Thursday, January 27, 2022

दिनकर जयंती : राष्ट्र के व्यावहारिक धर्म के गर्जन के कवि थे दिनकर

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आज 23 सितंबर का दिन है। ऐतिहासिक तौर पर आज का दिन कई कारणों से महत्पूर्ण है। बिहार के लिए आज का दिन इस लिए खास है क्यों कि आज ही के दिन बिहार में एक क्रांतिकारी कवि का जन्म हुआ था। जिसने अपने कलम के जादू से ​हिन्दी साहित्य में वो धार पैदा की जिसने अंग्रेजी शासन की चूलें हिला कर रख दीं। हम बात राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कर रहे हैं। आज ही के दिन वर्ष 1908 में सिमरिया में उनका जन्म हुआ था। जब देश गुलाम था तब उन्होंने अपनी कलम से लाखों आजादी के मतवालों में हिम्मत भरी। जब देश आजाद हुआ उसके बाद भी वो सत्ता के सामने अपनी कविताओं से आम लोगों की आवाज बने रहें।

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विद्रोह, क्रांति, श्रृंगार और प्रेम, वे साहित्य के हर विद्या में पारांगत थे। रचनाशीलता उनके अंदर कूट—कूट के भरी थी। उनकी कविताओं में कबीर पंथ की भी छाप दिख जाती थी। यही ​कारण है कि आज के दौर में और मौजूदा माहौल में खासतौर पर दिनकर जी कि प्रासंगिकता बढ़ जाती है। बिहार की राजनीति की ही बात कर लें तो सत्ता और विपक्ष के बीच जो स्थित बनी हुई है। राजनीति के बीच सब अपने अपने को बड़ा दिखा रहे हैं, जनहितैषी बता रहे हैं। लेकिन जनता के पास कोई पूछने नहीं जा रहा। जो वोट मांगने पहुंच रहे हैं जनता उन्हें खदेड़ कर जवाब दे रही है। ऐसे में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता हमारा मार्गदर्शन करती प्रतीत होती है.

आरती लिए तू किसे ढूंढ़ता है मूरख
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में

बात भारत की सुरक्षा की कर लें तो जैसी स्थिति आज बनी है वैसी ही कभी दिनकर जी के जमाने में बनी थी। 1962 में चीनी सेना ने भारत पर आक्रमण किया तो रामधारी सिंह दिनकर के समस्त व्यक्तित्व पर राष्ट्रीयता अत्यन्त उग्र बनकर छा गई थी। 1962 में चीन से मिली हार ने उन्हें पूरी तरह आक्रोशित कर दिया। ऐसे में वे अपनी ही पार्टी कांग्रेस की गलत नीतियों को लेकर मुखर हो गए। ऐसे तो दिनकर जी की तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अच्छे संबध थे। पर चीन से मिली हार ने उन्हें देश के लिए बोलने को विवश कर दिया। उप्न्होंने नेहरू की गलत नीतियों को इसके लिए जिम्मेदार माना। तब दिल्ली के एक कवि सम्मलेन में जब नेहरूजी सीढ़ियां चढ़ते हुए लड़खड़ा गए थे तो तब दिनकर जी उन्हें संभालते हैं। नेहरूजी उन्हें धन्यवाद देते हैं तो दिनकर के मन का गुबार उनकी साहित्यिक भाषा में उभर कर बाहर आता है।

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दिनकर जी तत्काल ही जवाब देते हैं, ‘इसमें धन्यवाद कि क्या आवश्यकता! वैसे भी जब-जब राजनीति लड़खड़ाई है, साहित्य ने ही उसे संभाला है।

दिनकर जी की निर्भीकता, कार्य दक्षता और समर्पण उनकी लेखनी में प्रदर्शित होती है। वे राष्ट्रीय चेतना के कवि थे। औज और पौरुष उनकी लेखनी के गहने थे। यहीं कारण है कि वे राष्ट्र के व्यावहारिक धर्म के गर्जन के कवि के रूप में जाने गए और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कहलाए।

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