वरिष्ठ कांग्रेस नेता व सांसद राहुल गांधी पिछले पांच महीनों में चार बार बिहार का दौरा कर चुके हैं।
उनका ताजा दौरा 15 मई को हुआ। वह सीधे फ्लाइट से दरभंगा एयरपोर्ट उतरे और वहां से सरकारी अंबेडकर छात्रावास, जहां दलित छात्र रहते हैं, गये व छात्रों से मुलाकात की। हालांकि, इसके लिए कांग्रेस की तरफ से अनुमति मांगी गई थी, मगर अनुमति नहीं मिली, इसके बावजूद वह गये, जिसके चलते उन पर एफआईआर भी दर्ज की गई है। इसके बाद उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में समाज सुधारक ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर बनी हिन्दी फिल्म ‘फुले’ देखी।
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इस साल बिहार में राहुल गांधी का पहला दौरा 18 जनवरी को हुआ था। इस दौरे के दौरान उन्होंने पटना में नागरिक समाज के साथ संविधान सुरक्षा सम्मेलन और इसके बाद पार्टी दफ्तर में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था। इसके दो हफ्ते बाद ही फरवरी में उन्होंने दोबारा बिहार का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के अनुयायी व साल 1937 में बिहार में बनी कांग्रेस की अंतरिम सरकार में मंत्री रहे जगलाल चौधरी के जयंती कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। 7 अप्रैल को वह तीसरी बार बिहार आये और इस बार भी संविधान सुरक्षा सम्मेलन में शिरकत की।
ताजा दौरे के दौरान फुले फिल्म देखना और अंबेडकर छात्रावास में दलित छात्रों से मुलाकात, राहुल गांधी निश्चित तौर पर कांग्रेस को सामाजिक न्याय की पार्टी के तौर पर स्थापित करना और पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वोटरों को रिझाना चाह रहे हैं। दौरे के दौरान उन्होंने अपने वक्तव्यों से भी इसे जाहिर कर दिया। हॉस्टल छात्रों से मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी हाशिये पर छोड़ दिये गये 90 प्रतिशत लोगों की लड़ाई लड़ेगी। उन्होंने निजी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का मुद्दा भी उठाया। “सरकार से मेरी तीन मांगें हैं। पहली मांग जाति जनगणना कराना थी, जिसे कराने का फैसला सरकार ले चुकी है। अब उसे ठीक से कराया जाए, जैसा तेलंगाना में कराया गया। दूसरी मांग निजी शैक्षणिक संस्थानों में और दूसरे निजी संस्थानों में आरक्षण लागू कराना है और तीसरी मांग एससी-एसटी (अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति) सब प्लान का पैसा दूसरे मद में डायवर्ट करने से रोकना है,” राहुल गांधी ने कहा।
राहुल गांधी ने ये भी कहा कि देश की 90 प्रतिशत आबादी, जिनमें दलित, पिछड़े, अतिपिछड़े और आदिवासी शामिल हैं, के पास कोई रास्ता नहीं है। उन्हें 24 घंटे दबाया जाता है। “सीनियर ब्यूरोक्रेसी, कॉरपोरेट, हाईकोर्ट, बड़ी कंपनियों के मालिक, इन तमाम जगहों पर ये लोग कहीं नहीं हैं। ये आपको मनरेगा की लिस्ट में, मजदूरों की कतार में मिलते हैं। देश का सारा धन और संसाधन 10 प्रतिशत लोगों को हाथों में है, इसलिए कांग्रेस अब इन लोगों की लड़ाई लड़ेगी,” उन्होंने कहा।
राहुल गांधी बिहार का लगातार दौरा कर कांग्रेस को सामाजिक न्याय के नये चैम्पियन के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। ये कांग्रेस की बिल्कुल नई राजनीति है क्योंकि अतीत में कांग्रेस कभी भी सामाजिक न्याय की बात करने वाली पार्टी नहीं रही है। बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 90 के दशक में आरक्षण के खिलाफ लम्बा वक्तव्य दिया था। ऐसे में बिहार चुनाव कांग्रेस के लिए लिटमस टेस्ट होगा। इस चुनाव परिणाम से पता चलेगा कि कांग्रेस ने सामाजिक न्याय की जो नई विचारधारा अपनाई है, वह वोट बैंक तैयार कर पाएगी कि नहीं।
कांग्रेस के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, “आनेवाले दिनों में भी राहुल गांधी का बिहार आना जारी रहेगा। बिहार चुनाव परिणाम हमें बताएगा कि दलित व अतिपिछड़ा समाज कांग्रेस के साथ आया कि नहीं।”
क्या सामाजिक न्याय देगा कांग्रेस को संजीवनी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी के मौजूदा स्टैंड से कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में मदद मिल सकती है।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व प्रोफेसर पुष्पेंद्र कहते हैं, “कांग्रेस को अगर रिवाइव करना है तो हिन्दी पट्टी को छोड़कर नहीं हो सकता है। कांग्रेस अगर रिवाइव होगी, तो हिन्दी पट्टी से ही होगी। बिहार में चुनाव है, तो ये एक बेहतर मौका है कांग्रेस के लिए। मगर, बिहार चुनाव कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण भी है। पहलगाम घटना के बाद जो माहौल बना है, उसमें ध्रुवीकरण हो रहा है। ऐसे में बिहार में अच्छा प्रदर्शन करना कांग्रेस के लिए चैलेंजिंग होगा।”
जदयू के कमजोर होने को प्रो. पुष्पेंद्र कांग्रेस के लिए एक अवसर के रूप में देखते हैं। “बिहार में जदयू कमजोर हो रहा है और वह अब अपना सेकुलर क्रेडेंशियल छोड़कर हिन्दू तुष्टिकरण की तरफ झुक गया है, तो कांग्रेस के लिए मुस्लिम वोटरों को अपनी ओर खींचने का भी एक अवसर है। एक दौर में कांग्रेस की तरफ मुस्लिमों का झुकाव रहा है। ऐसे में जदयू के मुस्लिम वोटरों के कांग्रेस की तरफ आने की संभावना दिख रही है। कांग्रेस की मजबूती के लिए ये जरूरी भी है,” उन्होंने कहा।
दूसरी तरफ, दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष और दलित समाज से ही आने वाले राजेश कुमार को पार्टी का बिहार अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस दलितों को भी अपनी तरफ आकर्षित करना चाहती है।
प्रो. पुष्पेंद्र ये भी मानते हैं कि राहुल गांधी ने निजी क्षेत्रों में आरक्षण का जो मुद्दा उठाया है, उससे भी पार्टी को फायदा हो सकता है।
“एक वक्त था जब पब्लिक सेक्टर सबसे अधिक रोजगार दिया करता था, तो पब्लिक सेक्टर में आरक्षण दिया गया। इसी तरह उस वक्त सरकारी शैक्षणिक संस्थान ही थे, तो वहां भी आरक्षण का प्रावधान किया गया था। लेकिन अब प्राइवेट सेक्टर ज्यादा रोजगार दे रहा है और शिक्षा में भी निजी सेक्टर का बड़ा हस्तक्षेप है। ऐसे में इन सेक्टरों में आरक्षण नहीं हुआ, तो नाइंसाफी होगी। आरक्षण से इन संस्थानों में विविधता आएगी और वे समावेशी बनेंगे,” उन्होंने कहा, “एजेंडा के तौर पर सही है राहुल गांधी का ये मांग करना।”

कांग्रेस के सामाजिक न्याय की चुनौती
हालांकि, कांग्रेस के लिए सामाजिक न्याय का मुद्दा दोधारी तलवार साबित हो सकता है। सामाजिक न्याय के बल पर दलितों, पिछड़ों व अतिपिछड़ों को अपने पाले में लाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि ऐसा करने पर अपर कास्ट वोटर कांग्रेस से छिटक सकते हैं। वहीं, पिछड़ों व अतिपिछड़ों के कांग्रेस के साथ जाने को लेकर भी संशय है क्योंकि इन वर्गों की राजनीति करने वाली दीगर पार्टियां काफी मजबूत हैं और उनका कोर एजेंडा सामाजिक न्याय है। बल्कि ये कहना ज्यादा सही होगा कि इन पार्टियों की बुनियाद ही सामाजिक न्याय पर टिकी हुई है। दूसरी बात ये है कि पिछड़ा और अतिपिछड़ा कभी भी कांग्रेस का आधार नहीं रहा है। बल्कि इस वर्ग के उभार ने कांग्रेस का नुकसान किया।
पिछले तीन दशकों के बिहार विधानसभा चुनावों के परिणामों को देखें तो कांग्रेस का प्रदर्शन काफी खराब रहा है। साल 1990 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस की लालू प्रसाद यादव के हाथों करारी हार हुई थी। कांग्रेस इस चुनाव में सिर्फ 70 सीटें ही जीत पाई थी और उसे 125 सीटों का नुकसान हुआ था। वहीं, लालू प्रसाद यादव की पार्टी जनता दल ने 122 सीटों पर जीत दर्ज की थी। चुनावी आंकड़े बताते हैं कि उस चुनाव के बाद के सालों में हुए चुनावों में कांग्रेस के वोट बैंक में गिरावट आती गई। आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 1995 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 16.3 प्रतिशत वोट मिले थे और पार्टी महज 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी, साल 2000 में कांग्रेस का वोट प्रतिशत गिरकर 6.47 पर आ गया था और पार्टी महज 21 सीटें ही जीत पाई थी। इसके बाद से लेकर साल 2015 के चुनाव तक कांग्रेस का वोट 9 प्रतिशत से नीचे ही रहा। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जरूर 9.48 प्रतिशत वोट लाया, लेकिन सीटों की बात करें, तो 70 सीटों पर टिकट पाकर पार्टी 19 सीटें ही जीत पाई।
राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, “उत्तर भारत में ओबीसी ने जब राजनीति में खुद को एसर्ट किया, तो कांग्रेस हाशिये पर चली गई। सामाजिक न्याय, कांग्रेस का एजेंडा कभी भी नहीं था। रायपुर अधिवेशन के बाद पार्टी ने सामाजिक न्याय की धारा पकड़ी है। लेकिन सामाजिक न्याय की लाइन पर पार्टी में ढांचागत बदलाव करना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी क्योंकि ऐसा करने पर अपर कास्ट भड़क जाएगा।”
लेकिन, ये कांग्रेस के लिए इकलौती चुनौती नहीं है। केंद्र में सत्तासीन भाजपा सरकार राहुल गांधी के उठाये गये मुद्दों को लागू कर उन मुद्दों को आसानी से डिफ्यूज कर देगी। जैसा कि जाति जनगणना की घोषणा कर भाजपा सरकार ने किया है। जाति जनगणना कराने का मुद्दा कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) समेत तमाम विरोधी पार्टियां लगातार उठा रही थीं, तो पिछले दिनों भाजपा सरकार ने देशभर में जाति जनगणना कराने का ऐलान कर दिया।
“राहुल गांधी निजी क्षेत्रों में आरक्षण का मुद्दा उठा रहे हैं, तो भाजपा इस मुद्दे को भी डिफ्यूज करने के लिए निजी क्षेत्रों में आरक्षण लागू कर सकती है। उसे इससे कोई दिक्कत नहीं है,” महेंद्र सुमन कहते हैं।
कांग्रेस के लिए तीसरी चुनौती अपनी ही गठबंधन पार्टियों से मिलने वाली है क्योंकि गठबंधन में शामिल पार्टियों का कोर एजेंडा ही सामाजिक न्याय है, ऐसे में अगर कांग्रेस भी उसी सामाजिक न्याय को अपना केंद्रीय मुद्दा बना रही है, तो एक तरह से वह गठबंधन पार्टियों के जनाधार में ही सेंधमारी करेगी।
महेंद्र सुमन कहते हैं, “अभी तक गठबंधन पार्टियों की तरफ से किसी तरह की आपत्ति नहीं आई है, लेकिन जब उन्हें अहसास होगा कि इससे उनके वोट बैंक में सेंध लग रही है तो गठबंधन में दिक्कतें बढ़ेंगी।”
जानकारों का कहना है कि मौजूदा समय में जब ध्रुवीकरण अपने चरम दौर में है, राहुल गांधी के पास सामाजिक न्याय के अलावा और कोई मुद्दा नहीं था, जिसके बल पर वह भाजपा को चुनौती दे पाते, इसलिए उन्हें इसे ही कोर मुद्दा बनाया।
लेकिन, सवाल ये है कि क्या वोटर कांग्रेस के सामाजिक न्याय के कॉल पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देंगे?
महेंद्र सुमन इस पर कहते हैं, “राहुल गांधी जो कर रहे हैं, वह प्रयोग है। ये लोगों में कैसे प्रतिध्वनित करेगा कहना मुश्किल है, लेकिन देश की एक बड़ी आबादी पर ध्रुवीकरण का जो रंग चढ़ गया है, उस रंग को हटाकर अन्य रंग चढ़ाना आसान नहीं है।”
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