सीमांचल के अररिया जिले में पिछले कुछ वर्षों से अज़गर सांप बहुतायत संख्या में दिख रहे हैं। जिले के अलग-अलग इलाकों में अजगर दिखने की सूचना पर इन्हें वनकर्मियों, रेंजरों आदि के द्वारा रेस्क्यू करके अररिया वन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अररिया रेंज के आजमनगर-कुसियारगांव स्थित सुरक्षित वन क्षेत्र और फारबिसगंज रेंज के अंतर्गत रानीगंज वृक्ष वाटिका में डाल दिया जाता है।
रानीगंज वृक्ष वाटिका में रेस्क्यू करके रखे गए कुल अजगरों की संख्या की जानकारी देते हुए फारबिसंज रेंज के वन क्षेत्र पदाधिकारी (RFO) रेंजर दिनेश प्रसाद यादव बताते हैं, “पिछले 10-12 वर्षों में 55 से 60 अज़गर को रेस्क्यू करके यहां रखा गया है। इनमें से 10 से 15 अजगर को तो पिछले तीन वर्षों में मेरी पदस्थापना के बाद रेस्क्यू किया गया है। अब हालात तो ऐसे हो गए हैं कि यहां काफी हो चुके हैं इसलिए वन विभाग के हमारे वरीय अधिकारियों के द्वारा यहां रखने से मना किया है। अब अगर कहीं से अजगर रेस्क्यू करते हैं तो उसे अररिया स्थित सुरक्षित वन क्षेत्र में छोड़ आते हैं।”
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आसपास के गांवों में लगातार रेस्क्यू के बाद भी कभी-कभार अजगर दिखने के सवाल पर वे कहते हैं कि इस वृक्ष वाटिका में चारों ओर से की गई चहारदिवारियों के नीचे सियार जब मिट्टी की खुदाई करके गड्ढे बना देते हैं तो यहीं के अजगर बाहर निकल कर सड़कों या टोलों में चले जाते हैं। इतनी संख्या में अज़गर यहां छोड़ा गया है कि जब वे अंडे देंगे और उससे बच्चे निकलेंगे तो भविष्य के लिए खतरा बन सकता है। अभी यहां बने तालाब में मछलियां उन्हें भोजन के रूप में मिल जाती हैं बाद में ये आसपास में जाकर छोटे बच्चों और जानवरों को अपना शिकार बना सकते हैं।
उल्लेखनीय हो कि प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) की रेड डाटा लिस्ट में अजगर को ‘संकटग्रस्त’ श्रेणी के अंतर्गत सूचीबद्ध किया गया है। साथ ही इन्हें भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I (भाग II) और लुप्तप्राय वन्य जीवों और वनस्पतियों की अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) के परिशिष्ट II में भी शामिल किया गया है।

डेढ़ दशक से दिख रहे अजगर
पिछले 20 वर्षों से रानीगंज वृक्ष वाटिका में काम कर रहे वनकर्मी रामजी पासवान बताते हैं कि इस क्षेत्र में पहले कभी अजगर नहीं देखा गया था। 2012 के आसपास अजगर मिलना शुरू हुआ था। उस वक़्त प्रखंड क्षेत्र के मिर्जापुर गांव में एक बरसाती गड्ढे में ठंड के समय ही पहली बार एक अजगर लोगों को दिखा था, जो करीब 9 फुट और 25 से 30 किलो वजन का रहा होगा। उसे रेस्क्यू करके लाया गया था। इसके बाद से अब तक अलग-अलग गांवों से 55 से 60 अजगर को रेस्क्यू किया गया।
वहीं, कुसियारगांव स्थित बायोडायवर्सिटी पार्क में तीन साल से पदस्थापित वनरक्षी मोहम्मद अरमान कहते हैं, “पहले अजगर इधर नहीं दिखता था परंतु पिछले छह महीने में आसपास के इलाके, गांव से हमलोग स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों की सूचना पर 5 से 6 अजगर रेस्क्यू करके लाए और पार्क के सामने आजमनगर-कुसियारगांव स्थित सुरक्षित वन क्षेत्र में छोड़े हैं। सभी की औसत लंबाई 10-12 फुट और वजन 40 से 50 किलो रहा होगा।”
हाल के वर्षों में ज्यादा अजगर देखे जाने के सवाल पर अररिया रेंज के वनरक्षी मोहम्मद अरमान बताते हैं कि अररिया जिला बाढ़ग्रस्त क्षेत्र है। यहां प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ और इससे पूर्व आई भीषण बाढ़ के कारण भी अजगर दूसरे जगहों से पानी से होते हुए इधर आए हुए हो सकते हैं, जो क्षेत्र में बाढ़ का पानी सूख जाने के बाद दिख जाते हैं। इसके अलावा कोसी नदी से जुड़े नहर भी इस जिले में हैं, जिनमें सिंचाई के लिए छोड़े गए पानी के जरिए भी इधर आए हैं, ऐसी संभावना है।
रानीगंज वृक्ष वाटिका के आसपास के लोगों और कुसियारगांव वन क्षेत्र के समीप के अधिकतर ग्रामीणों की मानें तो वो भी वनरक्षी मोहम्मद अरमान, वनकर्मी रामजी पासवान की बातों से सहमति जताते हुए हुए बताते हैं कि अजगर इधर पहले न के बराबर दिखता था परन्तु 2008 की कुसहा त्रासदी के बाद जहां-तहां दिखने लगा है।
जलवायु परिवर्तन और बाढ़ का असर
सांपों की रिहाइश में इस बदलाव को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है। करीब दो वर्ष पूर्व जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा के अंक में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण लंबाई व वजन में दुनिया की सबसे बड़ी सरीसृप प्रजातियों में से एक बर्मी अजगर (पी. बिविटैटस), जो भारतीय रॉक अजगर (पी. मोलुरस) से मिलते-जुलते हैं, को भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों से गंगा बेसिन के पश्चिम की ओर ज्यादा देखा जा रहा है। गंगा नदी बेसिन भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग एक तिहाई है।
इस अध्ययन के लेखक देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से जुड़े पिचैमुथु गंगाईमारन, आफताब आलम उस्मानी, सी. एच. विष्णु, रुचि बडोला और सैयद ऐनुल हुसैन हैं।
अररिया व रानीगंज रेंज में मिले अजगर के रंग-रूप, लंबाई-वजन जैसा कि वन विभाग के अधिकारियों के द्वारा बताया गया वो बर्मी अजगर से समानता दर्शाते हैं परन्तु वन विभाग के लोग इसको लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। अध्ययन के अनुसार बर्मी अजगर भारतीय रॉक अजगर की सहोदर प्रजाति मानी जाती है। हालांकि बर्मी अजगर, रॉक अजगर से कई मायनों में भिन्न भी हैं। भारतीय रॉक अजगर में आंख के ऊपर, सिर के कुछ हिस्से और जीभ हल्के गुलाबी रंग के होते हैं। जबकि बर्मी अजगर में जीभ नीले-काले रंग की होती हैं और सिर पर कोई गुलाबी रंग नहीं होता है। 20 फीट तक इसकी लंबाई होती है।
जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में छपे इस अध्ययन में बताया गया है कि अजगर जैसे सरीसृप विषमतापी और पर्यावरण की तापीय विशेषताओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील भी होते हैं। स्थलाकृतिक संरचनाओं की तुलना में जलवायु संबंधी कारकों से अजगर जैसे सरीसृप अधिक प्रभावित होते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण के तापमान में थोड़ी परिवर्तन भी उनकी दैनिक गतिविधियों और जीवन रक्षा को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा वर्षा और वनस्पति आवरण भी इनके स्थान परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हैं। शीतकाल के दौरान शरीर का कम तापमान अजगर में शारीरिक तनाव पैदा करता है और इसकी मृत्यु का कारण बन सकता है।
अध्ययन में आगे बताया गया कि मूल रूप से अजगर उष्णकटिबंधीय वर्षावनों उपोष्णकटिबंधीय जंगलों में रहने वाला सरीसृप है, जिनमें शुष्क वन, दलदल, स्थायी तालाब, मैंग्रोव वन, आर्द्रभूमि आते हैं। इस कारण जिस जगह ऐसी जलवायु मिलती है अजगर का फैलाव उस ओर होता है। गंगा मैदान का तापमान औसतन 21° सेल्सियस से कम नहीं होता है और सबसे गर्म महीने में अधिकतम तापमान 40° सेल्सियस होता है। इस प्रकार गंगा के मैदान का वायुमंडलीय तापमान भी अजगर के लिए बहुत अनुकूल है।
चूंकि संपूर्ण बिहार गंगा के मैदानी भाग में स्थित होने के कारण, गंगा के बेसिन के दायरे में आता है। अररिया, उत्तरी बिहार का हिस्सा है व गंगा बेसिन से दूरस्थ लेकिन हल्का सटा इलाका है। कोसी व इसकी सहायक नदियां कटिहार के कुर्सेला में जाकर गंगा नदी में मिलती भी है। साथ ही यहां की जलवायु भी उपोष्णकटिबंधीय है तो इस शोध से इस बात की संभावना है कि इसी वजह से जिले में अजगर ज्यादा दिख रहे हैं। नेपाल के हिमालयी क्षेत्र के सुनसरी से होते हुए निकलने वाली कोसी नदी के द्वारा इस इलाके में लगभग प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ और 2008 व 2017 में आई प्रलयंकारी बाढ़ अजगर ज्यादा दिखने की वजह लोग मानते भी हैं।
जानकार बताते हैं कि बाढ़ के बाद जिले में भारी जलजमाव वाले क्षेत्रों में दलदल की स्थिति बनती है तो कई जगह वे छोटे-छोटे तालाब की शक्ल में आ जाते हैं। इस कारण उधर से आए अजगर को अनुकूल परिस्थितियां इधर मिलती हैं व भोजन के रूप में मछलियां भी मिल जाती हैं, जिनसे इनकी संख्या में इधर वृद्धि देखी जा सकती है।
पारिस्थितिकी, पर्यावरण, कृषि और संबद्ध विज्ञानों पर निकलने वाली भारत की एक लोकप्रिय पत्रिका ई-प्लैनेट (e-planet) में ए. सिंह, के. पुरी, आर. जोशी के द्वारा 2021 में छपे एक शोध में कहा गया है – “उपलब्ध साहित्य और हमारे क्षेत्र अवलोकन संकेत देते हैं कि भारतीय और बर्मी अजगर ऊपरी गंगा के मैदानों के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं।”
अवलोकन यह भी दर्शाते हैं कि ऊपरी गंगा के मैदान प्रांत में विभिन्न संरक्षित क्षेत्र, उत्तर-पश्चिमी भारत के उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन, बर्मी व भारतीय अजगर के लिए उपयुक्त आवास प्रदान करते हैं। इसकी वजह यह है कि गंगा नदी और मौसमी नदियों का व्यापक जाल अजगर के अस्तित्व और फैलाव में योगदान देता है। अजगर के प्रजनन के महीने दिसंबर से फरवरी तक हैं और अंडे देने का समय मार्च से जून तक है, जिसे आमतौर पर उत्तर भारत में मानसून का मौसम कहा जाता है। इस दौरान गंगा नदी की सहायक नदियों में बाढ़ आती है, इसलिए वन क्षेत्रों में फैली कई तेज धाराएं अजगर के वितरण में सहायता करती हैं।”
ई-प्लैनेट में छपा शोध भी जिले में अजगर की अधिकता का एक उपयुक्त कारण बाढ़ को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर दिखाता है।
जंगल की कटाई की भूमिका
हालांकि, जिले के प्रख्यात पर्यावरणविद्, वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व में विश्व वन्यजीव कोष, इंडिया (World Wide Fund For Nature, India) से जुड़े सुदन सहाय जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टेक्सा व ई-प्लैनेट में छपे शोध से थोड़ा अलग अपना मत रखते हैं। वे कहते हैं – “दक्षिण भारत में चंदन के पेड़ जिस जंगल में होते हैं, उधर ज्यादा अजगर होते हैं। परन्तु अपने जिले में अजगर ज्यादा होने का कारण ये है कि एक समय था जब रानीगंज के पहुंसरा, तमघटी आदि जगहों तथा अररिया के कई इलाके में बेंत (लाठी) की खेती होती थी।”
वह आगे बताते हैं, “साथ ही जिले में जंगल की अधिकता थी, तो अजगर के रहने लायक अनुकूल जगह थी तथा भोजन हेतु उन्हें मेंढक, छोटे-छोटे सांप आदि मिल जाते थे। लेकिन बदलते समय के साथ आबादी बढ़ी, तो लोगों ने आवास व खेती हेतु जंगलों को काट दिया। इससे अजगर से आवास सहित भोजन छीन गया। इस कारण अब वो इधर-उधर दिख रहे हैं। मैं कोसी की बाढ़ को इसकी वजह नहीं मानता हूं और न ही गंगा नदी बेसिन का पूर्णतः ये इलाका है, तो ये भी उपयुक्त कारण मुझे नहीं लगता है। हां, मैं बदलते तापमान व वर्षा के पैटर्न तथा जलवायु परिवर्तन को जरूर उत्तरदायी समझता हूं।”
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