कभी कोसी प्रमंडल के खेतों में लहराने वाली जूट की फसल आज धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। खासकर बिहार के सुपौल जिले में जूट की खेती पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। जिस फसल को कभी इलाके की ‘सुनहरी फसल’ कहा जाता था, आज वही फसल किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है।
किसानों का कहना है कि पहले गांव-गांव में जूट की खेती होती थी, लेकिन अब वही खेती कुछ खेतों तक सिमट कर रह गई है।
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जूट एक आर्द्र उष्णकटिबंधीय फसल है, जिसे लगभग 2500 मिलीमीटर समान रूप से वितरित वर्षा, 34°C अधिकतम व 15°C न्यूनतम तापमान और लगभग 65% आर्द्रता की आवश्यकता होती है। 15°C से कम या 43°C से अधिक तापमान तथा जलभराव इसकी वृद्धि के लिए हानिकारक हैं।
गहरी, उपजाऊ व नई जलोढ़ मिट्टी, जूट के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। हालांकि, यह फसल बलुई दोमट से चिकनी दोमट मिट्टी में उगाई जा सकती है, लेकिन अत्यधिक रेतीली या चिकनी मिट्टी उपयुक्त नहीं है। मिट्टी का pH 6.2–7 (उत्तम 6.4) होना चाहिए तथा उसमें अच्छी नमी धारण क्षमता होनी चाहिए।
भारत, दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा जूट उत्पादक देश है। देश के कुल जूट उत्पादन का लगभग 99 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम बंगाल, बिहार और असम जैसे राज्यों से आता है। इनमें पश्चिम बंगाल करीब 84 प्रतिशत उत्पादन के साथ पहले स्थान पर है, जबकि बिहार भारत में जूट उत्पादन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा राज्य है। भारत के कुल जूट उत्पादन क्षेत्र का 7.9% हिस्सा बिहार में है।
रकबे में गिरावट
जूट, बिहार के आठ जिलों में उगाई जाती है, जो राज्य के उत्तर-पूर्वी भाग में पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे हुए हैं। राज्य के प्रमुख जूट उत्पादक जिले हैं — किशनगंज, कटिहार, अररिया, मधेपुरा, सुपौल और पूर्णिया। यहां की जलोढ़ मिट्टी और आर्द्र जलवायु जूट उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार में हर साल लाखों क्विंटल कच्चे जूट का उत्पादन होता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके रकबे में गिरावट दर्ज की जा रही है। कृषि विभाग और जूट से जुड़े अध्ययनों के मुताबिक, कई जिलों में जूट के क्षेत्रफल में धीरे-धीरे कमी आई है क्योंकि किसान अब दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
बिहार सरकार के कृषि निदेशालय के आकड़ों के मुताबिक, साल 2019-20 में राज्य में 48.39 हज़ार हेक्टेयर में जूट की खेती हुई, जो 2023-24 में बढ़ कर 53.00 हज़ार हेक्टेयर हो गया, लेकिन इस दौरान सुपौल में ये आकड़ा 6.47 हज़ार हेक्टेयर से घट कर करीब आधा यानी 3.25 हज़ार हेक्टेयर पर आ गया।
सुपौल जिले के सुपौल प्रखंड के सोनक कैंप टोला निवासी जूट किसान चंदेश्वरी यादव बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में जूट की खेती में काफी गिरावट आई है।
उनका कहना है, “पहले हमारे इलाके में लगभग हर किसान बीघे भर में जूट की खेती करता था। लेकिन अब हालत यह है कि वही किसान पांच से सात कट्ठे में ही जूट लगा रहे हैं। लागत इतनी बढ़ गई है कि बड़े पैमाने पर खेती करना मुश्किल हो गया है।”
वह बताते हैं कि जूट की खेती में मेहनत भी बहुत अधिक लगती है। बीज, मजदूरी, सिंचाई और कटाई के बाद रोटिंग (पानी में सड़ाने की प्रक्रिया) तक हर चरण में खर्च बढ़ गया है।
जूट की खेती में शुरुआती लागत ही किसानों को परेशान कर देती है। किसानों के अनुसार, इस समय बाजार में जूट के बीज की कीमत लगभग 300 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।
इसके अलावा खेत की तैयारी, बुआई, निराई-गुड़ाई, कटाई और फसल को पानी में सड़ाने की प्रक्रिया में भी मजदूरों की जरूरत होती है। मजदूरी दर बढ़ने से खेती का खर्च और बढ़ गया है। किसानों का कहना है कि जूट की फसल तैयार होने तक प्रति बीघा कई हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। लेकिन जब फसल बेचने की बारी आती है, तब उन्हें उचित दाम नहीं मिल पाता।

जलवायु परिवर्तन नई चुनौती
जूट की खेती पर जलवायु परिवर्तन का भी असर साफ दिखाई देने लगा है। जूट की फसल आमतौर पर मार्च-अप्रैल में बोई जाती है और सितंबर-अक्टूबर में कटाई होती है। कटाई के बाद जूट को साफ पानी में 10 से 12 दिनों तक सड़ाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसे रोटिंग कहा जाता है। इसके बाद ही रेशा निकाल कर जूट तैयार किया जाता है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम का पैटर्न बदल गया है। कभी समय पर बारिश नहीं होती, तो कभी जरूरत से ज्यादा बारिश हो जाती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कटाई के समय साफ पानी की उपलब्धता कम हो गई है।
भारत सरकार के पटसन विकास निदेशालय की ओर से तैयार स्टेटस पेपर – 2025 के अनुसार, कभी बुवाई के बाद सूखा पड़ जाता है, तो कभी बाद के चरण में अधिक वर्षा से जलभराव हो जाता है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए सूखा सहनशील, जल्दी फूल न आने वाली और जलभराव सहन करने वाली जूट की किस्मों का विकास आवश्यक है।
सुपौल प्रखंड के कजरा गांव के किसान कौशलेंद्र सिंह बताते हैं कि पहले गांव में कई तालाब और पोखर हुआ करते थे, जिनमें जूट को सड़ाने के लिए पर्याप्त पानी मिल जाता था। “जब हम बच्चे थे, तब गांव के अधिकतर खेतों में जूट यानी ‘पटवा’ की खेती होती थी। हर खेत में जूट दिखता था। लेकिन अब गांव में गिने-चुने लोग ही जूट उगाते हैं।”
वह आगे बताते हैं कि गांव के कई पोखर और तालाब अब खत्म हो चुके हैं या सूख चुके हैं। इसके कारण जूट की रोटिंग के लिए साफ पानी मिलना मुश्किल हो गया है।
किसानों को अब दूर-दराज के जल स्रोतों की तलाश करनी पड़ती है, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं।
कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि कोसी और सीमांचल क्षेत्र में जूट उत्पादन में गिरावट के पीछे केवल बढ़ती लागत या बाजार की समस्या ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय बदलाव और तकनीकी पिछड़ापन भी बड़ी वजह है। देहरादून स्थित देव भूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक कामिनी यादव, जिनका मूल निवास बिहार के मुंगेर जिले में है, बताती हैं कि इस क्षेत्र में जूट उत्पादन घटने का सबसे प्रमुख कारण वर्षा में कमी और मौसम के पैटर्न में बदलाव है। उनके अनुसार, जूट की अच्छी पैदावार के लिए समय पर और संतुलित बारिश जरूरी होती है, लेकिन अब बारिश या तो अनियमित हो गई है या पर्याप्त मात्रा में नहीं हो रही, जिससे फसल पर सीधा असर पड़ रहा है।
वह कहती हैं कि मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट भी जूट उत्पादन को प्रभावित कर रही है। लगातार एक ही प्रकार की फसल उगाने और अत्यधिक यूरिया के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, जिससे न केवल उत्पादन घट रहा है बल्कि जूट के रेशे की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।
तकनीकी सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए कामिनी यादव बताती हैं कि किसानों को पारंपरिक रोटिंग (पानी में सड़ाने की प्रक्रिया) के बजाय रिबन रोटिंग (पट्टी सड़ाने की विधि) तकनीक अपनानी चाहिए। इस तकनीक में जूट के डंठल से रेशेदार परत को अलग कर पानी में सड़ाया जाता है, जिससे कम पानी में कम समय में बेहतर गुणवत्ता का फाइबर प्राप्त होता है। इसके साथ ही वह पारंपरिक यूरिया की जगह नैनो यूरिया (सूक्ष्म उर्वरक) के इस्तेमाल की सलाह देती हैं, जिससे मिट्टी की सेहत बेहतर बनी रहती है और उत्पादन में सुधार संभव है।
एमएसपी का लाभ किसानों तक नहीं
केंद्र सरकार ने विपणन सत्र 2026-27 के लिए कच्चे जूट (TD-3 ग्रेड) का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5925 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। यह पिछले सत्र 2025-26 के एमएसपी 5650 रुपये प्रति क्विंटल से 275 रुपये अधिक है।
सरकार के मुताबिक, यह मूल्य किसानों की औसत उत्पादन लागत पर लगभग 61.8 प्रतिशत लाभ सुनिश्चित करता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 में कच्चे जूट का एमएसपी केवल 2400 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अब बढ़कर 5925 रुपये हो गया है। यानी पिछले 12 वर्षों में जूट की कीमत में लगभग 2.5 गुना वृद्धि हुई है। लेकिन किसानों का कहना है कि MSP कागजों में तो है, पर जमीन पर इसका लाभ उन्हें नहीं मिलता।
चंदेश्वरी यादव कहते हैं, “सरकार भले एमएसपी तय कर देती है, लेकिन हमारे इलाके में सरकारी खरीद बहुत कम होती है। मजबूरी में हमें जूट बिचौलियों को ही बेचना पड़ता है।”
किसानों के अनुसार जब वे अपनी फसल बेचने जाते हैं, तब उन्हें 7500 से 8000 रुपये प्रति क्विंटल तक ही कीमत मिल पाती है। कई बार गुणवत्ता या बाजार की स्थिति का हवाला देकर व्यापारी और कम कीमत देने की कोशिश करते हैं, क्योंकि सरकारी खरीद केंद्र या जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की सक्रियता गांव स्तर पर बहुत कम है, इसलिए किसान सीधे बाजार पर निर्भर रहते हैं। इसका फायदा बिचौलिये उठाते हैं और किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
मेहनत ज्यादा, मुनाफा कम
किसानों का कहना है कि जूट की खेती में मेहनत बहुत ज्यादा लगती है। धान या मक्का जैसी फसलों की तुलना में जूट की खेती में अधिक श्रम की जरूरत होती है। खेत की तैयारी से लेकर कटाई और रेशा निकालने तक कई चरणों में मेहनत करनी पड़ती है।
लेकिन इसके बावजूद मुनाफा सीमित ही मिलता है। इसी वजह से कई किसान अब जूट की जगह दूसरी फसलों — जैसे धान, मक्का या सब्जियों — की खेती करना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जूट की खेती को बचाने के लिए कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है। सबसे पहले किसानों को सरकारी खरीद की गारंटी देनी होगी, ताकि एमएसपी का वास्तविक लाभ उन्हें मिल सके। इसके अलावा गांव स्तर पर रेटिंग के लिए जल स्रोतों का संरक्षण भी जरूरी है। यदि तालाब और पोखरों का पुनर्जीवन किया जाए, तो जूट किसानों की बड़ी समस्या हल हो सकती है। इसके साथ ही बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और जूट प्रसंस्करण से जुड़े छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना भी जरूरी है।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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