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सोलर आधारित कृषि में क्यों पिछड़ा है बिहार का सीमांचल?

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के नवम्बर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में कुल 435.34 मेगावाट सोलर ऊर्जा उत्पन्न हो रहा है, जो देश के कुल सोलर ऊर्जा उत्पादन का सिर्फ 0.33 प्रतिशत है।

syed jaffer imam Reported By Syed Jaffer Imam |
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why is bihar's seemanchal lagging behind in solar based agriculture

हसीब अख्तर ईंधन आधारित सिंचाई व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं, जो उनके लिए खर्चीला सौदा है। “निजी मोटर से खेत में पानी देते हैं जिससे हर महीने 1000 से 1500 रुपये का खर्च आता है,” किशनगंज जिले की हालामाला पंचायत निवासी हसीब अख़्तर कहते हैं।


लगभग 6 एकड़ खेत के मालिक हसीब मुख्य तौर पर धान और मकई की खेती करते हैं। मौसम की अनिश्चितता के चलते उन्होंने चाय की खेती का रुख किया, लेकिन चाय में सिंचाई की अधिक जरूरत होती है, लिहाजा उनका खर्च बढ़ गया।

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सीमांचल के किसान मुजीबुर रहमान 2 एकड़ से अधिक ज़मीन पर खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि अनियमित वर्षा के कारण सिंचाई में खर्च बढ़ा है और उत्पादन लगभग आधा हो चुका है।


वह कहते हैं, “पहले बारिश के पानी से जुताई कर लेते थे, अब तीन-चार बार सिंचाई करना पड़ता है। एक बीघा की सिंचाई में 8 घंटे लगते हैं और एक एकड़ में 3,000 रुपये खर्च हो जाते हैं।”

सिंचाई पर होने वाले इस मोटे खर्च से बचने के लिए किसानों के पास एक ही किफायती विकल्प है – सौर ऊर्जा। हसीब अख्तर कहते हैं, “एक एकड़ में पानी पटाने में 8 से 9 घंटे लग जाते हैं। सोलर का इंतज़ाम हो जाए तो फायदा होगा। अगर सरकार जागरूकता फैलाये तो हमलोग इसमें आगे बढ़ेंगे।” लेकिन, जिले में सौर ऊर्जा योजनाओं का क्रियान्वयन उत्साहजनक नहीं है। “यहां तो सोलर का नाम-ओ-निशान नहीं है। सोलर के लिए क्या स्कीम है, इसके बारे में हमें कुछ मालूम नहीं,” हसीब कहते हैं।

परम्परागत ईंधनों के जरिए बिजली उत्पादन न केवल खर्चीला है बल्कि ये पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है। जलवायु परिवर्तन से प्रभावित राज्यों में शामिल बिहार की एक बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है मगर जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम में बदलाव आया है, जिससे बारिश के मौसम में बारिश कम हो रही है। नतीजतन लोगों को सिंचाई पर निर्भर रहना पड़ता है और इसके लिए बिजली की जरूरत पड़ती है।

राज्य और केंद्र सरकारें बिजली की जरूरत को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही हैं।

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के नवम्बर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में कुल 435.34 मेगावाट सोलर ऊर्जा उत्पन्न हो रहा है, जो देश के कुल सोलर ऊर्जा उत्पादन का सिर्फ 0.33 प्रतिशत है।

पीएम-कुसुम योजना

प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम), भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है, जिसका उद्देश्य किसानों को सौर ऊर्जा से जोड़कर उनकी ऊर्जा लागत कम करना, आय बढ़ाना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। इस योजना के तहत मार्च 2026 तक कुल 34,422 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता के साथ 34,800 मेगावाट सौर क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

पीएम-कुसुम के तीन मुख्य घटक हैं। घटक-क के अंतर्गत 10,000 मेगावाट क्षमता के विकेंद्रीकृत ग्राउंड या स्टिल्ट माउंटेड ग्रिड-कनेक्टेड सौर अथवा अन्य अक्षय ऊर्जा आधारित संयंत्र लगाए जाते हैं, जिन्हें किसान, किसान समूह, सहकारी समितियां, पंचायतें, एफपीओ या जल उपयोगकर्ता संघ स्थापित कर सकते हैं। इन संयंत्रों से उत्पादित बिजली डिस्कॉम द्वारा राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा निर्धारित फीड-इन-टैरिफ पर खरीदी जाती है।

घटक-ख के तहत ऑफ-ग्रिड क्षेत्रों में 14 लाख स्टैंड-अलोन सौर कृषि पम्पों की स्थापना की जाती है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर सब्सिडी देती हैं और शेष राशि किसान स्वयं या बैंक ऋण के माध्यम से वहन करता है। पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों तथा द्वीपीय क्षेत्रों में किसानों को अधिक केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

घटक-ग में दो व्यवस्थाएं शामिल हैं। व्यक्तिगत ग्रिड-कनेक्टेड कृषि पम्पों का सौरीकरण, जिससे किसान अपनी जरूरत की बिजली उपयोग कर अतिरिक्त बिजली डिस्कॉम को बेच सकें, और फीडर-स्तरीय सौरीकरण, जिसके तहत पूरे कृषि फीडरों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जाता है ताकि किसानों को दिन के समय सुनिश्चित बिजली मिल सके।

farmers using solar pumps
सोलर पंप का इस्तेमाल करते किसान / फोटो: पीएम-कुसुम योजना पुस्तिका

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक ने 10 दिसंबर 2025 को लोकसभा में लिखित उत्तर में जानकारी दी कि 30 नवंबर 2025 तक योजना के सभी घटकों को मिलाकर कुल 10,203 मेगावाट सौर क्षमता ही स्थापित की जा सकी है। उन्होंने बताया कि पीएम-कुसुम योजना के तहत धनराशि राज्यों से प्राप्त मांग, राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा रिपोर्ट की गई प्रगति और योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार जारी की जाती है। मंत्री के अनुसार, राज्यों से प्राप्त मांग के आधार पर 30 नवंबर 2025 तक केंद्र सरकार द्वारा इस योजना के तहत कुल 7,106 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।

पीएम-कुसुम के घटक-क और घटक-ख के बिहार में लाभार्थियों की संख्या शून्य है, जबकि घटक-ग के 1,40,300 लाभार्थी हैं।

सीमांचल में महज 1618 किलोवाट क्षमता के सोलर प्लांट

बिहार में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल धीरे धीरे ही सही बढ़ रहा है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर देखें, तो दक्षिण बिहार के जिलों के मुकाबले सीमांचल काफी पिछड़ा हुआ है।

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, बिहार में गया (51297.5 किलोवाट), औरंगाबाद (20384.6 किलोवाट), बांका (30455 किलोवाट) और नवादा (13412 किलोवाट) जैसे ज़िलों में सबसे अधिक क्षमता वाले सोलर प्लांट लगाए गए हैं। लेकिन, इन जिलों के मुकाबले सीमांचल के किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया में सौर संयंत्रों की संख्या और क्षमता काफी कम है।

आंकड़ों के मुताबिक, कटिहार में कुल 464 किलोवाट क्षमता के 56 सोलर प्लांट लगे हैं, अररिया में 316 किलोवाट क्षमता के 46 और पूर्णिया में 518 किलोवाट के 98 सोलर प्लांट लगाए गए हैं। वहीं, किशनगंज में 42 सोलर प्लांट लगाए गए हैं जिनकी क्षमता महज 320 किलोवाट है।

सौर ऊर्जा के मामले में सीमांचल के पिछड़ने की कई वजहें हैं जिनमें आर्थिक और इलाके का बाढ़ प्रवण होना प्रमुख है।

 

‘सवा करोड़ रुपये देखे भी नहीं हैं’

मक्का व धान किसान सद्दाम हुसैन सोलर को एक सुरक्षित और कारगर विकल्प नहीं मानते। उनका कहना है कि सीमांचल क्षेत्र की ज़मीन निचले स्तर पर है इसलिए यहां हमेशा सैलाब का खतरा रहता है। सैलाब आने पर सोलर फीड जैसी सुविधा नष्ट हो जायेगी और इससे होने वाला नुकसान भयावह हो सकता है। सोलर को विकल्प के तौर पर न देखने के लिए उन्होंने एक और तर्क ये दिया कि उनके क्षेत्र में सोलर पैनल एक नई चीज़ होने के कारण सुरक्षित नहीं होगा।

वह कहते हैं, “सोलर हमारे लिए उतना सुरक्षित नहीं है। हमारे क्षेत्र में सोलर एक अछूत चीज़ होगी। अगर हम इसे खेत में लगा लेते हैं तो इसको ढक कर नहीं रखा जा सकता है। इसको बच्चे भी नुकसान कर सकते हैं।”

किसान मुजीबुर रहमान ने बताया कि सिंचाई के लिए वह मोटर का प्रयोग करते हैं जो पिछले साल चोरी हो गया था और उन्हें नया लेना पड़ा। “सोलर भी वहां से उठाकर लेकर चला जाएगा,” वह हँसते हुए बोले।

मुजीबुर रहमान सोलर को एक विकल्प के तौर पर देखते तो हैं लेकिन कृषि के लिए सोलर फीड लगाने में तीन करोड़ या उससे अधिक का खर्च आता है। सरकार इसमें सब्सिडी देती है लेकिन एकमुश्त इतने पैसे जमा करना उनके लिए संभव नहीं है। उन्होंने कहा, “सवा करोड़ रुपये तो देखे भी नहीं हैं ज़िन्दगी में। गांव में 3-4 ही लोग होंगे जिनके पास चार एकड़ जमीन होगी खेती के लिए।”

सोलर एनर्जी परियोजनाओं को धरातल पर उतारने में एक बड़ी बाधा जमीन की उपलब्धता भी है। एक मेगावाट सोलर प्लांट के लिए लगभग 3 से 4 एकड़ भूमि की जरूरत होती है, जो छोटे किसानों के लिए संभव नहीं हो पाता। ऐसे में केवल बड़े किसान या किसान फेडरेशन मिलकर ही इस योजना का लाभ उठा सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा के जानकार डॉ शशिधर कुमार झा ने कहा, “अगर 50 किसान एक साथ तैयार हो जाएं और बीच में कोई एक पीछे हट गया तो पूरा प्रोजेक्ट फेल होने का खतरा होता है। इसलिए यह सामूहिक प्रयास से ही सफल होगा।”

उन्होंने आगे बताया कि गया, नालंदा और नवादा जैसे जिलों में इस दिशा में सबसे अधिक प्रगति हो रही है, क्योंकि यहाँ धूप प्रचुर मात्रा में मिलती है और बारिश कम होती है। राज्य सरकार जल्द ही एग्री-पीवी प्रोजेक्ट भी शुरू करने जा रही है।

“सरकार कहती है कि हम आप से तीन रुपये प्रति यूनिट की दर से अगले 25 सालों तक बिजली खरीदेंगे। इतनी बिजली जेनरेट होगी तो कौन उपयोग करेगा, इसलिए सरकार खुद बिजली लेकर उसे लोगों को डिस्ट्रीब्यूट करेगी। इसमें पावर परसेंट एग्रीमेंट किया जाता है,” झा ने कहा।

सीमांचल के एक अन्य किसान नासेह अहमद 6 बीघा जमीन में धान और मकई की खेती करते हैं। सिंचाई के लिए वह किराए पर बिजली लेते हैं। उन्होंने बताया कि मक्का उगाने के लिए हर सीज़न में तीन से चार बार सिंचाई करनी पड़ती है जिसमें करीब 6 से 8 हज़ार रुपये का खर्च आता है। धान की फसल में सिंचाई के लिए 3 हज़ार रुपये तक खर्च हो जाते हैं। गांव में एक सरकारी बोरिंग है लेकिन लंबे समय से खराब है।

नासेह ने आगे बताया कि उनके क्षेत्र में कोई भी किसान सोलर का उपयोग नहीं कर रहा है और वह खुद सोलर ऊर्जा के लिए इच्छुक नहीं हैं। “25-30 बीघा ज़मीन वाला किसान ही लगा सकता है हमलोग कैसे लगाएंगे,” नासेह ने कहा।

farmer ploughing his field
बिहार के किशनगंज में अपने खेत में काम करते एक किसान / फोटो: सैयद जाफर इमाम

चरम मौसमी घटनाओं में भी इजाफा

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही चरम मौसमी घटनाओं पर पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने 2025 के ताज़ा आंकड़ें पेश किये हैं। इन आकंड़ों के अनुसार जनवरी 2025 से सितंबर तक चरम मौसमी घटनाओं से बिहार में 379 हेक्टेयर की फसलें बर्बाद हो गईं।

नौ महीनों में 63 दिन बिहार में किसी न किसी प्रकार की चरम मौसमी घटना देखी गई। इन घटनाओं में बाढ़, बिजली गिरने की घटना (20 दिन), शीतलहर (2), हीटवेव (4) और तेज़ तूफ़ान जैसी घटनाएं शामिल हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण फलों में कीड़े लगने की समस्या काफी बढ़ चुकी है। रासायनिक खाद में खर्च तो बढ़ा ही है, साथ ही फसलों की गुणवत्ता में भी भारी कमी आई है। सबसे अधिक रासायनिक खाद का इस्तेमाल सब्ज़ियों में किया जाता है।

नासेह को 2025 में समय पर बारिश न होने के कारण धान की रोपाई में देरी हुई जिससे फसल भी देर से तैयार हुई। आम तौर पर उनके 6 बीघा खेत में 100 से 150 मन धान उगता है लेकिन इस वर्ष उसमें कमी आई।

वहीं, किसान मुजीबुर रहमान की मानें तो एक बीघा में उन्हें 8 क्विंटल गेहूं की फसल मिल जाती थी लेकिन अब 5 क्विंटल मुश्किल से हो पाती है।

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सैयद जाफ़र इमाम किशनगंज से तालुक़ रखते हैं। इन्होंने हिमालयन यूनिवर्सिटी से जन संचार एवं पत्रकारिता में ग्रैजूएशन करने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी पत्रकारिता (पीजी) की पढ़ाई की। 'मैं मीडिया' के लिए सीमांचल के खेल-कूद और ऐतिहासिक इतिवृत्त पर खबरें लिख रहे हैं। इससे पहले इन्होंने Opoyi, Scribblers India, Swantree Foundation, Public Vichar जैसे संस्थानों में काम किया है। इनकी पुस्तक "A Panic Attack on The Subway" जुलाई 2021 में प्रकाशित हुई थी। यह जाफ़र के तखल्लूस के साथ 'हिंदुस्तानी' भाषा में ग़ज़ल कहते हैं और समय मिलने पर इंटरनेट पर शॉर्ट फिल्में बनाना पसंद करते हैं।

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