बिहार: भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल का कदवा दियारा, बिहार का एकमात्र गरुड़ (ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क) प्रजनन स्थल है। कदवा दियारा, गरुड़ का घर-आंगन है। लेकिन, अब उनकी आबादी पर खतरा मंडराने लगा है।
कासिमपुर कदवा के स्थानीय निवासी नवीन कुमार निश्चल बताते हैं, “छह-सात साल पहले यहां बहुत बड़ी संख्या में गरुड़ हुआ करते थे। बड़े व घने पेड़ों पर बने घोंसलों से निकल कर रात के वक्त वे झुंड में एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक आते-जाते थे, तो उनकी आवाज गूंजती थी, लेकिन ये आवाज अब दुर्लभ हो गई है।
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स्थानीय ग्रामीण हेमंत कुमार सिंह का आरोप है कि गरुड़ संरक्षण को लेकर सरकार के सारे दावे खोखले हैं। “विभाग कहता है कि जिस पेड़ पर गरुड़ घोंसला बनाते हैं, उस पेड़ के नीचे जाल लगाया जाएगा, ताकि गरुड़ के अंडे व उसके नवजात नीचे गिर कर नष्ट न हो जाएं, लेकिन घोंसले वाले किसी भी पेड़ पर जाल नहीं लगाया गया है,” हेमंत कुमार सिंह ने कहा।
नाम नहीं बताने की शर्त पर एक स्थानीय बुजुर्ग कहते हैं कि जिस पेड़ पर गरुड़ का वास होता है, वहां के आसपास की फसल उसके बीट की वजह से नष्ट हो जाती है, जिससे नाराज होकर कुछ किसान उस पेड़ से गरुड़ का आशियाना ही उजाड़ देते हैं। कई बार ग्रामीण, गरुड़ के घोंसलों वाला पेड़ इसलिए काट देते हैं कि घोंसलों के चलते वो पेड़ सरकारी न हो जाये।
बिहार में कितने गरुड़?
साल 2006 – 2007 में भागलपुर में गरुड़ की संख्या 78 थी जो 2023-2024 में बढ़कर 600 हो गई। इस साल गरुड़ों की गणना की प्रक्रिया चल रही है। इंडियन बर्ड कंजर्वेशन नेटवर्क के बिहार के को-ऑर्डिनेटर व बर्ड एक्सपर्ट अरविंद मिश्रा ने बताया कि इस बार भागलपुर के कदवा दियारा में गरुड़ के 130 घोंसले मिले हैं। गरुड़ का अंतिम आंकड़ा कुछ दिनों में जारी किया जाएगा।
घोंसलों की बात करें, तो पिछली बार के मुकाबले इस बार उनकी संख्या कम है। पिछली बार की गणना में 160 घोंसले मिले थे।
हालांकि, बर्ड वाचरों का कहना है कि गरुड़ की आबादी जितनी बताई जा रही है, वास्तविक संख्या उससे कम होगी। बर्ड वाचर मो. दानिश मसरूर बताते हैं, “मैंने पिछले साल दिसंबर में गरुड़ के प्रजनन के समय कदवा दियारा का निरीक्षण किया था। मैंने देखा कि अधिकाधिक पेड़ जिन पर गरुड़ के घोंसले होते थे, उनकी टहनियों को प्रजनन काल में काट दिया गया है। मुख्य स्थानों पर लगभग 10 घोंसले ही देखने को मिले थे।”
वह कहते हैं, “अभी तक गरुड़ की संख्या को आधिकारिक रूप से सत्यापित करने के लिए उनकी रिंगिंग भी नहीं की गयी है। रिंगिंग करने से पारदर्शी तरीके से वास्तविक आंकड़े सामने आ जाएंगे। मगर, मुझे लगता है कि गरुड़ की जो संख्या बताई जा रही है, वास्तविक संख्या उससे आधी होगी।”
उल्लेखनीय है कि गरुड़, पर्यावरण को साफ रखने में मदद करते हैं और उनकी मौजूदगी स्वस्थ आर्द्रभूमि का संकेत है। गरुड़, मृत जैविक अपशिष्टों की सफाई, सरीसृपों, फसल कृन्तकों, बड़े कीटों इत्यादि को खाकर खाद्य श्रृंखला में अपनी भूमिका निभाते हैं।
प्रजनन स्थलों पर संकट
पक्षी संरक्षण के क्षेत्र में वर्षों से सक्रिय स्थानीय निवासी पक्षी विशेषज्ञ ज्ञानचंद्र ज्ञानी के अनुसार, वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, बदलते सामाजिक परिवेश तथा मानवीय हस्तक्षेप के कारण कदवा दियारा में गरुड़ के प्राकृतिक प्रजनन स्थलों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।

कदवा दियारा जो कभी गरुड़ का एक सुरक्षित और स्थिर नेस्टिंग ज़ोन माना जाता था, अब तेजी से बदलते भू-उपयोग, कृषि विस्तार तथा ईंधन व अन्य जरूरतों के चलते पेड़ों की कटाई से प्रभावित हो रहा है।
ज्ञानचंद्र ज्ञानी कहते हैं, “गरुड़, ऊंचे, पुराने और मजबूत वृक्षों पर ही अपना घोंसला बनाते हैं, लेकिन लगातार वृक्षों की कमी के कारण अब उनके लिए सुरक्षित घोंसला नहीं बन पा रहा है। इससे सक्रिय घोंसलों की संख्या में कमी आई है। कई पारंपरिक नेस्टिंग साइट पर अब प्रजनन नहीं हो रहा, तो कुछ जोड़े क्षेत्र छोड़कर अन्य स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसका सीधा असर गरुड़ के सफल प्रजनन दर पर पड़ रहा है, जो भविष्य में उनकी स्थानीय आबादी के घटने का संकेत है।”
गौरतलब है कि नवगछिया अनुमंडल का पूरा नदी तंत्र विशेषकर गंगा व कोसी गरुड़ के लिए आदर्श आहार क्षेत्र प्रदान करता है। यहां छोटे-बड़े तालाब, ढाब, दह, धाराएं तथा नदियों की धाराएं मछलियों और अन्य जलीय जीवों से भरी रहती हैं, जिन पर गरुड़ निर्भर रहते हैं।
सिकुड़ रहा गरुड़ों का फीडिंग ग्राउंड
नारायणपुर-पसराहा से कुर्सेला तक का क्षेत्र वर्तमान में गरुड़ सहित अनेक स्थानीय व प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण फीडिंग ग्राउंड है। लेकिन, हाल के वर्षों में बाजार में बढ़ती मांग के कारण आवश्यकता से अधिक मछली शिकार का हो रहा है। ये मछली गरुड़ का भोजन है। ऐसे में अगर मछलियां कम हो जाएंगी, तो गरुड़ वैकल्पिक और असुरक्षित भोजन स्रोत की ओर जाने पर मजबूर होंगे। हाल ही में नवगछिया के कचहरी मैदान में सैकड़ों कौए मृत पाए गए थे। जब इस मामले की जांच हुई तो पाया गया कि इन कौओं ने अपशिष्ट में मिले जहरीले पदार्थों का सेवन किया था। भविष्य में यदि प्राकृतिक फीडिंग क्षेत्र सिकुड़ते गए, तो गरुड़ भी भोजन की तलाश में कचरा स्थलों या प्रदूषित स्रोतों की ओर आकर्षित हो सकते हैं, जिससे उन पर विषाक्तता का खतरा रहेगा।
वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि कदवा दियारा में गरुड़ का प्रजनन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन यह “संकटग्रस्त स्थिरता” की अवस्था में है और यहां थोड़े संरक्षण प्रयास से उसे बचाया जा सकता है, पर उपेक्षा जारी रही तो निकट भविष्य में यह क्षेत्र गरुड़ के वैश्विक मानचित्र से बाहर हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि क्षेत्र में नेस्टिंग के लिए वृक्षों का संरक्षण, सामुदायिक स्तर पर सघन वृक्षारोपण (विशेषकर अर्जुन, पीपल, कदम्ब जैसे ऊँचे वृक्ष) लगाना चाहिए। विभाग की निगरानी में मत्स्य प्रबंधन व अपशिष्ट कचरा प्रबंधन करना चाहिए। गरुड़ का प्रजनन चक्र सुरक्षित रहे और नवगछिया क्षेत्र में उनकी स्थायी उपस्थिति बनी रहे, इसके लिए विभाग के साथ-साथ ग्रामीणों का व्यापक स्तर पर सहभागिता जरूरी है।
पर्यावरण प्रेमी रंजीत कुमार मंडल ने बताया कि शेष बचे पेड़ों को आवश्यक रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए। यदि गरुड़ प्रजनन क्षेत्र कदवा दियारा में पेड़ों की कटाई व पारिस्थितिकीय बदलाव के कारण नेस्टिंग व फीडिंग एरिया सिकुड़ रहा है तो यह उस क्षेत्र के लिए अच्छा नहीं है। कदवा दियारा की विश्व मानचित्र पर गरुड़ प्रजनन क्षेत्र को लेकर पहचान है, इसलिए इसे सुरक्षित और संरक्षित किया जाना चाहिए।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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