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30 साल में भी नहीं बन सका अररिया डीएम व एसपी के लिए आवास

साल 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने अररिया को जिला बनाने की घोषणा की और इसे जिले का दर्जा दे दिया गया। जिला बनते ही फारबिसगंज को अनुमंडल बना दिया गया। इस तरह से अररिया जिले में दो अनुमंडल और 9 प्रखंड हो गए। लोगों को आहिस्ता आहिस्ता इसका फायदा भी मिलने लगा। अब लगभग सारे कार्य जिले में ही होने लगे।

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residence for araria dm and sp could not be built in 30 years

अररिया: अररिया को जिले का दर्जा मिले 33 वर्ष हो रहे हैं। जिला बनने के बाद अररिया में कई भव्य सरकारी भवनें बनीं। कलेक्ट्रेट बना, डीआरडीए सभा भवन बना, एसडीओ कार्यालय बना, इसके साथ अतिथि सदन का भी निर्माण करा लिया गया। लेकिन इतने वर्षों बाद भी डीएम और एसपी का आवास नहीं बन पाया है।


इस वजह से डीएम, पथ निर्माण विभाग और एसपी, सिंचाई विभाग के डाक बंगले में रह रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही दो पदाधिकारी दूसरे विभाग के मकानों में रह रहे हैं। उनके साथ सदर एसडीपीओ भी पथ निर्माण विभाग के एक मकान में रहे हैं। यही नहीं, पुलिस लाइन भी बाजार समिति के गोदाम में ही चल रहा है।

remporary araria dm residence


1990 में बना था अररिया जिला

पूर्णिया जिले का अररिया एक अनुमंडल हुआ करता था। लोगों को 100 से डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी तय कर किसी भी सरकारी कार्य के लिए जिला मुख्यालय पूर्णिया जाना पड़ता था। इसमें समाहरणालय से जुड़े और न्यायालय से जुड़े मुकदमे हुआ करते थे। लोगों को पूर्णिया जाने में आने में खर्च के साथ समय भी काफी लगता था।

इस समस्या के हल के लिए अररिया के लोगों ने अररिया जिला बनाओ आंदोलन की शुरूआत की। इस आंदोलन में अररिया के लोगों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और कई वर्षों तक जिला बनाने की मांग को लेकर आंदोलन करते रहे।

साल 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने अररिया को जिला बनाने की घोषणा की और इसे जिले का दर्जा दे दिया गया। जिला बनते ही फारबिसगंज को अनुमंडल बना दिया गया। इस तरह से अररिया जिले में दो अनुमंडल और 9 प्रखंड हो गए। लोगों को आहिस्ता आहिस्ता इसका फायदा भी मिलने लगा। अब लगभग सारे कार्य जिले में ही होने लगे।

अररिया के लोगों ने जो आंदोलन किया था, वह सफल हुआ। लेकिन, भावनों की कमी के चलते अलग-अलग जगहों पर सारे विभागीय कार्यालय चलने लगे। वर्तमान में जो कलेक्ट्रेट है, उसके निर्माण में भी काफी लंबा समय लगा। लेकिन डीएम एसपी के आवास के लिए कोई जगह नहीं होने के कारण समाहरणालय के ठीक सामने पथ निर्माण विभाग का एक डाक बंगला था, उसमें डीएम का आवास बना दिया गया। एसपी को सिंचाई विभाग की कॉलोनी में बना एक डाक बंगला दे दिया गया।

जिला बनने के बाद बड़ी संख्या में पुलिस बल और पदाधिकारी की नियुक्ति हुई, लेकिन उनके रहने के लिए कोई अस्थाई व्यवस्था भी नहीं थी, इसलिए तत्काल बाजार समिति के गोदाम में जवानों के लिए रहने की व्यवस्था कर दी गई और वहीं पुलिस लाइन बना दिया गया, जो आज तक चल रहा है।

अररिया जिले की स्थापना का श्रेय अररिया के तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष सह अधिवक्ता हंसराज भगत को दिया जाता है। 1980 के दशक में अररिया को अलग जिला बनाने की मांग उठने लगी थी और इसके पीछे का कारण अररिया के कई इलाके पूर्णिया से 100 से 150 किलोमीटर दूरी पर होना था। इस मांग को उठाने वालों में हंसराज भगत के साथ अधिवक्ता ताहा हुसैन, अधिवक्ता एलपी नायक के साथ कई बुद्धिजीवी वर्ग के लोग शामिल थे।

अररिया जिला बनने के बाद इसके अंतर्गत अररिया, जोकीहाट, कुर्साकांटा, रानीगंज, सिकटी, पलासी और फारबिसगंज अनुमंडल तथा फारबिसगंज, नरपतगंज और भरगामा प्रखंड बने। इस जिले में छह विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र और एक अररिया लोकसभा क्षेत्र है।

डीएम व एसपी आवास का शिलान्यास होकर रह गया

डीएम और एसपी के आवास के लिए तत्कालीन भवन निर्माण मंत्री तस्लीमुद्दीन ने जिला कृषि विभाग की खाली पड़ी जमीन पर शिलान्यास भी किया था।

कृषि विभाग की भूमि पर डीएम और एसपी के लिए खूबसूरत आवास के निर्माण कार्य को लेकर लोगों में उत्साह था कि यहां आवास बन जाने से आसपास का इलाके में शांति व्यवस्था रहेगी। लेकिन, किन परिस्थितियों में वहां भवनों का निर्माण नहीं हो पाया, इसकी जानकारी आज तक लोगों को नहीं मिल पाई।

वर्तमान में अररिया पुलिस लाइन के लिए अररिया प्रखंड की हडियाबाड़ा पंचायत में जमीन अधिग्रहण का कार्य किया जा रहा है। अब देखना यह है कि वहां पुलिस लाइन कब तक बन पाएगा। लेकिन, डीएम व एसपी का आवास बनने का कार्य फिलहाल अधर में ही लटका नजर आ रहा है।

जेल की जमीन पर शुरू हुआ काम अधर में

ऐसा नहीं है कि डीएम और एसपी के आवास के लिए किसी जिला पदाधिकारी ने पहल नहीं की।

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अंग्रेजों के समय में बना अररिया का उपकारा जब यहां से नई जगह पर हस्तांतरित हुआ तो यह विशाल जेल भवन और परिसर यूं ही खाली रह गया। तत्कालीन डीएम हिमांशु शर्मा ने पुरानी जेल की जमीन की पैमाइश भी करवायी थी। इसके लिए अंचलाधिकारी को जिम्मेदारी दी गई।

उनका मानना था कि समाहरणालय के करीब दोनों अधिकारियों का आवास होने से काफी सुविधा होगी। उन्होंने इस जेल की भूमि पर आवास बनाने के लिए कई कार्य भी शुरू किये। लेकिन वह भी उनके तबादले के बाद अधर में लटका रह गया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस तरह से जिले की आबादी बढ़ रही है, उसको देखते हुए सभी विभाग में जो भी भवन हैं, उनकी आवश्यकताएं अधिक हो गई हैं। ऐसे में जिस भवन में डीएम और एसपी, डीएसपी रहते हैं वे खाली हो जाएं ,तो उन जगहों पर उनका अपना डाक बंगला होगा और विभागीय अधिकारियों को भी कार्य करने में आसानी होगी। क्योंकि जिला स्तर का अतिथि सदन भी बन गया है, वहां लंबा चौड़ा परिसर भी है। लेकिन डीएम और एसपी के आवास के खाली नहीं होने के कारण ये जगह अब विभाग के हाथ में नहीं के बराबर है।

लोगों का सवाल है कि क्या वजह है कि सभी विभागों के बड़े-बड़े दफ्तर बन गए हैं, यहां तक कि डिप्टी कलेक्टरों के लिए भी आवास का निर्माण हो गया है, लेकिन जिले के सबसे बड़े अधिकारी के लिए आज तक निजी आवास नहीं बन‌ सका? लोगों ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण व राज्य सरकार की घोर लापरवाही बताया।

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