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क्यों सूख रहा है मिथिलांचल का भू-जल?

cropped annu mishra.jpeg Reported By Anima Vatsa |
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why is the groundwater of mithila drying up
2025 में सीतामढ़ी के नेपाल सीमा क्षेत्र में पानी की किल्लत

मधुबनी जिले के मधवापुर प्रखंड के उतरा गांव के लोगों की दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है। यहां के लोगों के दिन की शुरुआत इस चिंता से होती है कि पीने और दैनिक इस्तेमाल के लिए पानी का इंतजाम कैसे होगा। तकरीबन 300 से अधिक घरों वाले इस गांव में पेयजल की भारी किल्लत है, जिससे ग्रामीणों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। पिछले वर्ष पानी का स्तर काफी नीचे चले जाने से ये लोग बूंद-बूंद के लिए तरस गए थे। 


गांव के वार्ड नंबर 4 के निवासी 61 वर्षीय सिकंदर मंडल ने कहा, “पिछले साल जब क्षेत्र में पानी का अकाल पड़ा तो चार-पांच दिनों तक घर में चूल्हा तक नहीं जला। सभी लोगों ने भूंजा और सूखा चना खाकर किसी तरह दिन काटे। बच्चों की स्थिति और भी दर्दनाक थी, वे बिना स्नान किए स्कूल जाने को मजबूर थे, जिससे उनकी सेहत और स्वच्छता दोनों पर असर हो रहा था।”

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सिर्फ घर ही नहीं, खेती पर भी इसका भयावह असर पड़ा। सिकंदर मंडल बताते हैं कि पानी के अभाव में उनकी जमीन सूखकर बंजर हो गई थी। रोजगार के अभाव और हालात से मजबूर होकर बेटे को शहर की ओर पलायन करना पड़ा।


मधुबनी से सटे दरभंगा जिले का मझौलिया गांव भी हर साल कमोबेश ऐसा ही जल संकट झेलता है। यहां की महिलाओं से बात करते हुए उनका दर्द शब्दों से ज्यादा उनकी आंखों से छलकता नजर आया।

ग्रामीण समाज में घर की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा महिलाओं के कंधों पर होता है—चाहे वह भोजन बनाना हो, बच्चों की देखभाल हो या घर का प्रबंधन। लेकिन यहां की स्थिति इतनी भयावह है कि इन बुनियादी जिम्मेदारियों को निभाना भी एक संघर्ष बन चुका है। स्थिति का जायजा लेते हुए जब सुभाष कामत के घर पहुंचे, तो चिलचिलाती धूप में दूर-दूर से पानी ढोकर लाती महिलाओं की थकान और बेबसी साफ दिखाई दी। सुभाष कामत की 49 वर्षीय पत्नी सरस्वती देवी अपनी व्यथा बताती हैं, “सुबह होते ही सबसे बड़ी चिंता पानी की होती है। कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, फिर भी पूरा पानी नहीं मिल पाता। घर का काम, बच्चों की देखभाल – सबकुछ प्रभावित हो रहा है।”

उनकी 19 वर्षीय पुत्री नीलम कुमारी इस संकट के दूसरे पहलू को उजागर करती हैं।

“पानी की कमी से सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं को होती है। दिन का आधा समय सिर्फ पानी लाने में निकल जाता है। हमारी पढ़ाई और बाकी काम सब छूट जाते हैं,” नीलम कुमारी ने कहा।

भूगर्भ जलसंकट के चलते अब गांवों में भी बोतलबंद पानी की घुसपैठ हो गई है, जो गरीबों पर खर्च का अतिरिक्त बोझ डालता है।

आब त गामों कस्बा में बोतले वाला पैन चलए छै, सब चापाकल आ पोखरी सुइख गेलैई (अब तो गांव-कस्बों में भी बोतलबंद पानी ही चल रहा है। सारे चापाकल और पोखर तो सूख गये हैं)।” 

मिथिलांचल दरभंगा ज़िले के केवटी ब्लॉक में गांव–गांव पानी का जार सप्लाई करने वाले ओमप्रकाश चौधरी के ये शब्द मिथिलांचल में गहराते भीषण जलसंकट की ओर इशारा करते हैं।

वह बताते हैं कि पानी की किल्लत सिर्फ मिथिलांचल के शहरों में ही नहीं, बल्कि अब सुदूर गांवों में भी दिखने लगी है।

दरभंगा के दुलारपुर के निवासी बृजमोहन मिश्र ने बताया कि भूजल स्तर नीचे जाने से पानी में मिनरल्स की मात्रा काफी बढ़ गई है। आयरन तो इतना बढ़ गया है कि जिस बर्तन में पानी का उपयोग किया जाता है उसमें बहुत जल्द पीलापन आ जाता है। वासुदेव पासी ने तो यहां तक कहा कि चापाकल के पानी से उनके दांत और नाखून काले हो गए हैं।

बोतलबंद पानी की खपत के चलते ग्रामीण इलाकों में लोगों का घरेलू बजट पर भी असर पड़ा है। स्थानीय निवासी हरिमोहन मिश्र ने बताया कि गांव में पानी की खपत शहर की अपेक्षा ज्यादा है। परिवार बड़ा है तो लगभग हर घर में प्रतिदिन पानी की 2-3 बोतलें खत्म हो जाती हैं। कुल मिलाकर 3 से 4 हजार रुपये हर महीने पीने के पानी पर खर्च हो जाता है। जो खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं, वे दूषित पानी पीकर विभिन्न प्रकार की बीमारियों को न्योता दे रहे हैं।

now even in villages and towns, bottled water is available
“अब तो गांव-कस्बों में भी बोतलबंद पानी ही चल रहा है”

“पग–पग पोखर माछ मखान…” 

“पग पग पोखर, माछ, मखान…” मिथिलांचल की पहचान के लिए ये कहावत कही जाती है, जिसका अर्थ है कि जिस इलाके में हर कदम पर तालाब, मछलियां और मखाना हो, वही मिथिलांचल है।

ये कहावत इसलिए बनी कि इस क्षेत्र में बेतहाशा पानी और पानी में उगने वाले मखाना और मछलियां हुआ करती थीं। बाढ़ का पानी मिथिलांचल के तालाबों को लबालब भर दिया करता था, जिससे भूगर्भ जल भी रिचार्ज हो जाता था। लेकिन, इन दिनों मिथिलांचल क्षेत्र पानी की किल्लत से त्रस्त है। 

लेकिन, ये संकट अचानक नहीं आया है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे आकार लेता गया है। कहीं नल सूख गए हैं, कहीं पानी पीने लायक नहीं बचा और कहीं खेतों तक पानी पहुँचाने की लागत दोगुनी हो चुकी है।

दरभंगा और मधुबनी के कई गाँवों में अब सुबह की शुरुआत नल खोलने से नहीं, बल्कि यह देखने से होती है कि आज पानी आएगा या नहीं। दरभंगा के लक्ष्मीसागर निवासी कामेश्वर झा व अग्नि झा कहते हैं, “पहले एक हैंडपंप पूरे टोले के लिए काफी था। अब चार-पांच चापाकल भी जवाब दे जाते हैं।”

पानी की किल्लत की वजह

आईआईटी पटना के एक अध्ययन के अनुसार, बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र (दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सहरसा आदि) में जल संकट गंभीर है। यहाँ की 600 में से लगभग 250 नदियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। भूजल स्तर में भारी गिरावट (1 से 2.5 फीट नीचे) और आर्सेनिक/आयरन संक्रमण से 33 जिलों के पेयजल में भारी विष (आयरन, आर्सेनिक) घुला है। हालत इतनी दयनीय है कि सीतामढ़ी के 80% इलाके में पानी की कमी है।

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड ने भूजल को लेकर अध्ययन किया जिसमें पाया कि राज्य के 800 भूजल नमूनों में से 20 में नाइट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम/लीटर से ज़्यादा पाई गई। कुछ में तो यह 119 मिलीग्राम/लीटर तक पहुंच गई। अरवल, भागलपुर, भोजपुर, बक्सर, जहानाबाद, कैमूर, कटिहार, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पटना, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर और सीतामढ़ी में नाइट्रेट का स्तर ज्यादा पाया गया है।

ग्रामीण बताते हैं कि जो पानी पहले बिना उबाले पी लिया जाता था, अब वही पानी डर पैदा करता है।

हर साल कोसी और उसकी सहायक नदियाँ खेतों को डुबा देती हैं। महीनों तक पानी दिखाई देता है, लेकिन ये पानी जमीन के नीचे नहीं पहुंच पा रहा। इसकी वजह ये है कि तालाब पाट दिए गए। नाले संकरे कर दिये गये और गांव-कस्बों में कंक्रीट का फैलाव इतना बढ़ गया कि बारिश का पानी बहकर निकल जाता है। जिस पानी को भू-जल का सहारा बनना था, वही बेकार बह जाता है।

स्थानीय और शैक्षिक संस्थानों के शोध/रिपोर्ट बताते हैं कि उत्तर-बिहार का एलुवियल परत असहनीय दबाव झेल रहा है। पटना-आधारित इंजीनियरिंग/हाइड्रोलॉजी शोध समूहों के अध्ययनों से पता चलता है कि कई जगहों पर छिछली परतों का स्टोरेज घट चुका है, इसलिए छोटे बोरिंग का लाभ अस्थायी है और दीर्घकाल में भू-जल को और नीचे धकेल देता है।

गहराते जल संकट का एक बड़ा कारण शहरों और कस्बों का फैलाव भी है। दरभंगा और मधुबनी जैसे शहरों में कंक्रीट बढ़ा, लेकिन रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग सिर्फ़ काग़ज़ों में रह गई।

बारिश का पानी अब जमीन में जाने की बजाय सड़कों से बहकर निकल जाता है। जो पानी जमीन को जिंदा रख सकता था, वही पानी बर्बाद हो रहा है। सरकार की ओर से हर घर नल-जल, जल संरक्षण और रिचार्ज की योजनाएँ ज़रूर चलाई गईं। लेकिन वे ज़मीन पर प्रभावी नहीं हैं। कई जगह नल लगे हैं, पर पानी या तो आता नहीं या पीने योग्य नहीं होता।

शैलो पम्प: तात्कालिक राहत, स्थायी संकट

पिछले 3–4 वर्षों में दरभंगा और मधुबनी क्षेत्र में शैलो बोरिंग पम्प की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। ये कम-गहराई की बोरिंग होती हैं, जो सस्ते में जल्दी पानी दे देती है।

गर्मी आते ही गाँव-गाँव ठेकेदार पहुँच जाते हैं। हर खेत, हर आंगन में मोटर लग जाती है। लेकिन, यही तात्कालिक समाधान भू-जल के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

मधुबनी के एक सब्जी किसान बताते हैं, “साल दर साल पंप चलाने पर बिजली-खर्च और डीजल का खर्च झेलना मुश्किल हो रहा है, लेकिन फिर भी पानी उतना नहीं मिलता।”

dr. manoj kumar, senior scientist, icar national makhana research centre, darbhanga
आईसीएआर–राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार

आईसीएआर-राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार कहते हैं, “दरभंगा-मधुबनी का भू-जल संकट कोई एक रात का परिणाम नहीं है। यह दशकों की कृषि-पॉलिसी, जल-उपयोग की आदतें, बदलता मानसून और कुप्रबंधन का संगम है। शैलो-बोरिंग तात्कालिक राहत तो दे सकती हैं, पर वे समस्या को मिटाती नहीं बल्कि उल्टे वे इसे और गहरे से दबोच लेती हैं।”

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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अणिमा वत्स (अन्नू मिश्रा) बिहार के सुपौल जिले से ताल्लुक रखती हैं। इन्होंने जयपुर मणिपाल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की है। पिछले 5 वर्षों से इन्होंने विभिन्न मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता की है। वर्तमान में पटना में रहकर एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य कर रही हैं। इनकी कई स्वरचित लेख एवं कविताएँ विभिन्न पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुकी हैं।

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