात्रि के दौरान मंदिर में तांत्रिक पद्धति से पूजा होती है और इस पूजा पद्धति में महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता है. यहां प्रतिपदा से लेकर दस दिनो तक विज्यादसवी के आरती के पहले तक मंदिर में पूर्ण रूप से प्रवेश वर्जित रहता है क्योंकि यह इलाका पूर्व से ही तांत्रिक का गढ़ माना गया है

पौराणिक प्रथानुसार इस मंदिर का नाम आशापुरी रखा गया क्योंकि यहां बौद्ध काल मे 18 सौ बौद्ध भिक्षु आकर अपनी मन्नत मांगते थे और उनकी मन्नते भी पूरी होती थी तब से लेकर आज तक यहां जो कोई भी भक्त नवरात्र के समय सच्चे मन से माँ आशापुरी की भक्ति करता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

यह प्रथा आज से नही बल्कि आदि अनादि काल से ही चली आ रही है। पूर्वजो के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा घोष के द्वारा करवाया गया था इसीलिए इस गाँव का नाम घोसरावां पड़ा क्योंकि इस इलाके में आशापूरी माँ स्वयं प्रकट हुई थी और जिस स्थान पर प्रकट हुई वहीँ पर मंदिर का निर्माण करवाया गया।

नवरात्र के समय इस घोसरावां मंदिर में बिहार के अलावे कोलकाता, ओड़िसा, मध्यप्रदेश, आसाम, दिल्ली, झारखंड जैसे दूरदराज इलाको से आकर यहां दस दिनों पूजा पाठ करते है। जिससे उनकी मनचाहा मनोकामना पूरा होता है।

बता दें कि मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अब धीरे-धीरे सवाल भी खड़े हो रहे हैं. लोग तर्क देने लगे हैं कि “जब वैष्णो देवी, कामख्या मंदिर जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में महिलाओं पर प्रतिबंध नहीं है तो यहां क्यों?” हालांकि ग्रामीणों में एक डर बैठा है कि अगर परंपरा को बदलने का प्रयास किया गया तो पूरे गांव पर विपत्ति टूट पड़ेगी. लेकिन गांव में कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि किसी ने पहल की हो और फिर कोई अनहोनी हुई हो।

दूसरी ओर, यह परंपरा टूटे, इसमें वैचारिक जड़ता भी एक बाधा दिखाई देती है. संस्कृति का हवाला देते हुए इस परंपरा का महिलाएं और युवा समर्थन करते हैं। बता दें कि महिलाओं पर प्रतिबंध क़ानूनी रुप से भी ग़लत है. लेकिन वे परंपरा के आगे कानून भी ख़ुद को असहाय मानता हुआ दिखता है।