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बेगूसराय की कांवर झील से क्यों मुंह मोड़ रहे प्रवासी पक्षी

साल 2010 में कांवर झील में लगभग 60 हजार पक्षी दर्ज किए गए थे, जो 2023 तक घटकर महज 8 हजार पर आ गये।

cropped prem kumar.jpeg Reported By प्रेम कुमार |
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why are migratory birds turning away from kanwar lake in begusarai
कांवर झील का एरियल व्यू / मौसम नंदन

बिहार के बेगूसराय में स्थित कांवर झील कभी पक्षियों की चहचहाहट से गुलज़ार रहा करती थी, लेकिन अब वहां वीरानी रहती है।


स्थानीय निवासी और पक्षियों के शोधकर्ता महेश भारती इस बदलाव को लम्बे समय से देख रहे हैं। वह कहते हैं, “पहले आसमान पंखों से ढका रहता था, अब सिर्फ खामोशी है।”

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अली हुसैन, जो एक अनुभवी पक्षी ट्रैपर रहे हैं और दुनिया के कई देशों में पक्षियों पर अध्ययन कर चुके हैं, कहते हैं, “कांवर झील कभी रंग-बिरंगे परिंदों से भरी रहती थी, लेकिन आज इसकी हालत देखकर अंदर तक दुख होता है।”


उन्होंने भारत के प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली के साथ काम किया है और वर्तमान में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े हैं।

बताया जा रहा है कि लालसर, बड़ा कोचर, दुमदार बतख, चम्मच बतख, कॉमन टील, गर्गनी टील, कॉटन टील, मलार्ड और डुबकी बतख पहले कांवर झील का अहम हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन ये सभी जलपक्षी अब कांवर झील से लगभग गायब हो चुके हैं।

अली हुसैन बताते हैं कि एक समय था जब ये सभी पक्षी बड़ी संख्या में कांवर झील के परिक्षेत्र में दिखाई देते थे। सर्दियों के मौसम में झील का इलाका इन प्रवासी पक्षियों से भरा रहता था, लेकिन अब इनकी मौजूदगी बेहद कम हो गई है और कई प्रजातियां पूरी तरह दिखनी बंद हो चुकी हैं।

internationally renowned ornithologist ali hussain
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पक्षी विशेषज्ञ अली हुसैन

क्या कहते हैं आंकड़े

कांवर झील उत्तरी बिहार के बेगूसराय ज़िले में 6,311 हेक्टेयर (63.11 वर्ग किमी) क्षेत्र में फैला हुआ है। यह एशिया की सबसे बड़ी ‘ऑक्स-बो’ झीलों में से एक है, जो बूढ़ी गंडक नदी से बनी है। बूढ़ी गंडक इस झील से लगभग 10 किमी दूर बहती है। ऑक्स-बो झीलें ऐसे वेटलैंड होते हैं जो नदियों के घुमावदार बहाव से बनते हैं।

कांवर झील को पानी दो स्रोतों से मिलता है। पहला स्रोत मॉनसून की बारिश है, और दूसरा स्रोत 14 ऐसी जलधाराएँ हैं जो एक दर्जन अन्य वेटलैंड से निकलती हैं; ये वेटलैंड बूढ़ी गंडक नदी से जुड़े हुए हैं और काबर ताल में पानी पहुँचाते हैं।

कांवर झील में पक्षियों की आबादी घट रही है, इसकी पुष्टि आंकड़े भी करते हैं। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और एशियन वाटर बर्ड सेंसस के आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2023 में कांवर झील में 39 प्रजातियों के कुल 906 पक्षी थे। साल 2024 में यह संख्या काफी कम हो गई। आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में प्रजातियों की संख्या घटकर 29 पर आ गई और पक्षियों की संख्या 326 रह गई।

यह गिरावट इस आर्द्रभूमि के तेजी से बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है। इससे पहले के आंकड़े भी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। साल 2010 में कांवर झील में लगभग 60 हजार पक्षी दर्ज किए गए थे, जो 2023 तक घटकर महज 906 पर आ गये।

स्थानीय मछुआरे प्रमोद कुमार इस गिरावट के पीछे के कारणों को अपने अनुभव से समझाते हैं। उनका कहना है, “जब छोटी मछली ही नहीं बचेगी, तो पक्षी आएंगे कहाँ से?”

वे बताते हैं कि झील में अत्यधिक सघन जालों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे छोटी-छोटी मछलियां भी पकड़ ली जाती हैं। ये मछलियां प्रवासी पक्षियों का मुख्य भोजन होती थीं। अब जब यह भोजन स्रोत ही खत्म हो रहा है, तो पक्षियों का आना भी स्वाभाविक रूप से कम होता जा रहा है।

the bird population in kanwar lake is declining
कांवर झील में पक्षियों की आबादी घट रही है / मौसम नंदन

क्यों ग़ायब हो रहे पक्षी

महेश भारती के मुताबिक, कावर झील से कई पक्षी प्रजातियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। वे बताते हैं कि पहले बड़ी संख्या में “रेड क्रेस्टेड पोचार्ड” (स्थानीय नाम लालसर) जैसे पक्षी यहां आते थे, लेकिन अब वे दिखाई नहीं देते।

इसके पीछे वे तीन प्रमुख कारण बताते हैं — भोजन का संकट, बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप और सिकुड़ता जल क्षेत्र।

पहले कांवर झील के आसपास बड़े पैमाने पर धान की खेती होती थी, जो पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत था। लेकिन, पिछले कई वर्षों से यह खेती बंद हो चुकी है, जिससे पक्षियों के लिए भोजन की उपलब्धता कम हो गई है।

दूसरा कारण है बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप। झील में नावों का संचालन बढ़ गया है, मछुआरों की संख्या में इजाफा हुआ है और शिकारियों द्वारा नाव से शिकार की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। इन सब वजहों से पक्षियों के लिए यह क्षेत्र अब सुरक्षित नहीं रह गया है।

in 2010, there were 60,000 birds in kanwar lake, which reduced to 8,000 in 2023
2010 में कांवर झील में 60 हजार पक्षी थे, जो 2023 में घटकर 8 हजार रह गए / मौसम नंदन

तीसरा और महत्वपूर्ण कारण है झील का सिकुड़ता जल क्षेत्र। पिछले लगभग 40 वर्षों में कांवर झील का जल क्षेत्र लगातार घटा है, जिससे पक्षियों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हुआ है। जल क्षेत्र के सिकुड़ने का सीधा असर यहां के जलीय जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ा है।

कांवर झील में पक्षियों की गणना में शामिल रहे महेश भारती कहते हैं, “पक्षी अभ्यारण्य घोषित होने के बावजूद कांवर झील को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए न तो सरकार गंभीर है और न ही स्थानीय स्तर पर जागरूकता दिखाई देती है।”

कांवर झील कभी एशिया की प्रमुख मीठे पानी की आर्द्रभूमियों में शामिल रही है। वैज्ञानिकों और पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, चीन, साइबेरिया, मंगोलिया, अफगानिस्तान और हिमालयी क्षेत्रों में जब बर्फबारी और बर्फीले तूफान शुरू होते हैं, तो वहां के पक्षी हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर उत्तर भारत के जलाशयों की ओर रुख करते हैं। उस समय कांवर झील उनका प्रमुख आश्रय स्थल हुआ करती थी, जहां उन्हें प्रचुर मात्रा में भोजन और सुरक्षित वातावरण मिलता था।

कांवर झील के संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर 90 के दशक से ही मांग उठने लगी थी। साल 1986 में जिला गजट के माध्यम से इसे पक्षी अभ्यारण्य बनाने की मांग उठी थी, ताकि यहां बड़े पैमाने पर हो रहे पक्षियों के शिकार को रोका जा सके। साल 1987 में इसे “कांवर लेक पक्षी विहार” के रूप में बंद क्षेत्र घोषित किया गया और 20 जून 1989 को बिहार सरकार ने अधिसूचना जारी कर लगभग 6311.63 हेक्टेयर क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर कांवर झील पक्षी अभ्यारण्य घोषित कर दिया।

नवंबर 2020 में इसके अंतरराष्ट्रीय महत्व को देखते हुए इसे रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि का दर्जा मिला। रामसर साइट का दर्जा पाने वाली यह बिहार की पहली झील है। 16 अक्टूबर 2020 को प्रकाशित रामसर सूचना पत्र के अनुसार, सर्दियों में कांवर झील जल-पक्षियों से भरा रहता है, और अपने वार्षिक प्रवास चक्र के दौरान यहाँ 59 से अधिक प्रजातियाँ आती हैं। इसके अलावा, यह 206 स्थानीय पक्षियों को भी आश्रय प्रदान करता है।

kanwar lake, photographed in 2024
कांवर झील की 2024 में ली गई तस्वीर / मौसम नंदन

जब हमने डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर अभिषेक कुमार से कांवर झील के विकास को लेकर बात की, तो उन्होंने दो बड़ी समस्याएं गिनाईं – जमीन विवाद और पानी की कमी।

उन्होंने बताया कि जमीन से जुड़ा मामला फिलहाल हाईकोर्ट में लंबित है, जिस कारण किसी भी बड़े विकास कार्य को जमीन पर उतारना संभव नहीं हो पा रहा है। वहीं, पानी की समस्या के समाधान के लिए जल संसाधन विभाग द्वारा चेक डैम बनाकर पानी को रोकने की योजना स्वीकृत हो चुकी है, लेकिन यह योजना भी करीब एक साल से रुकी हुई है।

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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प्रेम कुमार बिहार के बेगूसराय जिले के एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। वर्तमान में वे DD News और PTI के लिए कार्यरत हैं।

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