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ग्राउंड रिपोर्ट: इस दलित बस्ती के आधे लोगों को सरकारी राशन का इंतजार

सुपौल जिले के वार्ड नंबर 12 की 42 वर्षीय कावो देवी के पति 4 साल पहले गुजर चुके हैं। कावो देवी के तीन बेटे और 2 बेटी हैं। उन्हें राशन कार्ड और विधवा पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है।

Rahul Kr Gaurav Reported By Rahul Kumar Gaurav |
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बिहार के सुपौल जिले की गोढ बरवारी पंचायत के कजरा गांव के वार्ड नंबर 12 की 42 वर्षीय कावो देवी के पति 4 साल पहले गुजर चुके हैं। कावो देवी के तीन बेटे और 2 बेटी हैं। उन्हें राशन कार्ड और विधवा पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है। कावो देवी बताती हैं, “लगभग 14-15 साल की उम्र में ही मेरी शादी हो गई थी। उसके बाद से ही मेरे पति और मेरे नाम पर कोई राशन कार्ड नहीं बना है। सास और ससुर के नाम पर राशन कार्ड था। ससुर का देहांत हो गया, तो सिर्फ सास को राशन मिल रहा है। कई बार गांव के डीलर और सरकारी अधिकारी को फॉर्म भर कर दिया। तीन से चार बार 500 से 1000 रुपए भी लिये। लेकिन अभी तक सरकार के द्वारा कोई राशन नहीं दिया गया है।”

आपका घर कैसे चलता है? इस सवाल के जवाब में कावो देवी बताती हैं, “हमारा घर भगवान चला रहा है। इधर-उधर मजदूरी करने के बाद कुछ मिल जाता है। बेटा लोग भी उस लायक नहीं बना है कि कमा सके दिल्ली जाकर। सबसे बड़ा बेटा अभी सिर्फ 13 साल का है।”

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Kavo Devi from Kajra Vllage Supaul


भारत सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत 81.5 करोड़ लोगों को अगले एक साल तक मुफ्त राशन देने की घोषणा की है। साल 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत रियायती दरों पर राशन देने का सिलसिला शुरू हुआ और अब प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत मुफ्त राशन दिया जा रहा है। लेकिन क्या यह राशन जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है? इस सवाल के जवाब को बिहार के सुपौल जिले की गोढ बरवारी पंचायत के कजरा गांव के वार्ड नंबर 12 के दलित टोले की स्थिति से समझिए।

सरकारी राशन का इंतजार कर रहे मजदूरों की दास्तां

दलित टोले के 27 वर्षीय बवा सादा, अपनी पत्नी सुनीता, बूढी मां और चार बेटी के साथ रहते हैं। वह पेशे से मजदूर हैं और गांव के ही सामंत वर्ग के यहां काम करते हैं। उसका घर 4 धुर जमीन पर बना हुआ है। इसके अलावा बवा सादा के पास कोई जमीन नहीं है।

बवा और उसकी पत्नी सुनीता के मुताबिक दो साल पहले दोनों का राशन कार्ड ‘डिलीट’ हो गया है। नया राशन कार्ड बनाने के लिए उन्होंने ‘ऑनलाइन’ आवेदन कर दिया है। हालांकि ‘डिलीट’ और ‘ऑनलाइन’ दोनों शब्द का मतलब दोनों पति पत्नी नहीं जानते हैं।

बवा सादा बताते हैं, “मां को वृद्धा पेंशन मिल रहा है। साथ ही मां का नाम राशन कार्ड में भी है इसलिए थोड़ी सहायता मिल जाती है। 2 साल पहले तक हमें भी राशन मिलता था। डीलर की सहायता से ही हमने गांव में दो बार ऑनलाइन आवेदन दिया है। इसके लिए हमें दुकानदार को 200 रुपए भी देना पड़ा था। इंतजार में हूं कि जल्दी राशन कार्ड बन जाए। इससे बहुत मदद मिलेगी।”

“7 साल पहले शादी होकर आई थी। 4 साल पहले पति के तीनो भाई में बंटवारा भी हो गया। अभी तक राशन कार्ड नहीं बना है। पति दिल्ली में रहकर मजदूरी करता है। दो बेटा, एक बेटी हैं। गांव में तीन बार सरकारी आदमी आया था जिसने राशन कार्ड के लिए फॉर्म भरवाया। लेकिन अभी तक कुछ नहीं मिला है। लॉकडाउन के दौरान एक पल के लिए ऐसा लगा था कि बच्चे गांव में भूखे ना मर जाएं,” गांव की बुट्टी देवी एकदम तेज और उदास आवाज में अपनी पूरी कहानी बताती हैं।

अच्छा हुआ बेटा पंजाब चला गया

गांव की बुजुर्ग बासो देवी आंगन में साग रोटी खा रही थी। उसके साथ उसका पोता भी खाना खा रहा था। बासो देवी को उनकी उम्र का अंदाजा नहीं है। उनके चार बेटे हैं। इनमें से सिर्फ एक बेटे टिल्लू को राशन कार्ड मिला हुआ है जिसके साथ वासो देवी गांव में रहती है। बांकी तीन बेटे पंजाब में मजदूरी करते हैं। बासो देवी चिल्लाते हुए बताती हैं, “टिल्लूआ को 6 महीने पहले राशन कार्ड मिला है। बाकी कोनो बेटा को नहीं मिला है। हम लोग तो मालिक के बगीचे में लकड़ी चुन-चुन कर जी लिए। अच्छा हुआ बेटा लोग बाहर चला गया। दो टाइम अच्छा खाना तो खा पा रहा है।”

बासो देवी को उनके बेटे का बाहर कमाने का कोई दुख नहीं है। हालांकि बासो देवी को भी राशन कार्ड और वृद्धा पेंशन का लाभ मिल रहा है।

लॉकडाउन के वक्त को याद करते हुए सुनीता देवी, झालो देवी और कृष्णा देवी सरकार और प्रशासन के खिलाफ चिल्लाने लगती हैं। झालो देवी बताती हैं, “बड़ी भयावह स्थिति थी। अब ना आए ई महामारी। जिसके पास राशन कार्ड था समस्या उसको भी हुई लेकिन कम हुई। जिसके पास नहीं था उसकी स्थिति सोची भी नहीं जा सकती। कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें भरपेट खाना नहीं मिल रहा था।”

गांव में आधे लोगों के पास राशन कार्ड नहीं

कजरा गांव के वार्ड नंबर 12 का हरिजन टोला जहां से शुरू होता है, वहां एक दुकान के पास मचान पर टोले के ही 4-5 बुजुर्ग ताश खेल रहे थे। बुजुर्गों के मुताबिक, टोले में लगभग 1000 लोग रहते हैं। सभी लोग मुसहर जाति से आते हैं। बिहार में मुसहर जाति अनुसूचित जाति में आता है। ताश खेल रहे लगभग 70 वर्षीय अशरफी सादा और 50 वर्षीय सरजू सादा के मुताबिक आधे से अधिक लोगों को राशन कार्ड का फायदा नहीं मिल रहा है।

वार्ड नंबर 12 की डीलर रीता कुमारी के मुताबिक, वार्ड नंबर 12 में सिर्फ 200 परिवारों को ही राशन मिलता है, जबकि इस वार्ड में लगभग 400-450 परिवार होंगे।

गांव में कई ऐसे परिवार हैं, जिनका राशन कार्ड रद्द हो चुका है। वहीं, लोगों का यह भी कहना है कि शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा, जिसे पूरा राशन मिल रहा है।

गांव के 26 वर्षीय सत्तन सादा मजदूरी करने के साथ-साथ गांव की राजनीति में भी दिलचस्पी रखते हैं। सत्तन बताते हैं, “जो पुराने लोग हैं, खासकर 40 साल से ऊपर, उनका राशन कार्ड बना हुआ है। लेकिन 70% से अधिकांश युवाओं का राशन कार्ड नहीं बना है। आज भी हमारी जाति में लड़के की शादी 20 से 22 साल में हो जाती है। इसके बाद जिम्मेदारी बढ़ जाती है। अधिकांश युवकों पर बच्चों की जिम्मेदारी है। लेकिन राशन कार्ड नहीं बनने की वजह से काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।”

गांव के सरजू सादा के मुताबिक राशन कार्ड रद्द होने की सूचना लोगों को मिलती ही नहीं है। जब उनका राशन नहीं आता, तब वे सरकारी दफ्तरों का चक्कर काटते हैं और वहां कहा जाता है कि सरकार द्वारा जारी होने वाले हरे कार्ड के लिए आवेदन करें क्योंकि उनका राशन कार्ड रद्द हो चुका है।

Ward No. 12 Kajra village Supaul

कजरा गांव से लगभग 5 किलोमीटर दूर एक गांव है बभनगामा। यह मुख्य रूप से ब्राह्मणों की बस्ती है। इस गांव के 65 वर्षीय माधव झा बताते हैं, “हमारे गांव में लगभग 60% परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है। गांव में अधिकांश लोग पढ़े लिखे हैं। उन्हें ऑनलाइन का मतलब भी बखूबी पता है और भरना भी आता है। इसके बावजूद पता नहीं क्या कारण है कि अधिकांश लोगों का नाम राशन कार्ड में उपलब्ध नहीं है।”

“गांव में कई लोग ऐसे हैं जो बाहर रहते हैं। वे राशन कार्ड का उपयोग नहीं करते हैं। उनका कैंसिल हो रहा है तो समझ आता है, लेकिन जो लोग गांव में रह रहे हैं उनका भी कैंसिल हो रहा है। बहुतों का तो बना ही नहीं है‌। अधिकांश समस्या नए लोगों के साथ हो रही है।”

डीलर और अधिकारी का क्या कहना है

कजरा गांव के वार्ड नंबर 12 के लोगों के मुताबिक, डीलर के द्वारा ही राशन कार्ड का फॉर्म भरा जाता है। कई लोगों से रुपये भी लिये गए हैं। वार्ड नंबर 12 की डीलर रीता कुमारी है। लेकिन, डीलर से संबंधित सारा काम उनके बेटे मनीष के द्वारा किया जाता है।

मनीष इस पूरे मामले पर कहते हैं, “गांव में ही महीने- दो महीने पर सरकारी आदमी पंचायत भवन पर राशन कार्ड बनाने आता है। हम वहां पर ग्रामीणों को ले जाते हैं और फॉर्म भरवाते हैं। किसी भी व्यक्ति का फार्म खुद से नहीं भरते हैं।” फॉर्म के बदले रुपए लेने के इल्जाम को वह नकारते हैं।

प्रखंड विकास पदाधिकारी राहुल राज बताते हैं, “हमारी टीम गांव जाकर लोगों को राशन कार्ड में आवेदन के लिए जागरूक करती है। आवेदन भरने में किसी भी तरह की त्रुटि आने पर ही कैंसिल होता है और कोई दूसरी वजह नहीं है।”

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एल एन एम आई पटना और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पढ़ा हुआ हूं। फ्रीलांसर के तौर पर बिहार से ग्राउंड स्टोरी करता हूं।

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