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सुपौल: प्रचार प्रसार के अभाव में आश्रय स्थल नहीं पहुंच पा रहे जरूरतमंद

आश्रय स्थल में आने वाले लोगों को एंट्री करनी पड़ती है। एंट्री करने वाली कॉपी में लिखे नाम के मुताबिक, 9 जनवरी को 6, 10 जनवरी को 13 और 11 जनवरी को 12 व्यक्ति ठहरने आए हुए थे। ऐसे ही लगभग प्रत्येक दिन 10-20 लोगों की एंट्री का साइन रहता है, जबकि इसकी क्षमता लगभग 100 लोगों की है।

Rahul Kr Gaurav Reported By Rahul Kumar Gaurav |
Published On :
woman eating food in shelter
आश्रय स्थल में खाना खाती महिला

सुपौल शहर के स्टेशन से लगभग 10 मिनट की दूरी और बस स्टैंड से 5 मिनट की दूरी पर स्थित नगर परिषद कार्यालय के बगल में 2017 में नगर विकास विभाग के द्वारा दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन अंतर्गत 49.33 लाख रुपए की लागत से आश्रय स्थल का निर्माण किया गया था।


इस आश्रय स्थल के निर्माण के छह साल हो चुके हैं। इसके बावजूद जिले के लोगों को इसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। आश्रय स्थल से लगभग 15-20 मिनट की दूरी पर सदर अस्पताल में त्रिवेणीगंज प्रखंड के हरिओम पासवान एडमिट थे। उनके तीन परिजन बाहर चटाई और कंबल के सहारे नीचे सोए हुए थे। जब उनको आश्रय स्थल के बारे में इस रिपोर्टर द्वारा जानकारी दी गई, तब उनके दो परिजन रात में ठहरने के लिए बात करने लगे।

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हरिओम पासवान के बेटे समीर कहते हैं, “हम लोग तीन दिन से सदर अस्पताल में हैं। नीचे ही तीनों रात बिताये हैं। इतना पैसा नहीं है कि होटल कर सकूं। आश्रय स्थल के बारे में भी जानकारी आपसे ही मिली है।”


हरिओम पासवान के परिवार के जैसे ही कई जरूरतमंद परिवारों को आश्रय स्थल के बारे में कोई जानकारी नहीं है। सदर अस्पताल में काम कर रहे राजकुमार भी इस बात को मानते हैं कि अस्पताल में कभी-कभी ज्यादा भीड़ होने की वजह से लोगों को बाहर में रात काटनी पड़ती है।

आश्रय स्थल के बारे कोई प्रचार नहीं

आश्रय स्थल में आने वाले लोगों को एंट्री करनी पड़ती है। एंट्री करने वाली कॉपी में लिखे नाम के मुताबिक, 9 जनवरी को 6, 10 जनवरी को 13 और 11 जनवरी को 12 व्यक्ति ठहरने आए हुए थे। ऐसे ही लगभग प्रत्येक दिन 10-20 लोगों की एंट्री का साइन रहता है, जबकि इसकी क्षमता लगभग 100 लोगों की है।

सुपौल के ही रहने वाले स्थाई निवासी राजन मिश्रा बताते हैं, “सदर अस्पताल के अलावा शहर के रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड में रात को कई लोग ठंड में रात बिताते नजर आ जाते हैं। अगर जानकारी रहेगी तो सदर अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के लोग आश्रय स्थल में ठहरने जरूर जाएंगे। सच पूछिए तो मुझे भी आश्रय स्थल के बारे में कोई जानकारी नहीं है।”

सुपौल में रोटी बैंक के जरिए गरीबों को खाना खिलाया जाता है। इसी रोटी बैंक के सदस्य पंकज झा बताते हैं, “सुपौल छोटा शहर हैं। यहां काम कर रहे मजदूर अगल-बगल की ही होते हैं, जो शाम होते ही अपने घर चले जाते हैं। बड़े शहरों के मुक़ाबले यहां रात में बाहर सोने वाले या जरूरतमंद की संख्या कम रहती है। हालांकि, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सदर अस्पताल में इतनी भीड़ तो जरूर रहती है कि अगर आश्रय स्थल की ठीक से प्रचार प्रसार हो तो 50 से 100 लोग आराम से रहने के लिए चले जाएंगे। सुपौल बड़े स्टेशन में तब्दील हो गया है। इस वजह से आवागमन और ज्यादा हो गया है।”

शहर में होटल में काम कर चुके धीरज बताते हैं, “छोटा शहर होने के बावजूद होटल में भीड़ कम नहीं रहती है। छह विधानसभा का मुख्य शहर सुपौल है। ऐसे में कई लोग कई वजहों और कामों से आते-जाते रहते हैं। ऐसे में रात में मजबूरन उन्हें होटल में ठहरना पड़ता है। जिसमें कई गरीब परिवार के भी होते है। आश्रय स्थल जैसी जगह के प्रचार प्रसार से गरीब परिवारों को होटल का रुपया देना नहीं पड़ेगा।”

जाति गणना सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 39 लाख परिवार झोपड़ी में रहते हैं और 63,840 परिवार बेघर हैं। ऐसे लोगों के लिए इस भीषण सर्दी से बचने में ऐसे आश्रय स्थल मददगार होते हैं।

30 रुपये में खाना, सीसीटीवी से निगरानी

20 जनवरी को 2 बजे आश्रय स्थल में पुरुष कक्ष में तीन लोग ठहरे हुए थे। इसमें दो अभ्यर्थी बीपीएससी एग्जाम काउंसलिंग के लिए आए थे, वहीं एक मजदूर थे। महिला कक्ष में ताला लगा हुआ था। हालांकि मैनेजर के मुताबिक, आश्रय स्थल में अभी 35 से 40 लोग रोज ठहर रहे हैं।

two bpsc exam counselling candidates stayed at the shelter
आश्रय स्थल में दो अभ्यर्थी बीपीएससी एग्जाम काउंसलिंग के लिए आए थे।

मैनेजर ने आगे बताया, “दो मंजिला आश्रय स्थल की इमारत में लगभग 50 से ज्यादा बेड लगाये गये हैं। सबसे ऊपर महिलाएं रहती हैं, वहीं, ग्राउंड और फर्स्ट फ्लोर पर पुरुषों के रुकने के लिए बेड लगाये गये हैं। रहने के लिए एक भी रुपया नहीं देना पड़ता है। नीचे खाने की व्यवस्था भी है। खाना ₹30 प्लेट मिलता है। रोज पांच व्यक्ति को फ्री में खाना खिलाया जाता है। पानी की भी अलग से व्यवस्था है। साथ ही सुरक्षा की दृष्टिकोण से सीसीटीवी कैमरा भी लगा हुआ है।”

नगर मिशन के प्रबंधक रवि शेखर झा विस्तार से बताते हैं, “हम लोग कुछ दिनों के अंतराल में बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन जाकर आश्रय स्थल के बारे में जानकारी देते हैं और लोगों को लाते भी हैं। सदर अस्पताल में ज्यादातर लोग अपने मरीज के साथ ही रहना चाहते हैं, इस वजह से वहां नहीं जाते है। कई जरूरतमंद अगर भोजन का रुपया भी नहीं देते हैं तो उन्हें नगर परिषद के द्वारा खाना खिलाया जाता है। आगंतुक का हम लोग एंट्री जरूर लेते हैं। साथ ही यहां रुकने की वजह पूछते हैं और अगर अगल-बगल के लोग बिना वजह यहां सोने आते हैं, तो हम लोग मना करते हैं।”

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नगर मिशन के प्रबंधक रवि शेखर झा

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एल एन एम आई पटना और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पढ़ा हुआ हूं। फ्रीलांसर के तौर पर बिहार से ग्राउंड स्टोरी करता हूं।

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