दोपहर के ठीक तीन बजे मुजफ्फरपुर जिले के कटरा ब्लॉक के लेवरा चौर के किनारे मानो देवी (50 वर्ष) साड़ी को घुटनों तक समेटे, दो पोतियों और तीन पोतों के साथ गीली मिट्टी (पांक) में उतर चुकी थीं। एक हाथ में पॉलिथिन की थैली थी और दूसरा हाथ चौर की तली में घोंघे टटोलता आगे बढ़ रहा था।
यह उनके परिवार की हफ्ते के पाँच दिन की नियमित दिनचर्या है। घर में कुल आठ सदस्य हैं और घोंघा चुनकर बेचना ही उनकी एकमात्र आजीविका है। मानो देवी बताती हैं, “अब चौर में घोंघे नहीं मिलते। घोंघे की संख्या बहुत कम हो गई है। इससे हमारे रोजगार पर गहरा संकट आ गया है। अब तो घोंघा चुनकर बेचने से घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है।”
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वह आगे कहती हैं, “हम कई पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं। दस-पंद्रह साल पहले तक इसमें अच्छी कमाई हो जाती थी। नदी के भरोसे हम आराम से घर चला लेते थे, बच्चों की शादी-ब्याह का खर्च निकाल लेते थे और कुछ छोटे-मोटे शौक भी पूरे कर लेते थे। वही चौर, वही नदी, लेकिन अब घोंघे गिने-चुने मिलते हैं।”
मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखंड की सरस्वती कुंवर बताती हैं, “पहले तो दो-तीन घंटे में बोरी भर जाती थी। अब पूरा दिन घूमने पर भी मुश्किल से एक किलो घोंघा-मांस इकट्ठा हो पाता है।”
पुराने दिनों को याद करते हुए सरस्वती कहती हैं, “ये घोंघा हमारे लिए मांस भी था, दवा भी थी और पैसा भी। आज चौर पूरी तरह खाली हो गया है। पहले अकेले ही दो दिन में एक बोरी भर लेती थी, लेकिन अब कई लोग एक साथ घोंघा चुनते हैं, तब भी एक बोरा भरने में 4-5 दिन लग जाते हैं।”
मानो देवी व सरस्वती जैसी सैकड़ों महिलाएं और बच्चे अब सिर्फ इंतजार करते हैं कि कब चौर में फिर से घोंघे लौटेंगे।

क्या है घोंघा?
विज्ञान के अनुसार, घोंघा, मॉलस्का (Mollusca) संघ और गैस्ट्रोपोडा (Gastropoda) वर्ग का सदस्य है। ये उत्तरी बिहार की आर्द्रभूमि और ग्रामीण जल-इकोसिस्टम का अभिन्न हिस्सा है और स्थानीय भाषा में लोग इसे डोका, घोगा, गोंगा या अईंठा भी कहते हैं।
दुनिया भर में ‘हेलिक्स पोमेटिया’ जैसी प्रजातियों को ‘एस्कार्गो’ के नाम से महंगा विलासी भोजन माना जाता है, लेकिन बिहार के चौरों और बाढ़ वाले मैदानों में पाए जाने वाले ये घोंघे गरीब परिवारों के लिए प्रोटीन का सबसे सस्ता और आसानी से उपलब्ध स्रोत हैं। इनकी पहचान है कैल्शियम कार्बोनेट का कड़ा सुरक्षा कवच और नीचे का मांसल पैर, जो चिपचिपे म्यूकस की मदद से गीली मिट्टी पर आसानी से रेंगता है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) तथा इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के शोधों में साफ कहा गया है कि मीठे पानी के घोंघे सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि प्रकृति के ‘लाइव वाटर फिल्टर’ हैं। ये जल शुद्धिकरण का काम करते हैं और खाद्य श्रृंखला की अहम कड़ी भी। पूरी तरह शाकाहारी होने के कारण ये पत्तियों और जलीय कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं, जिससे जैविक चक्र बना रहता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ये अत्यंत लाभकारी हैं।
संक्षेप में, घोंघा बिहार के चौरों की सेहत का सूचक है—जिसकी मौजूदगी का मतलब है स्वस्थ जल और समृद्ध जैव-विविधता।
घोंघे कहाँ और कैसे पनपते हैं?
मुजफ्फरपुर के चौर—प्राकृतिक निचले जलमग्न क्षेत्र—अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण घोंघा उत्पादन के लिए आदर्श माने जाते थे। बूढ़ी गंडक, गंडक, लखनदई, बागमती और कई छोटी धाराओं (जिन्हें स्थानीय रूप से ‘मन’ कहते हैं) के कारण यहां उथले और गहरे दोनों प्रकार के चौर बने। उथले चौरों में मौसमी पानी रहता है और खेती होती है, जबकि गहरे चौरों में साल भर पानी जमा रहता है और जलीय वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में होती हैं।
सकड़ा, मुरौल, बंदरा, गायघाट, औराई, कांटी, मीनापुर, सरैया, मोतीपुर, कटरा और मड़वन प्रखंड में फैले ये चौर कभी घोंघों की खान थे। यहां की कैल्शियमयुक्त मिट्टी और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर पानी घोंघों के विकास के लिए बेहद अनुकूल था।
लेकिन पिछले 15 वर्षों में स्थिति पूरी तरह बदल गई। 2024 के एक अध्ययन के अनुसार जलकुंभी और बढ़ते प्रदूषण ने इनकी संख्या और उत्पादकता पर भारी असर डाला है। मुजफ्फरपुर में स्थिति सबसे गंभीर है। कई चौर अब सूखी मिट्टी और कीचड़ के गड्ढे भर रह गए हैं।
मीठे पानी के घोंघे अधिकतर उभयलिंगी होते हैं, जिनमें एक ही जीव में नर और मादा दोनों प्रजनन अंग पाए जाते हैं, हालांकि वंश वृद्धि के लिए इन्हें दूसरे साथी की आवश्यकता होती है। मानसून के समय (जुलाई-सितंबर) इनका प्रजनन काल चरम पर होता है, जब ये जलीय पौधों की पत्तियों या चौर की गीली मिट्टी पर जैली जैसे सुरक्षा कवच में लिपटे सैकड़ों अंडे देते हैं। लगभग 2 से 4 सप्ताह में इन अंडों से नन्हें घोंघे बाहर निकल आते हैं, जिनका कोमल खोल पानी से कैल्शियम सोखकर धीरे-धीरे कड़ा और मजबूत होता जाता है। वर्तमान में चौरों के पानी में घुलते कीटनाशक और बदलता पीएच स्तर इन संवेदनशील अंडों को पनपने से पहले ही नष्ट कर रहा है, जिससे इनकी नई पीढ़ी खत्म हो रही है।

67 वर्षीय सिपतिया देवी 22 साल की उम्र से घोंघा बेच रही हैं। पहले वे अपने बेटे के साथ चुनने जाती थीं। पति मछली का कारोबार करते थे। लेकिन अब घोंघे की कमी और चौरों पर सरकारी कब्जे तथा मछली के बढ़ते दाम ने उनके परिवार को बिहार छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
सिपतिया कहती हैं, “लोग सोचते हैं कि घोंघा हम मुफ्त में चुनते हैं और बहुत मिलता है। लेकिन उन्हें इस मेहनत का अंदाजा नहीं। आधा किलो या पाव किलो खरीदने पर भी लोग मोलभाव शुरू कर देते हैं।”
2010 के आसपास बदलाव शुरू हुआ। पहले चौर नवंबर तक पानी से लबालब रहते थे। अब जुलाई-अगस्त तक सूखे पड़े रहते हैं। 2020 से 2025 के बीच स्थिति और बिगड़ी। बांग्लादेश और बिहार के अध्ययनों में घोंघों की संख्या में 1.5 गुना गिरावट दर्ज हुई। मुजफ्फरपुर के कई चौरों से घोंघा लगभग गायब हो गया है।
2025 में मड़वन के फंदा चौर में 13 वर्षीय पंकज कुमार घोंघा चुनते हुए गड्ढे में डूब गए। कम घोंघे के लिए लोग अब गहरे पानी में भी उतर रहे हैं। समस्तीपुर और बेगूसराय में भी ऐसी दर्दनाक घटनाएं बढ़ रही हैं।
एक समय चौर गरीबों का सस्ता प्रोटीन और पारंपरिक दवा का स्रोत थे। आज वही चौर सैकड़ों परिवारों की आजीविका और बच्चों की जान ले रहे हैं।
घोंघा ख़त्म होने की क्या हैं वजहें?
मुज़फ्फ़रपुर जिले के कटरा प्रखंड के उमेश सहनी पिछले 50 वर्ष से मछली कारोबार से जुड़े हैं। बताते हैं कि खेतों में यूरिया, फॉस्फेट और क्लोरपाइरीफॉस जैसे कीटनाशकों का छिड़काव बाढ़ के पानी के साथ बहकर चौरों में पहुंच जाता है। घोंघा बेहद संवेदनशील प्राणी है। पानी का पीएच थोड़ा बदल जाए या ऑक्सीजन का स्तर गिर जाए, तो वह तुरंत मर जाता है।

हालांकि, किसानों के लिए कीटनाशक फसल बचाने का जरिया है लेकिन, उन्हें यह पता भी नहीं चलता कि उनके कीटनाशक चौरों के घोंघे को चुपचाप मार रहे हैं।
गायघाट प्रखंड के किसान नारायण सहनी का कहना है कि बाढ़ के पानी के प्राकृतिक रास्तों पर अब व्यवसायियों का कब्जा बढ़ गया है। जहां कभी बाढ़ का पानी बहता था, वहां अब ईंट-भट्ठे खड़े हो गए, सड़कें बन गईं और बस्तियां बस गईं। इससे न सिर्फ घोंघा, बल्कि कई अन्य जलीय जीवों की प्राकृतिक नस्लें ही खत्म हो गई हैं।
जलनिकायों के संरक्षक नारायणजी चौधरी (56 वर्ष) चिंता जताते हुए कहते हैं, “जलकुंभी का अनियंत्रित प्रसार पानी की सतह को पूरी तरह ढक देता है। इससे ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरता है और जलजीव धीरे-धीरे दम घुटने से मर जाते हैं। घोंघे की मौत का यही एक बड़ा कारण है।”
नारायणजी आगे बताते हैं कि एक ओर जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित बारिश, सूखा और छोटी-छोटी बाढ़ें चौरों का प्राकृतिक चक्र बिगाड़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर ‘नीली क्रांति’ के नाम पर अपनाई जा रही आंध्र प्रदेश की कृत्रिम मछली पालन प्रणाली स्थानीय जैव-विविधता को तेजी से नष्ट कर रही है।
इस मछली पालन प्रणाली में जल निकायों को कीटनाशकों से साफ करके सिर्फ व्यावसायिक मछलियों को पाला जाता है। परिणामस्वरूप घोंघा, केकड़ा, सितुआ, सांप, कछुआ और छोटी-छोटी स्थानीय मछलियों की कई प्रजातियां लगभग गायब हो गई हैं। आम लोगों की प्राकृतिक जल संसाधनों पर निर्भरता भी खत्म हो रही है।
नारायणजी चौधरी एक और गंभीर कारण गिनाते हैं। बाढ़ के मौसम में व्यावसायिक मछली पालक लागत बचाने के लिए जाल और बांस के झांझ लगा देते हैं, जिससे प्राकृतिक रूप से आने वाले जीवों को अंदर आने से रोका जाता है। इससे जल निकायों में जैव-विविधता का और अधिक ह्रास हो रहा है।
घोंघे की कमी का असर
घोंघा सिर्फ भोजन का एक स्वस्थ माध्यम नहीं, बल्कि आजीविका से भी इसका गहरा नाता है। मुजफ्फरपुर की 40 वर्षीय मेघनी देवी देवी बताती हैं, “पहले मैं रोज 4-5 किलो घोंघे चुनती थी, जो बाजार में ठीक दाम में बिकते थे। इससे बच्चों का दूध और स्कूल की फीस का खर्च चलता था। अब वह आय खत्म हो गई है। सब्ज़ियाँ और दूध महंगे हैं, ऐसे में हम बच्चों को कैसे पालें?”
कई परिवारों में कुपोषण बढ़ा है और बच्चे अब घोंघे के स्वाद से भी अनजान हैं। एक शोध के मुताबिक अपने बेहतरीन समय में बिहार के अन्य इलाक़ों में घोंघे का दाम 1000 रुपये प्रति किलो तक भी पहुँच जाता है। लेकिन मुज़फ्फ़रपुर में अब भी इसकी अधिकतम कीमत 180-200 रुपये प्रतिकिलो ही है।
इसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ा है, क्योंकि घोंघा चुनना उनका पारंपरिक काम था। अब वे या तो मजदूरी पर जाती हैं या घर बैठी रहती हैं। स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ा है। घोंघे का शोरबा अस्थमा के उपचार में दिया जाता था, अब वह दवा भी गायब है।
घोंघे केवल धीमी गति से चलने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि वे पारिस्थितिकी तंत्र के ‘अनन्य इंजीनियर’ हैं, जिनके विलुप्त होने से प्रकृति की पूरी खाद्य श्रृंखला और पोषक तत्व चक्र ध्वस्त हो सकता है।
पर्यावरण की दृष्टि से ये मृत पदार्थों का अपघटन कर मिट्टी को नाइट्रोजन और कैल्शियम प्रदान करते हैं, जबकि जलीय घोंघे शैवाल को नियंत्रित कर जल को शुद्ध रखते हैं।
जैव विविधता के संदर्भ में, ये पक्षियों और सरीसृपों के लिए अनिवार्य भोजन और कैल्शियम का स्रोत हैं, जिनके बिना कई प्रजातियों की प्रजनन क्षमता समाप्त हो जाएगी।
आम जनमानस के लिए इनका अभाव कृषि उत्पादकता में गिरावट, जल प्रदूषण में वृद्धि और चिकित्सा विज्ञान में महत्वपूर्ण औषधीय अनुसंधानों के अंत का कारण बनेगा, जिससे अंततः खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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