बिहार की राजधानी पटना स्थित फुलवारी शरीफ के सामुदायिक केंद्र में इन दिनों एंटी रैबीज का इंजेक्शन लगाने आने वालों की संख्या में ख़ासा इज़ाफ़ा देखा जा रहा है।
“रोज़ाना 30 से 35 लोग एंटी रेबीज का इंजेक्शन लेने पहुंचते है। पहले इतनी संख्या में लोग नहीं पहुंचते थे,” सामुदायिक केंद्र में काम कर रहे एक कर्मचारी ने कहा।
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यही हाल बिहार के अन्य सरकारी अस्पतालों का भी है, जहां एंटी रेबीज इंजेक्शन उपलब्ध है। एंटी-रेबीज उन मरीज़ों को दिया जाता है, जिन्हें आवारा कुत्ते काटते हैं। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी रेबीज इंजेक्शन लेने आने वाले मरीज़ों की बढ़ती भीड़ बताती है कि राज्य में कुत्तों के काटने की घटनाओं में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।
बिहार की ताज़ा आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के आँकड़ों के मुताबिक, राज्य में पिछले पांच वर्षों में कुत्तों के काटने के मामले दस गुना बढ़ गए हैं। वर्ष 2021-22 में 28,725 लोग कुत्तों के हमले में ज़ख़्मी हुए थे, साल 2024-25 में बढ़कर 2,83,274 हो गया। यानी राज्य में हर दिन औसतन 776 लोगों को कुत्ते काट रहे हैं।
कुत्तों के हमले का ख़तरा
सीतामढ़ी जिला के भंडारी गांव के मनोज राय के तीन साल के बेटे आयुष को 11 जनवरी 2026 को कुत्ते ने हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। स्थानीय अखबार में यह मुद्दा काफी चर्चा में रहा। सीतामढ़ी के रहने वाले शक्ति कुमार सिंह बताते हैं, “जब तक कुत्ते को भगाया गया तब तक कुत्ते ने बच्चे का सिर, चेहरे और आंख को बुरी तरह नोच लिया था। यहां के स्थानीय अस्पताल से इलाज के लिए श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज व अस्पताल (मुजफ्फरपुर) रेफर कर दिया गया। घाव भरने में काफी समय लगेगा, हालांकि अभी बच्चा ठीक है।”
2023 के सितंबर महीने में पटना स्थित अटल पथ होते हुए रोहित कुमार स्टेशन से अपने रूम पर जा रहे थे। रास्ते में अचानक 6-7 कुत्तों झुंड ने उन पर हमला कर दिया था। रोहित उस घटना को याद करते हुए कहते हैं, “रात के 12 बजे अपने रूम जा रहा था। सड़क पर 6 से 7 कुत्ते बैठे हुए थे। थोड़ा आगे जाने पर अचानक सभी ने हमला कर दिया था। हाथ में दो जगह और जांघ पर एक जगह काटा था। काटने से ज्यादा सड़क पर गिरने से घायल हो गया था। इसके बाद पीएमसीएच में मुझे दो दिन भर्ती रहना पड़ा था।” पीएमसीएच में उन्हें फ़्री में वैक्सीन लगाई गई, लेकिन कुछ दवाइयाँ बाहर से ख़रीदनी पड़ी।
रोहित जैसी घटना बिहार के कई इलाकों में आम हो चुकी है। स्थिति ऐसी है कि रात में पैदल घूमने पर लोग कुत्तों के हमले का शिकार हो रहे हैं।
कुत्तों के काटने की घटनाओं में भारी बढ़ोतरी होने से राज्य के कई सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन की कमी हो जाती है, जिससे ग्रामीण इलाकों में लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लगभग 10 दिन पहले सारण और पटना ज़िलों के सदर अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन का स्टॉक खत्म होने की खबरें हैं।
कुत्ता और मानव संघर्ष
पिछले कुछ वर्षों में बिहार का बेगूसराय, कुत्ता काटने एवं कुत्तों के शूट आउट मामले में काफी चर्चा में रहा है। बेगूसराय के स्थानीय पत्रकार घनश्याम देव बताते हैं, “बेगूसराय में लगभग एक दर्जन लोगों को कुत्तों ने काट खाया था और 30 से ज्यादा व्यक्ति घायल हो गए थे। इनमें अधिकांश महिलाएं थीं। इसके बाद कुत्तों को मारने के लिए स्थानीय लोगों ने प्रशासन से अपील की थी। बछवाड़ा और भगवानपुर प्रखंड में स्थानीय प्रशासन व वन विभाग के द्वारा 23 सितंबर 2022 को 12 कुत्तों, 3 जनवरी 2023 को 16 और 4 जनवरी को 14 कुत्तों यानी कुल 42 कुत्तों को शूटआउट में मारा जा चुका है।”
“बेगूसराय के बछवाड़ा इलाके में 5 से 6 जगहों पर मरे हुए जानवरों को खुले में फेंका जाता है। इसको कुत्ते खा लेते हैं जिसके असर से अधिकांश ऐसी घटनाएं हुई हैं, ऐसा मुझे एक स्थानीय चिकित्सक ने बताया था,” आगे वह बताते है।
बेगूसराय के रहने वाले अजय पाठक के मुताबिक, बेगूसराय में शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाले सड़े चावल और महुआ खाने के बाद कुत्तों की ऐसी स्थिति हुई थी। जिस इलाके में यह घटना हुई थी, वहां अवैध दारू बनाई जाती थी। हालांकि स्थानीय प्रशासन इस बात को पूरी तरह नकारता है।
कुत्तों के शूटआउट पर भाजपा सांसद मेनका गांधी ने ऐतराज जताया था। वहीं, पीपल फॉर एनिमल्स पब्लिक पॉलिसी फाउंडेशन संस्था ने शूटआउट रोकने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखा था। अन्य शहरों में भी लोगों पर कुत्तों के हमले की घटनाएँ आम हो चुकी हैं।

बेगूसराय स्थित तेघड़ा के एसडीओ राकेश कुमार बताते हैं, “कई गांवों के मुखिया के द्वारा आवेदन दिया गया था। इस आवेदन में स्पष्ट लिखा था कि कुत्ता काटने से गांव के लोग घायल हुए हैं और मृत्यु हुई है। इसके बाद एक टीम गठित हुई थी। उसके बाद कुत्तों के शिकार का आदेश निकाला गया था। हम लोगों ने बस शिकारी टीम की मदद की थी। हाईकोर्ट में इस पर केस भी चला था, जो अब खत्म हो गया है।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
बिहार के रहने वाले सिद्धार्थ शांडिल्य, दिल्ली कोर्ट में प्रैक्टिस करते है। वह बताते हैं, “बिहार में आवारा कुत्ता काटने पर मुआवज़े का कोई प्रावधान नहीं है, जबकि इसके काटने से गरीब लोगों को काफी नुकसान होता है। हरियाणा में कुत्ता काटने पर मुआवजा दिया जाता है।”
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारी की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों या बुजुर्गों को कुत्तों के काटने, चोट लगने या मौत के हर मामले में हम राज्य सरकारों से भारी मुआवजा दिलाएंगे।
बिहार सरकार के पशुपालन विभाग या सूचना जनसंपर्क विभाग के माध्यम से कुत्ते के काटने का जागरूकता के बारे में कोई अपडेट नहीं किया गया है।
सबसे वफादार जानवर कुत्ते के आदमखोर होने पर जानवरों की दवा बनाने वाली कंपनी हेस्टर बायोमेडिकल संस्था में काम कर रहे चमन मिश्रा बताते हैं, “पहले की तुलना में आज कुत्ते के खानपान में बदलाव होने की वजह से इस तरह की घटना देखने को मिल रही है। किसी भी मृत शरीर के मांस को खाने से कुत्ता लगातार आदमखोर होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते समय में परिवर्तन होने की वजह से कुत्तों का प्रजनन अवधि अधिक महीने हो रहा है, जबकि पहले सितंबर और अक्टूबर महीने में होता था। ब्रीडिंग के समय हार्मोन में बदलाव से भी जानवरों के काटने के मामले बढ़ जाते हैं।” हालांकि घरेलू कुत्तों के इंसानों पर हमले करने या आदमख़ोर हो जाने को लेकर कहीं कोई रिसर्च या जांच नहीं हुई है।
जलवायु परिवर्तन कितना प्रभावी?
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में हुए शोध के मुताबिक डॉग बाइट की घटनाएं गर्म, धूल और धुएँ से भरे दिनों में ज्यादा देखने को मिली हैं। प्रदूषण के चलते कुत्तों के काटने की घटनाओं में 11 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई। मतलब साफ है कि जिस तरह ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण बढ़ रहा है, वैसे-वैसे मौसम संबंधी आपदाओं से अलग भी हमें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, जिनमें से कुत्तों का आक्रामक होना भी एक होगा।

बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय पटना में पशु चिकित्सा औषध विभाग में सहायक प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष पल्लव शेखर कहते हैं, “ब्रीडिंग के समय हार्मोन में बदलाव आता है जिससे कुत्तों का व्यवहार बदला जाता है और वे हिंसक हो जाते हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के दौरान हो रहे मौसम में बदलाव का असर ब्रीडिंग पर पड़ेगा ही। एक बात तो स्पष्ट है कि बढ़ता तापमान और प्रदूषण जैसे पर्यावरण से जुड़े कारक जीवों के व्यवहार में बदलाव कर रहे हैं।”
सुपौल जिला स्थित मवेशी के डॉक्टर सत्तो यादव भी मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से कुत्तों का ब्रीडिंग टाइम ज्यादा समय तक हो रहा है, जबकि पहले सितंबर से जनवरी में होता था। ब्रीडिंग के समय हार्मोनल बदलाव से भी जानवरों के काटने के मामले बढ़ जाते हैं।”
पटना के पाटलिपुत्र गोलंबर पर स्थित डाक्टर जितेन्द्र प्रसाद ने बताया, “हीट की वजह से इस तरह की घटना में लगातार वृद्धि होती है। अगस्त, सितंबर, फरवरी और मार्च में इस तरह की घटना ज्यादा होती है। ठंड के मौसम में सक्रियता कम होने की वजह से उसमें हार्मोनल बदलाव होता है। इससे भी कुत्ता आक्रामक हो जाता है। इसके अलावा आवारा कुत्तों के खानपान में लगातार बदलाव हो रहा है। खानपान में अगर किसी तरह का बदलाव होगा, तो उसका असर कुत्ते के व्यवहार पर पड़ेगा। सरकार को नसबंदी ज्यादा से ज्यादा करवानी चाहिए। तभी इस पर अंकुश लग सकता है।”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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