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सत्ताधारी दल के करीब आते ही अनंत सिंह और राजब्बलभ यादव क्यों हो गये अदालत से बरी?

इन दोनों मामलों में जिस तरह सत्ताधारी दल से नजदीकी होते ही उच्च अदालत ने संगीन मामलों में भी संदेह का लाभ देते हुए दोनों नेताओं को बरी कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सत्ताधारी पार्टियां न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं?

Reported By Umesh Kumar Ray |
Published On :
why were anant singh and rajballabh yadav acquitted by the court as soon as they came close to the ruling party

नाबालिग से रेप के मामले में निचली अदालत से सात साल पहले दोषी करार दिये गये राजद के पूर्व नेता व विधायक राजबलल्भ यादव को बीते दिनों पटना हाईकोर्ट ने ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया।


पटना हाइकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राजबल्लभ यादव व अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष, पीड़िता के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। बचाव पक्ष की तरफ से हाईकोर्ट में कहा गया था कि पीड़िता के वकील की तरफ से पेश किये गये गवाहों के बयान में विरोधाभास है और घटना के संबंध में भी जो विवरण दिये गये थे, उनमें असंगतियां थीं।

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पटना हाईकोर्ट ने भी उपलब्ध सबूतों को अपार्याप्त मानते हुए कहा, “अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किये गये साक्ष्य के आधार पर व मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए हम इस विचार से सहमत हैं कि अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।” “हमारी राय में ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज की गई सजा के निष्कर्ष टिकने योग्य नहीं हैं और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता है। अतः अपीलकर्ताओं को उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों से बरी किया जाता है,” अदालत ने अपने आदेश में लिखा।


नाबालिग से रेप मामले में हुए थे गिरफ्तार

गौरतलब हो कि फरवरी 2016 में एक नाबालिग ने आरोप लगाया था कि जन्मदिन की पार्टी के बहाने उसे वाहन में गिरियक स्थित एक मकान में ले जाया गया था जहां उसने शराब पीने से इनकार किया था, तो उसके कपड़े उतार दिये गये थे और मुंह में कपड़ा ठूंसकर एक व्यक्ति ने उससे दुष्कर्म किया था। नाबालिग का यह भी कहना था कि एक महिला ने उसे वहां भेजने के एवज में आरोपी से 30 हजार रुपये लिये थे।

निचली अदालत में इस केस की सुनवाई चली, जिस दौरान पीड़िता की तरफ से 20 गवाह और बचाव पक्ष की तरफ से 15 गवाह पेश किये गये। दिसम्बर 2018 में निचली अदालत ने अंतिम फैसला सुनाते हुए राजबल्लभ यादव, सुलेखा देवी और राधा देवी को आजीवन कारावार की सजा सुनाई थी और अन्य तीन दोषियों को 10-10 साल की सजा दी थी।

अदालत ने राजबल्लभ यादव को इंडियन पीनल कोड की धारा 376 व पॉक्सो एक्ट की धारा 4 व 8 के तहत दोषी माना था जबकि अन्य अभियुक्तों राधा देवी व सुलेखा देवी को इंडियन पीनल कोड की धारा 109, 120बी व पॉक्सो एक्ट की धारा 4 व 8 के तहत दोषी करार दिया था। उम्र कैद की सजा मिलने के साथ ही राजबल्लभ यादव की विधायकी भी चली गई थी। वह नवादा से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के टिकट पर विधायक का चुनाव जीते थे।

उनकी पत्नी विभा देवी को राष्ट्रीय जनता दल ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव में नवादा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वह चुनाव नहीं जीत सकीं। राष्ट्रीय जनता दल ने साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भी विभा देवी को नवादा सीट से टिकट दिया। इस बार उन्होंने जीत दर्ज की।

दिलचस्प बात ये है कि इधर राजबल्लभ यादव को पटना हाईकोर्ट से बरी कर दिया और इसके लगभग एक हफ्ते बाद ही उनकी पत्नी विभा देवी भाजपा में शामिल हो गईं। 22 अगस्त को गयाजी में हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम में मंच पर विभा देवी भी नजर आईं। विभा देवी के अलावा राजद के एक अन्य विधायक प्रकाश वीर भी उसी रोज भाजपा में शामिल हुए।

माना जा रहा है कि इस बार भाजपा नवादा सीट से विभा देवी को टिकट दे सकती है, हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में नवादा सीट जदयू के खाते में गई थी। संभव है कि इस बार भाजपा इस पर अपना दावा ठोके।

आर्म्स एक्ट में दोषी थे अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार

मोकामा के बाहुबली नेता व ‘छोटे सरकार’ के नाम से मशहूर अनंत सिंह, अपने इंटरव्यू में अंतरगी जवाबों के लिए भी जाने जाते हैं और सोशल मीडिया पर छाये रहते हैं, के मामले में भी ऐसा ही हुआ था। आर्म्स एक्ट में उन्हें निचली अदालत ने दोषी करार दिया, लेकिन जैसे ही उनकी पत्नी नीलम देवी ने राजनीतिक पार्टी बदली उन्हें पटना हाईकोर्ट ने बरी कर दिया।

उल्लेखनीय हो कि साल 2015 में अनंत सिंह के मकान से एके-47 राइफल, ग्रेनेड व कारतूस बरामदगी के मामले में उनके खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। उस समय वह जदयू से विधायक थे। माना जा रहा था कि जदयू के शीर्ष नेतृत्व ने उनकी नकेल कसने के लिए उन पर आर्म्स एक्ट लगाया था।

मामला कोर्ट में चलता रहा और इस बीच साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने मोकामा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। बाद में वह राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो गये और साल 2020 का चुनाव उन्होंने राजद के टिकट पर लड़ा और जीत दर्ज की।

चुनाव के महज दो साल बाद साल 2022 में निचली अदालत ने आर्म्स एक्ट मामले में उन्हें दोषी करार दिया और 10 साल की सजा सुनाई। दोषी करार दिये जाने के चलते उनकी विधायकी चली गई, तो उनकी पत्नी नीलम देवी राजनीति में सक्रिय हुईं और राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर मोकामा से ही उपचुनाव लड़ा तथा जीत दर्ज की।

लेकिन, साल 2024 में एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत जब जदयू-राजद गठबंधन टूटा और नीतीश कुमार वापस एनडीए में चले गये, तो विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के वक्त नीलम देवी एनडीए विधायकों के साथ नजर आईं और एनडीए सरकार के पक्ष में वोटिंग की।

इस घटना के बाद अनंत सिंह को जेल से राहत मिलने लगी। लोकसभा चुनाव में उन्हें एनडीए प्रत्याशी का प्रचार करने के लिए दो हफ्ते का पैरोल दिया गया और पिछले साल अगस्त में पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए आर्म्स एक्ट में उन्हें बरी कर दिया।

पटना हाईकोर्ट से बरी होने के बाद अनंत सिंह लगातार नीतीश कुमार की तारीफ कर रहे हैं। उनकी पत्नी फिलहाल जदयू में हैं और संभवतः इस बार उनकी जगह अनंत सिंह को मोकामा से उतारा जा सकता है क्योंकि अनंत सिंह सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि उनकी पत्नी ने विधायक रहते क्षेत्र में काम नहीं किया, जिससे जनता नाराज है। हालांकि, पिछले चुनाव में ये सीट बीजेपी को मिली थी।

उच्च अदालतों में सरकार बरतती है ढिलाई!

इन दोनों मामलों में जिस तरह सत्ताधारी दल से नजदीकी होते ही उच्च अदालत ने संगीन मामलों में भी संदेह का लाभ देते हुए दोनों नेताओं को बरी कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सत्ताधारी पार्टियां न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं?

राष्ट्रीय जनता दल ने कोर्ट के फैसले पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया, लेकिन भाजपा-जदयू पर निशाना साधा।

पार्टी के प्रवक्ता जयंत जिज्ञासु कहते हैं, “हमलोगों का ये सिद्धांत रहा है कि अगर कोई व्यक्ति अंतिम रूप से दोषी करार नहीं दिया जाता है, तो हमलोग उसकी विचहंटिंग नहीं करेंगे लेकिन भाजपा और जदयू ये सब करते हैं।”

“भाजपा और जदयू के लोगों ने राजबल्लभ यादव को क्या नहीं कहा, लेकिन अब वो कोर्ट से बरी हो गये, तो दोनों पार्टियों को माफी मांगनी चाहिए, क्योंकि वे एक्सपोज़ हुए हैं,” जिज्ञासु ने कहा।

इस सवाल पर सत्ताधारी भाजपा का कहना है कि न्यायापालिकाओं में सत्ता का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। भाजपा के एक प्रवक्ता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, “ये बकवास बात है कि न्यायिक फैसलों में सत्ताधारी दलों का हस्तक्षेप होता है। जिन दोनों मामलों का आप जिक्र कर रहे हैं; अगर पटना हाईकोर्ट के फैसलों से विपक्षी दल संतुष्ट नहीं है, तो वो सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है। उनके पास सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता तो है ही।”

हालांकि, विपक्षी पार्टियों के लिए ये मुमकिन नहीं है क्योंकि वो इन दोनों ही मामलों में पार्टी नहीं है। अनंत सिंह के खिलाफ आर्म्स एक्ट का मामला अनंत सिंह बनाम बिहार सरकार है। और राजबल्लभ यादव के मामले में दूसरी पार्टी पीड़ित नाबालिग है, जिसका केस बिहार सरकार लड़ रही है यानी ये मामला भी राजबल्लभ यादव बनाम बिहार सरकार है।

ऐसे में ऊपरी तौर पर भले ही ये लग रहा है और काफी हद ये सच भी है कि न्यायिक फैसलों में सत्ताधारी दलों का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है, लेकिन ये तो बिल्कुल संभव है कि जब इन दोनों मामलों में पार्टी बिहार सरकार है, तो सरकार की तरफ से पैरवी करने वाले अधिवक्ताओं ने पटना हाईकोर्ट में उस मजबूती के साथ दलील नहीं रखी होगी, जिसके चलते पटना हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों को संदेह का लाभ दिया।

कानून के जानकारों का भी कुछ ऐसा ही मानना है। वे बताते हैं कि आपराधिक मामलों में दोषियों को सजा तभी दी जाती है, जब उस पर आरोप बिना किसी संदेह के साबित होता है। निचली अदालत इसे ध्यान में नहीं रखती है और आरोपियों को सजा देती है, तो उच्च अदालतों में उन आरोपियों को राहत मिलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

पटना हाईकोर्ट के वकील शाश्वत कहते हैं, “क्रिमिनल केसों में किसी भी अभियुक्त को सज़ा तब दी जाती है जब उसपे आरोप बिना किसी संदेह के साबित होता है। मगर, इस सिद्धांत के दुरुपयोग होने की सम्भावनाएँ काफ़ी प्रबल होती हैं और अभियुक्तों के लिए एक ‘ग्रे जोन’ बन जाता है।”

खास तौर पर अगर कोई अभियुक्त राजनीति से जुड़ा हो और प्रभावशाली हो, तो वो इसका लाभ आसानी से उठा लेता है। वह इस संबंध में बिहार में हुए तमाम जातीय नरसंहारों का उदाहरण देते हैं, जिनमें पीड़ित पक्ष राजनीतिक और सामाजिक तौर पर बेबस थे जबकि पीड़क पक्ष प्रभुत्वशाली था जिसकी वजह से अधिकांश मामलों में दोषी उच्च अदालतों से बाइज्जत बरी हो गये।

“गौर करने वाली बात ये है कि ऐसे अभियुक्त जिनका राजनैतिक गलियारों में दबदबा है वो इन संभवानाओं को उच्च न्यायालयों में अपील के ज़रिए लाभ उठा पाते हैं। ऐसे केसों में एक और महत्वपूर्ण पहलू होता है सरकारी एजेंसियां, यानी कि पुलिस और सरकारी वकीलों का रवैया। अमूमन हाई प्रोफाइल केसों में पुलिस और सरकारी वकील बैक सीट पर बैठे दिखते हैं और ऐसे केसों को हाथ से फिसलने देते हैं। अगर पीड़ित पक्ष के पास उपयुक्त संसाधन और बल नहीं होता है तो अक्सर वो ऐसे मामलों में बेबस ही नज़र आये हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है बिहार में हुए जातीय नरसंहार केसों में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गये आदेश। हालांकि, कई ऐसे केस अभी सर्वोच्च न्यायालय के सामने लंबित हैं,” शाश्वत ने कहा।

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Umesh Kumar Ray started journalism from Kolkata and later came to Patna via Delhi. He received a fellowship from National Foundation for India in 2019 to study the effects of climate change in the Sundarbans. He has bylines in Down To Earth, Newslaundry, The Wire, The Quint, Caravan, Newsclick, Outlook Magazine, Gaon Connection, Madhyamam, BOOMLive, India Spend, EPW etc.

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