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त्रिपुरा से सिलीगुड़ी आये शेर ‘अकबर’ और शेरनी ‘सीता’ की ‘जोड़ी’ पर विवाद, हाईकोर्ट पहुंचा विश्व हिंदू परिषद

‘बंगाल सफारी’ में ‘शेर-शेरनी’ की ‘जोड़ी’ का नाम ‘अकबर-सीता’ होने को लेकर ही हिंदुत्ववादी संगठनों ने आपत्ति जताई है। इसे लेकर विश्व हिंदू परिषद ने‌ जलपाईगुड़ी स्थित कलकत्ता हाईकोर्ट की सर्किट बेंच में बीते 16 फरवरी को मुकदमा दायर किया है जिसे स्वीकृत भी कर लिया गया है। अब 20 फरवरी 2024 को जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की पीठ इस मुकदमे की सुनवाई करेगी।

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सिलीगुड़ी : त्रिपुरा से शेर ‘अकबर’ और शेरनी ‘सीता’ की ‘जोड़ी’ सिलीगुड़ी क्या आई कि विवाद हो गया। वह भी ऐसा-वैसा नहीं बल्कि गंभीर वाला।‌ इतना कि इस मामले को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने हाईकोर्ट तक का दरवाजा खटखटा दिया है। आरोप हिंदुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने का है।

जलपाईगुड़ी स्थित कलकत्ता हाईकोर्ट की सर्किट बेंच में इस मुकदमे को स्वीकार भी कर लिया गया है और 20 फरवरी 2024 को जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की पीठ द्वारा इसकी सुनवाई भी होनी है।

ऐसे शुरू हुआ मामला

यह मामला यहां से शुरू होता है कि ‘पशु अदला-बदली योजना’ के तहत त्रिपुरा के विशालगढ़ स्थित ‘सिपाहीजला जूलाॅजिकल पार्क’ (चिड़ियाघर) और सिलीगुड़ी के सेवक रोड में पांच माइल स्थित ‘नार्थ बंगाल वाइल्ड एनिमल्स पार्क’ (बंगाल सफारी) के बीच आपस में कुछ पशुओं की अदला-बदली हुई। ‘बंगाल सफारी’ ने ‘सिपाहीजला चिड़ियाघर’ को दो रायल बंगाल टाइगर, दो तेंदुआ और छह विदेशी पंछी दिए। उसके बदले ‘सिपाहीजला चिड़ियाघर’ ने ‘बंगाल सफारी’ को दो ‘चश्मे वाले बंदर’ (डस्की लीफ मंकी), चार ‘तेंदुआ बिल्ली’ (लेपर्ड कैट), चार ‘काले हिरण’ (ब्लैक- बक) और एक शेर व शेरनी की जोड़ी दी। इतने तक तो कोई बात नहीं थी। मगर, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच दो दिनों की यात्रा कर बीती 12 फरवरी को जब ये सारे पशु सिलीगुड़ी के पास ‘बंगाल सफारी’ पहुंचे और इनमें ‘शेर’ व ‘शेरनी’ की जोड़ी के नाम ‘अकबर’ व ‘सीता’ होने का खुलासा हुआ तो हंगामा मच गया। अगले ही दिन 13 फरवरी को विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच और हिंदू सभ्य समाज समेत अन्य कई संगठनों के लोग ‘बंगाल सफारी’ जा धमके। वहां जम कर विरोध प्रदर्शन किया।


उन्होंने उनकी धार्मिक भावना के आहत होने की बात कहते हुए अविलंब शेर ‘अकबर’ और शेरनी ‘सीता’ की ‘जोड़ी’ विशेष कर शेरनी ‘सीता’ का नाम बदलने की मांग को लेकर ‘बंगाल सफारी’ प्रबंधन को ज्ञापन भी दिया। उन हिंदुत्ववादी संगठनों के विरोध प्रदर्शन पर सुरक्षात्मक रवैया अपनाते हुए ‘बंगाल सफारी’ के निदेशक कमल सरकार ने उन्हें तत्काल यह लिखित रूप में देकर पल्ला झाड़ा कि अभी तक बंगाल सफारी की ओर से शेर और शेरनी का कोई नामकरण नहीं किया गया है। तब जा कर प्रदर्शनकारी तो थम गए लेकिन मामला नहीं थमा।

सोशल मीडिया में भी उबाल

शेर और शेरनी की जोड़ी के नाम ‘अकबर’ और ‘सीता’ होने को लेकर सोशल मीडिया में भी उबाल आ गया। इस बाबत स्थानीय अखबार में छपी खबर प्रस्तुत करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सिलीगुड़ी संगठन जिला के उपाध्यक्ष दीपंकर अरोड़ा ने अपने निजी फेसबुक अकाउंट से एक रोष भरा पोस्ट किया। “यह क्या सही हो रहा है? माता सीता के नाम पर क्या इस शेरनी का नामकरण करना उचित है, जबकि शेर का नाम अकबर है। आप शेरनी का नाम ‘माता सीता’ के नाम पर क्यों रखेंगे? जबकि शेर का नाम अकबर हो? कोई अन्य नाम चुना जा सकता है। मगर, यह साबित करने के लिए कि हमारा राज्य धर्मनिरपेक्ष है और हमारे हिंदू लोगों को चोट पहुंचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। हिंदू धर्म के अनुयायी के रूप में मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं और बंगाल सफारी अधिकारियों से तुरंत नाम बदलने और हमारी हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने हेतु माफी मांगने को कहता हूं।”

उनके इस पोस्ट पर अनेक लोगों की अनेक तरह की टिप्पणियां आईं। वहीं, फेसबुक समेत अन्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्मों पर भी तरह-तरह के बातें होने लगीं। किसी ने इसे धार्मिक भावना से खिलवाड़ करार दिया तो किसी ने यह भी कहा कि बात को बेवजह तूल दिया जा रहा है। एक फेसबुक यूज़र प्रताप पाल ने लिखा कि, ‘भाई उन्हें पिंजरे से निकालो और जंगल में छोड़ दो। इस सभ्य समाज में उन्हें रोके रखने का कोई काम नहीं है।’

क्या है हकीकत ?

इस मामले में हकीकत यही है कि शेर-शेरनी की जोड़ी का नामकरण अकबर-सीता ‘बंगाल सफारी’ में नहीं किया गया है। मिली जानकारी के अनुसार यह नामकरण त्रिपुरा से और बहुत पहले से ही है। त्रिपुरा राज्य सरकार के वन-विभाग अंतर्गत ‘सिपाहीजला जूलॉजिकल पार्क’ में एक शेर ‘दुष्यंत’ और शेरनी ‘चिन्मयी’ ने 2016 में एक साथ तीन शावकों को जन्म दिया था। तब, उक्त पार्क प्रबंधन द्वारा उन शावकों का नामकरण 70 के दशक की, विनोद खन्ना-ऋषि कपूर-अमिताभ बच्चन की तिकड़ी की सुपरहिट फिल्म ‘अमर-अकबर-एंथोनी’ के नाम पर किया गया। वहीं, 2018 में जन्मी मादा शावक का नाम सीता दिया गया। याद रहे कि 2018 से अब तक त्रिपुरा में भाजपा की ही सरकार है।‌ इधर, अब शेर अकबर सात साल का है तो शेरनी सीता पांच साल की हो गई है। वन विभाग के सूत्रों की मानें तो ये शेर व शेरनी बचपन से ही एक-दूसरे को चाहते हैं। बंगाल सफारी आने से पहले से यानी त्रिपुरा के सिपाहीजला चिड़ियाघर से ही इन दोनों को एक साथ ही रहने की आदत है। उसी के तहत दोनों को यहां बंगाल सफारी में भी साथ ही लाया गया और साथ ही रखा गया है।

विश्व हिंदू परिषद का मुकदमा

‘बंगाल सफारी’ में ‘शेर-शेरनी’ की ‘जोड़ी’ का नाम ‘अकबर-सीता’ होने को लेकर ही हिंदुत्ववादी संगठनों ने आपत्ति जताई है। इसे लेकर विश्व हिंदू परिषद ने‌ जलपाईगुड़ी स्थित कलकत्ता हाईकोर्ट की सर्किट बेंच में बीते 16 फरवरी को मुकदमा दायर किया है जिसे स्वीकृत भी कर लिया गया है। अब 20 फरवरी 2024 को जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की पीठ इस मुकदमे की सुनवाई करेगी। इसमें विश्व हिंदू परिषद द्वारा पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के वन विभाग व नार्थ बंगाल वाइल्ड एनिमल्स पार्क (बंगाल सफारी) के निदेशक को पक्ष बनाया गया है। उसने अपनी याचिका में कहा है कि, “विश्व हिंदू परिषद को गहरी पीड़ा हुई है कि बिल्ली परिवार की एक प्रजाति का नाम भगवान राम की पत्नी ‘सीता’ के नाम पर रखा गया है जो कि दुनिया भर के सभी हिंदुओं के लिए पवित्र देवी हैं। ऐसा कृत्य ईशनिंदा के समान है और सभी हिंदुओं की धार्मिक आस्था पर सीधा हमला है।” विश्व हिंदू परिषद के जलपाईगुड़ी जिला अध्यक्ष दुलाल चंद्र राय ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि बंगाल सफारी पार्क में लाई गई शेरनी का नाम सीता रखा गया है। इससे हमारे हिंदू धर्म को मानने वालों की भावना को ठेस पहुंची है। हमें इस नाम पर कड़ी आपत्ति है। इसलिए हम कोर्ट पहुंचे हैं।’

वहीं, इस मामले में विश्व हिंदू परिषद की ओर से वकील शुभंकर दत्त का कहना है कि त्रिपुरा से लाए गए शेर व शेरनी का, आधिकारिक दस्तावेजों में पैंथेरा शेर नर और मादा नाम दिया गया था जिसमें कि उनका आइडी नंबर भी दिया गया है। मगर, यहां आने के बाद उनका नाम अकबर और सीता रखा गया। इसलिए हमने सीता नाम बदलने की मांग करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच में मामला दायर किया है।’

चुनावी बयार और तूल

इस पूरे मामले में राजनीति के जानकारों की मानें तो एकदम नजदीक लोकसभा चुनाव-2024 की वजह से भी इसे कुछ ज्यादा ही तूल दिया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के शासन वाले राज में अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए ही भाजपा और उसके सहायक संगठन इसे कुछ ज्यादा ही हवा देने में लगे हैं।‌ इसी बीच पश्चिम बंगाल राज्य सरकार ने बीते 16 फरवरी को ही अपने वन-विभाग में भारी बदलाव किया है। बड़े अफसरों से लेकर छोटे कर्मचारियों तक के व्यापक तबादले का आदेश दे डाला है।‌ इसके तहत सिलीगुड़ी के बंगाल सफारी के निदेशक कमल सरकार भी बदल दिए गए हैं। उन्हें खड़गपुर के हिजली स्थित राज्य वन प्रशिक्षण संस्थान के निदेशक पद पर भेज दिया गया है। उनकी जगह यहां बंगाल सफारी के निदेशक पद पर बांकुड़ा दक्षिण डिवीजन के डीएफओ ई. विजय कुमार को लाया गया है।

इतना ही नहीं, बीते साढ़े तीन महीने से जेल में कैद राज्य के वन मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक को भी इस पद से बर्खास्त कर दिया गया है। पहले उनके खाद्य आपूर्ति मंत्री रहते राज्य में हुए चर्चित राशन घोटाला के मामले में 27 अक्टूबर 2023 को ईडी ने उन्हें गिरफ्तार किया था। उस समय वह राज्य के वन मंत्री थे। वह तब से अब तक जेल में हैं। उन्हें वन मंत्री पद से अब तक हटाया नहीं गया था लेकिन अब बर्खास्त कर दिया गया है। राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने उन्हें आधिकारिक तौर पर कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया है। कहा गया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सलाह पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 166(3) के अनुसार राज्यपाल द्वारा यह निर्णय लिया गया है और राजभवन द्वारा इसकी घोषणा की गई है।

ज्योतिप्रिय मल्लिक की जगह अब बिरबाहा हांसदा को वन विभाग (स्वतंत्र प्रभार) सौंपा गया है। इसके अलावा ज्योतिप्रिय मल्लिक के ही पास रहे सार्वजनिक उद्यम व औद्योगिक पुनर्निर्माण विभाग के मंत्री पद पर भी अब पार्थ भौमिक को बिठा दिया गया है। इस व्यापक फेर-बदल को जहां वन विभाग के आला अधिकारी रुटीन ट्रांसफर करार दे रहे हैं वहीं इसे वर्तमान शेर-शेरनी प्रकरण से भी जोड़ कर देखा जा रहा है।

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