29 मई को पटना शहर और खासकर भाजपा दफ्तर से बेली रोड होते हुए पटना एयरपोर्ट जाने वाली सड़क का रंग पूरी तरह बदला हुआ था। 6 किलोमीटर सड़क की दोनों तरफ पोस्टर लगे थे, जिन पर ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया गया था। ऐसे ही एक पोस्टर पर लिखा था – जो सिंदूर मिटाने निकले थे, उन्हें मिट्टी में मिलाया है।
कई जगह तोरणद्वार बनाये गये थे, जिन पर भारत की मिसाइलों के कटआउट्स लगाये गये थे। वहीं, सड़क के किनारे अलग अलग जगहों पर एक दर्जन से अधिका स्टेज बनाये गये थे, जहां देशभक्ति गाने बज रहे थे।
Also Read Story
ऐसा लग रहा था कि आजादी दिवस मनाया जा रहा है। लेकिन, वास्तव में सारी तैयारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो के लिए थी। नरेंद्र मोदी शाम को पटना एयरपोर्ट पहुंचे और एयरपोर्ट के नये टर्मिनल का उद्घाटन किया। इसके बाद उनका रोड शो शुरू हुआ, जो लगभग एक घंटे चला। इस दौरान वह एकबार भी वह गाड़ी से बाहर नहीं निकले। रोड शो खत्म करने के बाद मोदी, भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे, जहां भाजपा सांसदों व वरिष्ठ पार्टी नेताओं को संबोधित किया। इसके बाद उन्होंने बिहार के डिप्टी सीएम व पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार सिन्हा के बेटे की रिंग सेरेमनी में शिरकत की।
गौरतलब हो कि 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 26 पुरुष सैलानियों को उनके परिवार के सामने आतंकियों ने हत्या कर दी थी। इस घटना के दो दिन बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र ने मधुबनी में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने कहा था कि हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों को कल्पनातीत सजा मिलेगी, 29 मई के रोडशो के अगले दिन मोदी ने रोहतास के काराकाट में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मधुबनी के अपने वादे को याद करते हुए कहा कि बिहार में उन्होंने ये वादा किया था और इस वादे को पूरा करने के बाद ही बिहार में दोबारा आये हैं।
उन्होंने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, “सासाराम के नाम में भी राम है। राम व उनके कुल की रीत है – प्राण जाई पर वचन न जाई। यानी जो वचन दिया, वह पूरा होकर रहेगा। अब यही नये भारत की नीति है। मैंने बिहार की धरती पर वादा किया था कि आतंकी व उनके पाकिस्तानी आकाओं को मिट्टा में मिला दूंगा। मैं अपने इस वचन को पूरा करने के बाद ही बिहार की धरती पर आया हूं।”
अक्टूबर-नवम्बर में चुनाव
गौरतलब हो कि बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवम्बर में विधानसभा चुनाव होने वाला है। ऐसे में रोडशो के दौरान ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े पोस्टर, मिसाइलों के कट आउट्स लगाने को विपक्षी पार्टियां सैन्य कार्रवाई का राजनीतिकरण और इस अभियान का बिहार में चुनाव लाभ लेने की कवायद मान रही हैं।
विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश महासचिव अरुण कुमार ने कहा कि भाजपा का ये प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण है। “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के लोग इसे अपनी निजी उपलब्धि बताकर चुनाव में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव को देखते हुए सेना के शौर्य को प्रधानमंत्री नरेंद्र निजी उपलब्धि बताने की कोशिश कर रहे हैं, जो गलत है,” उन्होंने कहा।
उल्लेखनीय हो कि बिहार में भाजपा वर्ष 2005 से ही सत्ता में भागीदार है, लेकिन जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के जूनियर पार्टनर के तौर पर। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 74 सीटों पर जीत दर्ज की और जदयू को महज 43 सीटों पर जीत मिली, मगर फिर भी जदयू सुप्रीमो नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने। बिहार भाजपा के अंदरखाने अक्सर ये मांग उठती रही है कि पार्टी को अकेले चुनाव लड़ना चाहिए और अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहिए, लेकिन उनकी मांग अनसुनी रह गई।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन पूर्व के चुनाव के मुकाबले खराब रहा जिसकी वजह से केंद्र में सरकार चलाने के लिए भाजपा, जदयू और अन्य क्षेत्रिय पार्टियों पर निर्भर है। इसलिए इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भी भाजपा जोखिम नहीं ले सकती। लेकिन, सूत्र बताते हैं कि वह यह जरूर कोशिश कर रही है कि भाजपा पिछले चुनाव के मुकाबले अधिक सीट लाए और अन्य गठबंधन दलों को नुकसान हो, ताकि पार्टी, मुख्यमंत्री पद या अन्य महत्वपूर्ण विभागों के लिए अपने दावे को मजबूती दे सके। और इसके लिए भाजपा हर संभव कोशिश कर रही है और ऑपरेशन सिंदूर का प्रचार प्रसार इसी कोशिश का हिस्सा है।
क्या गैर-एनडीए वोटरों को तोड़ पाएगी भाजपा
लेकिन, 29 मई को हुआ रोडशो काफी बुझा-बुझा सा था। लोगों की वैसी भीड़ नहीं थी, जैसी उम्मीद की जा रही थी। कई जगहों पर तो कोई दर्शक नहीं था। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऑपरेशन सिंदूर को लेकर लोगों में कोई उत्साह नहीं है और इसका चुनाव लाभ भाजपा को नहीं मिलेगा?
हालांकि, किसी मुद्दे पर वोट मिलेगा या नहीं, ये इस बात से तय नहीं होता है कि उस मुद्दे पर लोगों की भीड़ जुटी है कि नहीं। 29 मई को पटना में भीषण गर्मी थी, तो बहुत संभव है कि इस वजह से भी लोग घरों से नहीं निकले। दूसरी बात ये है कि भीड़ का जुटना या न जुटना इस बात पर भी निर्भर करता है कि भीड़ जुटाने के लिए जिस प्रबंधन को लगाया था, वो जमीन पर प्रभारी ढंग से काम किया या नहीं।
पटना के पत्रकार दीपक मिश्रा कहते हैं, “कई बार किसी पार्टी की रैलियों में बहुत भीड़ जुटती है, लेकिन उसे वोट नहीं मिलता, इसलिए भीड़ को पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। मगर, ग्राउंड पर जो दिख रहा है, उससे पता चलता है कि ऑपरेशन सिंदूर, एनडीए के जो पारम्परिक वोटर हैं, उनके और मजबूती के साथ एनडीए से जुड़े रहने में मदद करेगा लेकिन ये अभियान इंडिया अलायंस के वोटरों को रिझा नहीं सकेगा। इसकी वजह ये है कि लोगों में ऑपरेशन सिंदूर से उत्साह कम और निराशा अधिक है क्योंकि उन्हें लगता है कि भारत के पास इस बार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) को वापस पाने का मौका था, जिसे सीजफायर कर गंवा दिया गया।”
पटना के पत्रकार रमाकांत चंदन भी मानते हैं कि भाजपा को इस चुनाव में ऑपरेशन सिंदूर का लाभ मिल सकता है। उन्होंने कहा, “देशभक्ति ऐसा मुद्दा है, जिससे लोग बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं और पूरी भाजपा ऑपरेशन सिंदूर को नरेंद्र मोदी के अभियान के तौर पर प्रचारित कर रही है, इसलिए इसका लाभ भाजपा को होगा।”
मगर, ऑपरेशन सिंदूर का चुनावी लाभ लेने के लिए, लोगों में इस अभियान की याद को लम्बे समय तक जिंदा रखना होगा। “भाजपा ने इसकी पूरी तैयारी कर रखी है कि चुनाव तक ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कुछ न कुछ होता रहे। चूंकि सरकार की तरफ से कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है, तो संभव है कि दो तीन महीने बाद सेना फिर इसी तरह की कोई कार्रवाई कर दे,” रमाकांत चंदन ने कहा।
सीमांचल की ज़मीनी ख़बरें सामने लाने में सहभागी बनें। ‘मैं मीडिया’ की सदस्यता लेने के लिए Support Us बटन पर क्लिक करें।



















