बीते एक हफ्ते से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीतर एक अलग तरह का घमासान चल रहा है और इसके केंद्र में राज्यसभा सांसद संजय यादव हैं, जो लम्बे समय से राजद विधायक, नेता प्रतिपक्ष व पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार हैं।
हालांकि, ये पहली बार नहीं है कि संजय यादव आरोपों के केंद्र में हैं। राजद से 6 साल के लिए निष्कासित हो चुके लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव पूर्व में कई बार ये आरोप लगा चुके हैं कि संजय यादव अपने अधिकारक्षेत्र से बाहर जाकर पार्टी गतिविधियों में अवांछित हस्तक्षेप करते हैं और इतना ही नहीं, वह तेजस्वी यादव के राजनीतिक फैसलों में भी पर्याप्त दखल देते हैं।
Also Read Story
तेज प्रताप यादव के आरोपों को पार्टी में कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन इस बार मामला कुछ आगे निकल चुका है क्योंकि इस दफा आरोप लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने लगाया है, जो राजनीतिक तौर पर तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव या मीसा भारती जितनी सक्रिय नहीं हैं। अलबत्ता, 2024 के चुनाव में उन्हें पार्टी ने लालू यादव के परंपरागत लोकसभा सीट सारण (छपरा) से टिकट दिया गया था, लेकिन वह एक करीबी मुक़ाबले में लगभग 13,000 वोटों से हार गईं।
सोशल मीडिया से शुरू हुआ विवाद
इस पूरे विवाद की शुरुआत 18 सितम्बर को होती है, जब फेसबुक पर राजद का एक हितैषी अपने एक पोस्ट के जरिए सवाल पूछता है कि बिहार अधिकार यात्रा में तेजस्वी यादव जिस बस में सवार थे, उसकी फ्रंट सीट पर संजय यादव क्यों बैठे थे? उक्त पोस्ट में वह लिखता है, “फ्रंट सीट सदैव शीर्ष के नेता – नेतृत्वकर्त्ता के लिए चिन्हित होती है और उनकी अनुपस्थिति में भी किसी को उस सीट पर नहीं बैठना चाहिए… वैसे अगर ‘कोई’ अपने आप को शीर्ष नेतृत्व से भी ऊपर समझ रहा है, तो अलग बात है।”
“वैसे पूरे बिहार के साथ-साथ हम तमाम लोग इस सीट (फ्रंट सीट) पर लालू जी और तेजस्वी यादव को बैठे/बैठते देखने के अभ्यस्त हैं। उनकी जगह पर कोई और बैठे ये हमें तो कतई मंजूर नहीं है, ठकुरसुहाती करने वालों, जिन्हें एक दोयम दर्जे के व्यक्ति में एक विलक्षण रणनीतिकार – सलाहकार – तारणहार नजर आता है, की बात अलग है।” उक्त पोस्ट के साथ एक फोटो भी डाला गया था, जिसमें संजय यादव बैठे दिख रहे हैं।
रोहिणी आचार्य ने पहले उस पोस्ट को शेयर किया। फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने दो अन्य तस्वीरें शेयर करते हुए पृथक पोस्ट लिखा – वंचितों और समाज के आखिरी पायदान पर खड़े वर्ग-समूह को आगे लाना ही राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय लालू यादव जी के सामाजिक-आर्थिक न्याय के अभियान का मूल मकसद रहा है, इन तस्वीरों में समाज के इन्हीं तबके से आने वालों को आगे बैठे देखना सुखद अनुभूति है। इन तस्वीरों में से एक में बस की अगली सीट पर पूर्व विधायक शिवचंद्र राम बैठे दिखते हैं।
बताया जाता है कि रोहिणी आचार्य के इसी पोस्ट को लेकर राजद के भीतर घमासान शुरू हुआ और अंदरखाने ये चर्चा होने लगी कि रोहिणी आचार्य बिहार विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे में अपनी भूमिका चाहती हैं, लेकिन संजय यादव इसमें अड़ंगा डाल रहे हैं। ये बात रोहिणी आचार्य तक पहुंची, तो उन्होंने बैक टू बैक दो पोस्ट और उनके साथ कुछ तस्वीरें साझा कीं। ये तस्वीरें तब की हैं जब साल 2022 में उन्होंने लालू यादव को अपनी एक किडनी दे दी थी।
तस्वीरों के साथ अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा, “जो जान हथेली पर रखते हुए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने का जज्बा रखते हैं, बेखौफी – बेबाकी – खुद्दारी तो उनके लहू में बहती है।” एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा, “मैंने एक बेटी और बहन के तौर पर अपना कर्तव्य व धर्म निभाया है और आगे भी निभाती रहूंगी। मुझे किसी पद की लालसा नहीं है, न मेरी कोई राजनीतिक महात्वाकांक्षा है, मेरे लिए मेरा आत्मसम्मान सर्वोपरि है।” फिर 20 सितंबर को उन्होंने अचानक अपने माइक्रो ब्लॉगिंग एक्स अकाउंट (पूर्व में ट्विटर) से अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ साथ पार्टी और पार्टी के शीर्ष नेताओं को भी अनफॉलो कर दिया।
इसी तरह तीन दिन पहले उन्होंने एक अन्य पोस्ट में लिखा, “मेरी कोई राजनीतिक महात्वाकांक्षा न कभी रही है, न है और ना ही आगे होगी। न मुझे खुद विधानसभा का प्रत्याशी बनना है, न ही किसी को विधानसभा का प्रत्याशी बनवाना है और न राज्यसभा की सदस्या की मेरी कोई आकांक्षा है, न ही परिवार के किसी भी सदस्य से मेरी किसी भी प्रकार की प्रतिद्वंद्विता है और न ही पार्टी या भविष्य में बनने वाली किसी भी सरकार में किसी पद की कोई लालसा है।” अपने ताजा पोस्ट में फिर एक बार उन्होंने लगभग यही बात दोहराई है।
राजनीतिक बयानबाजी
इस पूरे प्रकरण के बाद भाजपा और अन्य राजनीतिक दल भी संजय यादव के बहाने राजद की चुटकी ले रहे हैं। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने 20 सितंबर को समस्तीपुर में एक कार्यक्रम में कहा, “क्या बिहार भर के यादव नेताओं को बुद्धि नहीं है, जो संजय यादव हरियाणा से आकर राजद को चला रहे हैं। आरजेडी में इतने बड़े-बड़े नेता हैं, यादव समाज से भी कई बड़े लीडर हैं। फिर बाहर से आया व्यक्ति बता रहा है कि कैसे राजनीति करनी है, तो लोग इसका विरोध करेंगे ही।”
उधर, भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने 24 सितंबर को अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, “तेजस्वी यादव की कोई तो कमजोर नस है, जिसे संजय यादव ने दबा रखा है! संजय के दबाव में तेजस्वी अपने ही पूरे परिवार का गला घोंट रहे हैं। अब तो बच्चा-बच्चा कहने लगा है — राजद का रिमोट संजय यादव के हाथ में है। लालू प्रसाद लाचार होकर सब कुछ देखने पर मजबूर हैं। आरजेडी के ‘औरंगज़ेब’ ने भाई की राजनीति का गला रेत दिया और पिता को मानो क़ैदखाने में चुप रहने पर मजबूर कर दिया।”
राजनीतिक टिप्पणियों के इतर पार्टी सूत्रों की मानें, तो राजद में संजय यादव का कद पार्टी के अन्य बड़े नेताओं से बड़ा जरूर है और पार्टी से जुड़े बहुत सारे फैसलों में उनकी छाप होती है। ऐसे में माना जा रहा है कि बहुत सारे नेताओं की पार्टी में ‘चल’ नहीं पा रही है, जिससे पार्टी के भीतर ‘संजय विरोधी खेमा’ बन रहा है और रोहिणी आचार्य उस खेमे की ताजा सदस्य हैं।
ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या संजय यादव, राजद के वीके पांडियन साबित होंगे।
क्या BJD जैसा होगा RJD का हाल
पूर्व नौकरशाह वीके पांडियन ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री व बीजू जनता दल (BJD) के मुखिया नवीन पटनायक के बेहद करीबी और उत्तराधिकारी माने जाते थे। पार्टी में उनका कद नवीन पटनायक के बराबर था और पार्टी से जुड़े बहुत सारे फैसले वीके पांडियन लिया करते थे, जिससे पार्टी के कई नेता नाराज थे। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर की थी और विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार की मुख्य वजह वीके पांडियन को बताया था।
कई वरिष्ठ नेताओं ने वीके पांडियन को ही कारण बताकर पार्टी छोड़ दी थी। पूर्व सांसद व BJD के वरिष्ठ नेता प्रसन्ना पाटसानी ने पार्टी को ये कहकर अलविदा कह दिया था कि नवीन पटनायक की लोकप्रिय सरकार पांडियन की वजह से हार गई थी और मुझे भी पांडियन की वजह से ही पार्टी छोड़नी पड़ी थी। एक अन्य नेता अमर प्रसाद सतपति ने कहा था कि पांडियन का पार्टी में काफी प्रभाव है और जब तक वह पार्टी में हैं, तब तक पार्टी कोई चुनाव नहीं जीत पाएगी।
बीजद और राजद नेताओं की प्रतिक्रिया में थोड़ा अंतर है। जहां बीजद के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर पांडियन की तीखी आलोचना की, वहीं, राजद के भीतर से संजय यादव के खिलाफ बयानबाजी सिर्फ लालू यादव के परिवार से ही हो रही है। उनके कुनबे के बाहर के नेताओं की तरफ से अब तक उनके खिलाफ सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। जानकार बताते हैं कि कमोबेश सभी नेताओं ने तेजस्वी यादव को अपना नेता मान लिया है और चूंकि संजय यादव उनके सलाहकार हैं, तो उन्हें भी स्वीकार कर लिया गया है। मगर, ये स्वीकार्यता टिकट बंटवारे के बाद तलक भी रहती है या नहीं, ये देखने वाली बात होगी।
सीमांचल की ज़मीनी ख़बरें सामने लाने में सहभागी बनें। ‘मैं मीडिया’ की सदस्यता लेने के लिए Support Us बटन पर क्लिक करें।



















