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बिहार में पेशेवर निशानेबाजों से क्यों मरवाए जा रहे नीलगाय और जंगली सूअर?

बिहार सरकार ने पहली बार 2007 में नीलगाय को मारने की अनुमति दी थी, क्योंकि उस समय राज्य के 38 में से लगभग 31 जिलों को इस जंगली जानवर के कारण भारी फसल नुकसान का सामना करना पड़ा था।

Ariba Khan Reported By Ariba Khan |
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Nilgai in a field

हाल ही में बिहार सरकार ने फसलों की सुरक्षा के लिए नीलगायों और जंगली सुअरों को मारने के लिए 13 पेशेवर निशानेबाजों को नियुक्त किया है। बिहार के मुख्य वन्यजीव वार्डन पी के गुप्ता ने मंगलवार को बताया कि राज्य के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने पेशेवर निशानेबाजों की सूची प्रदेश के सभी 38 जिलों से संबंधित अधिकारियों को भेज दी है, ताकि आवश्यकताओं के अनुसार उनकी सेवा का उपयोग किया जा सके।


आपको बता दें कि बिहार के मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, भोजपुर, शिवहर और पश्चिम चंपारण जिलों में दोनों पशुओं की संख्या सबसे ज्यादा है। नीलगाय बहुत बार गंभीर सड़क हादसों का कारण भी बन जाती है। साथ ही ये दोनों पशु झुंड में चलते हैं और एक दिन में कई एकड़ फसल को नष्ट कर देते हैं। नीलगाय और जंगली सूअरों से फसल की रक्षा करने के लिए किसान पूरी-पूरी रात फसल की रखवाली करते हैं। किसानों की समस्या देखते हुए सरकार ने फैसला लिया है कि दोनों पशुओं को निर्धारित परिक्रियाओं के अनुसार मारा जा सकता है।

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क्या है प्रक्रिया?

इस प्रक्रिया के दौरान केवल पूर्ण विकसित जानवरों को मारने का प्रयास किया जाएगा। और निशानेबाजों को निर्देश दिया गया है कि वह जानवर को मारने के अभियान के दौरान सरकारी मानदंडों का अच्छी तरह पालन करें।


इन दोनों जानवरों को मारने से लेकर दफनाने तक में मुखिया की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है। सभी मुखिया को आवश्यकता पड़ने पर दोनों पशुओं को मारने के लिए अत्यधिक सावधानी से पेशेवर निशानेबाजों को शामिल करना होगा।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के अनुसार संरक्षित क्षेत्र के बाहर पेशेवर निशानेबाजों की मदद से दोनों पशुओं की पहचान कर उन्हें मारने की अनुमति देने के लिए मुखिया को ‘नोडल अथॉरिटी’ के रूप में नियुक्त किया गया है।

मुखिया अपने क्षे‌त्र के किसानों से प्राप्त शिकायतों के आधार पर अधिकारियों से समन्वय कर भाड़े के शूटरों द्वारा नीलगायों और जंगली सूअरों को मारने की अनुमति दे सकता है।

इस प्रक्रिया के दौरान राज्य सरकार मुखिया को कारतूस के लिए विशिष्ट राशि देगी। जबकि 700 रुपए पशुओं को दफनाने के लिए दिए जायेंगे। मुखिया को अपने संबंधित क्षेत्रों में अनुमति और जानवरों के शिकार की मासिक रिपोर्ट सक्षम अधिकारी को दिखानी होगी।

क्या है कानून?

पहले भारतीय संविधान में नीलगाय को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-III में शामिल किया गया था और इसका अवैध शिकार करने पर तीन साल तक की जेल और 25,000 रुपये तक आर्थिक जुर्माना या दोनों हो सकता था।

लेकिन साल 2012 में, उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि जिला मजिस्ट्रेट या उप-मंडल मजिस्ट्रेट से लिखित अनुमति के बाद, नीलगाय का सीमित तरीके से शिकार किया जा सकता है। लेकिन मारे गए जानवर के शव का दाह संस्कार करना अनिवार्य है। फिर साल 2013 में नीलगाय को संरक्षित प्रजातियों की सूची से हटा दिया गया था।

इसके बाद साल 2015 में, केंद्र सरकार ने नीलगाय को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची 3 से अनुसूची 5 में स्थानांतरित कर दिया। नीलगाय अब उन जानवरों की श्रेणी में आ गई जो कृषि फसलों के लिए हानिकारक हैं। मानव जीवन और संपत्ति के लिए खतरा बनने पर राज्य सरकार उन्हें खत्म करने के आदेश जारी कर सकती है। उसी वर्ष दिसंबर 2015 में, केंद्र सरकार ने एक वर्ष की अवधि के लिए नीलगायों को मारने की अनुमति दे दी थी।

बिहार सरकार ने पहली बार 2007 में नीलगाय को मारने की अनुमति दी थी, क्योंकि उस समय राज्य के 38 में से लगभग 31 जिलों को इस जंगली जानवर के कारण भारी फसल नुकसान का सामना करना पड़ा था। सरकार ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 11 (ए) के तहत कलेक्टरों और उप-विभागीय मजिस्ट्रेटों को ‘गोली मारने के आदेश’ जारी करने का अधिकार दिया था।

इसके बाद जून 2016 में, तीन दिनों के भीतर, पटना जिले के मोकामा टाल में लगभग 250 नीलगायों को मार डाला गया था, जिस पर मीडिया और संसद में काफी सवाल भी उठाए गए थे। और अब फिर से बिहार सरकार ने नीलगाय और जंगली सूअर को मारने के लिए 13 पेशेवर निशानेबाजों को नियुक्त किया है।

आंकड़े और आदत

भारत के लगभग सभी राज्यों से हिरण, नीलगाय, जंगली सूअर आदि जंगली जानवरों द्वारा फसलों के नुकसान को व्यापक रूप से रिपोर्ट किया जाता है। खास तौर पर नीलगाय कृषि फसलों को व्यापक नुकसान पहुंचाती है; इनमें से गेहूँ, जौ, सिसर चना, सरसों, बाजरा, ज्वार, मूंग, प्रमुख हैं।

All India Network Project on Vertebrate Pest Management (AINP-VPM) के अध्ययनों से पता चला है कि आम तौर पर कुतरने वाले जानवरों की विभिन्न प्रजातियों के कारण फसल की क्षति 15 प्रतिशत होती है। इसके बाद पक्षियों के कारण 9 प्रतिशत, हाथियों के कारण 20-50 प्रतिशत, काले हिरन के कारण 5-15 प्रतिशत, जंगली सूअर के कारण 15-40 प्रतिशत और नीलगाय के कारण 10-30 प्रतिशत तक फसलों का नुकसान होता है।

नीलगाय स्वाभाविक रूप से, शाम और रात में फसल पर छापा मारने के लिए जानी जाती है। यह फसल को खाती तो कम है लेकिन उसे रौंदकर भारी नुकसान पहुंचाती है। इसीलिए इसको गंभीर स्तनधारी फसल कीट भी माना जाता है। लगभग देश के सभी किसान फसलों के लिए खतरनाक साबित होने वाले इस जानवर से हमेशा छुटकारा पाना चाहते हैं।

फसल को ही क्यों तबाह करते जानवर?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह जंगली जानवर किसानों की फसलों में ही आकर तबाही क्यों मचाने लगे हैं ?

दरअसल वनों की कटाई, औद्योगीकरण और शहरीकरण जैसे विकास कार्यों के नतीजे में हमने जंगली जानवरों के रहने की जगह को खत्म करने का काम किया है। इसीलिए ये जंगली जानवर भोजन की तलाश में फसलों और खेतों का रुख करने लगे हैं। मुख्य रूप से कृषि को बढ़ावा देने, इमारतों में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी के लिए पेड़ों को काटने, और अन्य भूमि उपयोग गतिविधियों के कारण, पिछले 300 वर्षों में लगभग 70 से 110 लाख वर्ग किमी वन नष्ट हो गए हैं। इन जंगली जानवरों की तादाद बढ़ने के पीछे बाघों और तेंदुओं जैसे शिकारियों की घटती आबादी भी एक महत्वपूर्ण कारण है।

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अरीबा खान जामिया मिलिया इस्लामिया में एम ए डेवलपमेंट कम्युनिकेशन की छात्रा हैं। 2021 में NFI fellow रही हैं। ‘मैं मीडिया’ से बतौर एंकर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट जुड़ी हैं। महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर खबरें लिखती हैं।

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