“आज के टाइम में ऊख के खेती कम औकात वाला लोग की चीज नइखे (आज के समय में गन्ना की खेती कम आय वाले किसान नहीं कर सकते)।”
सुबह के 7 बज रहे हैं। विनोद सिंह अपने डेढ़ बीघे खेत के बाहर खड़े हैं, जिसमें 15 लोग गन्ने की फसल काट रहे हैं। इसमें से 6 मजदूर हैं और बाकी लोग अपने पालतू पशुओं के चारे के लिए आए हैं।
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पूर्वी चम्पारण के मच्छरगांवा गांव के रहने वाले विनोद सिंह पास करीब 18 बीघा जमीन है, जो उनके पूर्वजों से उन्हें मिली है। साथ ही वे कुछ जमीन बंटाई पर लेकर भी गन्ना की खेती करते हैं।
इस सीजन में विनोद सिंह ने 12 बीघे गन्ना की खेती की है। उनके खेत में अपने मवेशियों के लिए गन्ने की पत्तियां निकाल रहीं 45 वर्षीय सरिता देवी भी कभी गन्ने की खेती किया करती थीं। लेकिन अब नहीं करतीं। वह कहती हैं, “ई सब बड़का लोग के खेती नु बा अब। हमनी का लगे ना संसाधन बा ना ओतना जमीन। हमनी त खाद आ पटवन में ही बिला जाएम सन (गन्ने की खेती आजकल बड़े जमींदार ही कर पाएंगे, हम लोगों के पास संसाधन और जमीन दोनों नहीं हैं। हम लोग तो खाद और सिंचाई में ही कंगाल हो जाएंगे)।”
थोड़ा और पूछने पर सरिता बताती हैं कि जब 23 साल पहले शादी होकर आई थीं, तो उनके ससुर अपने 6 कट्ठा खेत में गन्ना उगाते थे। “उस समय सिंचाई के लिए कभी पंपसेट का सहारा लेना नहीं पड़ता था। बारिश समय-समय पर हो जाती थी। लेकिन यह सब बीते दिनों की बात हो गई है। अब तो गांव में वही लोग गन्ना की खेती करते हैं जिनके पास ज्यादा जमीन है और उनके पास पैसे के दूसरे स्रोत भी हैं,” उन्होंने कहा।

बदलते मौसम का असर
कभी गन्ना की खेती के लिए सबसे मुफीद माना जाने वाला यह इलाका, आज गन्ना की खेती में क्यों पिछड़ रहा है?
1990 के दशक के बाद से परिस्थितियां बदलने लगीं। इसके दो कारण बताए जाते हैं। पहला कारण है जलवायु परिवर्तन यानी कि मौसम की अनियमितता और दूसरा कारण है चीनी मिलों का बंद हो जाना।
जलवायु परिवर्तन के चलते बारिश का पैटर्न भी बदला है और चूंकि गन्ना एक ऐसी फसल है, जिसमें अधिक पानी की जरूरत पड़ती है, तो कम बारिश का असर गन्ना उत्पादन पर पड़ रहा है।
स्थानीय निवासी 74 वर्षीय महंग पटेल बताते हैं कि पिछले 20 सालों में तो गजब हो गया है। हमारे यहां सूखा शायद ही कभी होता था। “गन्ने को तैयार होने में लगभग 10 से 12 महीने लगते हैं। इस बीच कम से कम दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहले हम सिंचाई के लिए कुछ खास नहीं करते थे क्योंकि मौसम हमेशा हमारे साथ रहता था। लेकिन पिछले दस साल में हमें पता ही नहीं रहता कि कब कैसा मौसम होगा। कभी जब गन्ना बोने का समय होता है यानी अक्टूबर-नवंबर, तो खेतों में पानी लगा रहता है। और जब पानी की जरूरत होती है मार्च और जून में, तो खेत में फसल सूख रही होती है। अब ऐसे में कोई किसान कैसे खेती कर पाएगा,” उन्होंने कहा।

अध्ययन रिपोर्टों से पता चलता है कि बिहार, देश के उन राज्यों में शामिल है, जहां जलवायु परिवर्तन का असर अधिक है। एक गैर सरकारी संगठन काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बिहार देश का पांचवा जलवायु जोखिम वाला राज्य है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पटना मौसम विज्ञान केंद्र के मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार पहले उत्तर बिहार के जिलों (जिसमें पूर्वी चंपारण का इलाका भी आता है ) में मानसून अपने रंग में रहता था और बारिश अच्छी होती थी। साथ ही इस इलाके में नदियां भी हैं, जिस कारण यह इलाका बाढ़ से प्रभावित भी रहता था। लेकिन एक दशक से अजीब सी स्थिति बन पड़ी है। दक्षिणी बिहार के इलाके जो अक्सर सूखा प्रभावित रहते हैं उधर अच्छी बारिश हुई है।
पिछले कुछ सालों से बिहार में मानसून का असामान्य और अनियमित होना कोई नई बात नहीं रह गई है और इसका एक ही कारण है जलवायु परिवर्तन। उत्तर बिहार के चंपारण (पूर्वी और पश्चिमी), सारण और सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर जैसे जिले जो एक दशक पहले तक बाढ़ से प्रभावित रहते थे आज वे सूखे से जूझ रहे हैं। वहीं दक्षिण बिहार के नवादा, अरवल, शेखपुरा, औरंगाबाद और गया जैसे जिले जो कभी सूखा प्रभावित माने जाते थे, पिछले कुछ सालों से वहां सामान्य से अधिक वर्षा हो रही है।
जलवायु परिवर्तन के प्रकोप का प्रभाव सबसे ज्यादा किसानों पर पड़ रहा है। पूर्वी चंपारण के गन्ना किसान भी इसकी जद में हैं। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती है कि पूर्वी चम्पारण में गन्ने का उत्पादन घटा है। साल 2022-2023 में पूर्वी चम्पारण में 20,112 हेक्टेयर में गन्ने की खेती की गई थी, जिसमें 16,28,118 मेट्रिक टन गन्ने का उत्पादन हुआ, जो साल 2023-2024 में घटकर 13,25,554 मेट्रिक हज़ार टन पर आ गया, जबकि साल 2023-2024 में गन्ने की खेती के रकबे में बढ़ोतरी हुई थी। आँकड़ों के अनुसार, साल 2023-2024 में कुल 20,529 हेक्टयर में गन्ने की खेती हुई थी। उत्पादकता की बात करें, तो आँकड़े बताते हैं कि साल 2022-2023 में ज़िले में गन्ने की उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 89 टन थी, जो साल 2023-2024 में घटकर 65 टन पर आ गई। इसके उलट पश्चिमी चम्पारण में महज़ 1 टन की गिरावट दर्ज हुई है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पूर्वी चम्पारण में तुलनात्मक तौर पर कम बारिश हुई। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 में पूर्वी चम्पारण में 798.5 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से लगभग 36% कम है। इसी तरह साल 2022 में पूर्वी चम्पारण में कुल 927.7 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से 25% कम थी।
जलवायु परिवर्तन पर उन्नत अध्ययन केंद्र, राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय पूसा के परियोजना निदेशक व मुख्य वैज्ञानिक डॉक्टर रत्नेश कुमार झा ने बताया, “जलवायु परिवर्तन केवल तापमान बढ़ना नहीं है, बल्कि बदलता मौसम पैटर्न भी गन्ने जैसी लंबी अवधि की फसल के ‘शर्करा चक्र’ को बाधित कर रहा है। मानसून की अनिश्चितता और ‘हीट वेव’ के कारण गन्ने की बढ़वार रुक जाती है, और फसल तय समय से पहले ही परिपक्व हो जाती है, जिससे न केवल वजन में कमी आती है बल्कि रिकवरी दर भी घट जाती है। तराई के इलाकों में जलभराव और सूखे के बदलते पैटर्न भविष्य में चीनी उद्योग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।”
मिलों का बंद होना भी एक वजह
हालांकि, गन्ना अनुसंधान संस्थान पूसा द्वारा बिहार के किसानों को कुछ ऐसे गन्ना बीजों का इस्तेमाल करने के लिए कहा जाता है, जो विपरीत मौसम को झेलने की क्षमता रखते हैं। इन बीजों में CO- 0238 (करण – 4), Cop – 2061, BO – 104 और 154 जैसी गन्ना बीजों की किस्म शामिल हैं। खासकर BO सीरीज की किस्में विशेषकर बिहार के लिए विकसित की गई है। लेकिन, किसानों को इन बीजों की किस्मों के बारे में कुछ खास जानकारी नहीं है।
हमने जब पूर्वी चंपारण के कोटवा ब्लॉक के किसान मोहन यादव से इन बीजों के बारे में पूछा तो उन्हें कुछ नहीं पता। वे कहते हैं, “हम तो करनार, 38, 51 और 24 जैसे बीज ही लगाते हैं। कई और किसानों का भी जवाब ऐसा ही रहा। कई ने तो लोहा टन और दही – चूड़ा जैसे बीजों के किस्म भी बताए। इस तरह के जवाब इस बात को स्पष्ट करते हैं कि गन्ना किसानों की जागरूकता को लेकर सरकार कुछ खास ध्यान नहीं दे रही है और अपनी रिपोर्ट में सरकार ने खुद लिखा ही है गन्ने की पैदावार कम हो रही है।

हालांकि, गन्ना की पैदावार का सिर्फ एक कारण जलवायु परिवर्तन ही नहीं है, पूर्वी चंपारण के इलाके के चीनी मिलों का बंद हो जाना भी इसका एक प्रमुख कारण है।
गौरतलब हो कि उत्तर बिहार का पूर्वी चंपारण क्षेत्र गन्ने की खेती का गढ़ माना जाता था। देश की आजादी से पहले पूरे बिहार में 35 चीनी मिलें हुआ करती थीं। अकेले पूर्वी चंपारण में 3 चीनी मिलें हुआ करती थीं। पूरा बिहार, देश के चीनी उत्पादन में करीब 40 फीसदी का योगदान देता था। लेकिन आज बिहार गन्ना उद्योग विभाग के अनुसार, राज्य में केवल 11 चीनी मिलें ही कार्यरत हैं, जिसमें से केवल नौ ही सुचारु रूप से चल रही हैं। पूर्वी चंपारण में फिलहाल सिर्फ एक सुगौली चीनी मिल ही चल रही है।
मोतिहारी के किसान हिरालाल शाह बताते हैं, “मोतिहारी शहर में चीनी मिल थी, तो ईंख आसानी से मिल में पहुंच जाता था। अब ईंख कोई धान या गेहूं तो है नहीं कि हम उसे खेत से लाकर घर में रखेंगे। जो चीनी मिलें चल रही हैं, वे इतनी दूर हैं कि उतनी दूर ले जाने का किराया ही नहीं है, ना ही कोई ठोस संसाधन, ऐसे में कौन इस ईख के झमेले में पड़े।”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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