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कौन थे अनूप लाल मंडल जिनकी प्रतिमा का सीएम नीतीश ने किया अनावरण

अनूप लाल मंडल, केवर्त समाज से आते हैं, जिनकी बिहार में अनुमानित आबादी लगभग 2.65 लाख है। हालांकि, केवर्त समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि नीतीश सरकार ने जातिगत सर्वेक्षण में केवर्त समाज को कई हिस्सों में बांट दिया, जिसकी वजह से उनकी आबादी कम दिख रही है।

Reported By Umesh Kumar Ray |
Published On :
who was anup lal mandal whose statue was unveiled by cm nitish

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शनिवार को कटिहार जिले के समेली प्रखंड कार्यालय परिसर में अनूप लाल मंडल की प्रतिमा का अनावरण किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने जिले में 583 करोड़ रुपये की लागत वाली 242 योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया।


मुख्यमंत्री ने इस संबंध में अपने फेसबुक पेज पर लिखा, “इन योजनाओं से जिले में विकास कार्यों को नई गति और दिशा मिलेगी, जिससे लोगों के जीवनस्तर में सकारात्मक सुधार होगा एवं उन्हें प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा।”

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लेकिन, इन विकास योजनाओं से इतर लोगों के बीच अनूप लाल मंडल की चर्चा रही कि आखिर अनूप लाल मंडल हैं कौन जिनकी प्रतिमा का इस चुनावी अबोहवा में अनावरण किया गया।


अनूप लाल मंडल का रचना संसार

अनूप लाल मंडल मूल रूप से साहित्यकार हैं जिन्हें बिहार का दूसरा प्रेमचंद भी कहा जाता है। उनका जन्म वर्ष 1896 में कटिहार के चकला मोलानगर मुहल्ले में हुआ था। वह सूबे की अलग अलग जगह रहे और वहां के शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई की। उन्होंने साल 1921 में राजस्थान के बीकानेर में एक कॉलेज में हिन्दी व्याख्याता के तौर पर नौकरी शुरू की। अपने जीवन काल में आधा दर्जन से अधिक किताबें लिखीं, जो मुख्य रूप से फिक्शन थे। उनकी पहली किताब एक उपन्यास थी, जिसका शीर्षक था निर्वासिता। ये किताब इलाहाबाद से छपी थी। बीकानेर में वह लम्बे समय तक टिक नहीं पाये क्योंकि वे घुमक्कड़ प्रवृति के थे।

अंगदेस डॉट कॉम वेबसाइट ने उनके जीवन और रचनाओं पर एक विस्तृत लेख लिखा है। इस लेख के मुताबिक, वह नौकरी छोड़ 1930 में वापस अपने गांव लौटे और सेवा आश्रम स्थापित किया व यहीं रहने लगे। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने लक्ष्मीपुर ड्योढ़ी में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी की, जहां उन्हें तनख्वाह के रूप में 50 रुपये महीना मिलते थे। लेकिन उनका मन नहीं रमा तो बरारी आ गये और युगांतर साहित्य मंदिर नाम से एक प्रकाशन खोल लिया। इस बीच वह लगातार लिखते रहे और साल 1930 में अपना दूसरा उपन्यास ‘समाज की वेदी’ और फिर ‘साकी’ लिखा। उन्होंने अंग्रेजी उपन्यास हंगर का गरीबी के दिन नाम से हिन्दी अनुवाद भी किया।

वेबसाइट के अनुसार, हिन्दी भाषा के साथ साथ बांग्ला, नेपाली और अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी बराबर पकड़ था। उन्होंने अपने जीवनकाल में कुल 24 उपन्यास लिखे जिनमें ज्योतिर्मयी, रूपरेखा, मीमांसा, वे अभागे, दस बीघा जमीन, ज्वाला, आवारों की दुनिया, दर्द की तस्वीरें, बुझने न पायें, तूफान और तिनक तथा सविता प्रमुख हैं। उनका आखिरी उपन्यास अंगिका भाषा में था जिसका शीर्षक था ‘नया सुरुज नया चान’। इस उपन्यास का लोकार्पण पटना में पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री ने किया था। इसके अलावा उन्होंने बच्चों के लिए भी कई किताबें लिखीं।

उन्होंने और कितनी दूर है मंजिल नाम से आत्मकथा भी लिखी, जो अप्रकाशित रही। उनको इस बात की टीस रही कि उनकी आत्मकथा उनके जीवित रहते प्रकाशित नहीं हो पाई। अंगदेश डॉट कॉम के मुताबिक, उन्होंने डॉ श्रीरंजन सुरिदेव को लिखे एक पत्र मे इसको लेकर चिंता जाहिर की थी। उन्होंने लिखा था – प्रिय श्रीरंजन, शुभाशीष! तीन महीने से रोगग्रस्त हो पड़ा हूँ। चिकित्सा चल रही है, पर कोई लाभ नहीं दिख पड़ता। शरीर से भी काफी क्षीण हो गया हूँ अब पटना जाने का कभी साहस नहीं कर सकता! यही कारण है कि श्री जयनाथ मिश्र ने मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र से मिलने के लिए जिस तिथि को बुलाया था, मेरा जाना संभव नहीं हो सका। जीवन में एक ही साध थी, वह थी– आत्मकथा का प्रकाशन। क्या करूँ– भगवान की इच्छा…. !”

उनकी मृत्यु 22 सितम्बर 1982 को हुई, लेकिन हिन्दी साहित्य में उनकी चर्चा उतनी नहीं होती जितनी होनी चाहिए। हालांकि, उनकी याद में हर साल उनके गांव के सामाजिक लोग कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

अंगदेश डॉट कॉम इस संबंध में प्रख्यात कथाकार डॉ. रामधारी सिंह दिवाकर कोट करते हुए लिखता है, “अनूपलाल मंडल के विस्मृत हो जाने या अचर्चित रह जाने की एक वजह बिहार के स्कूलों और विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों से उनको निकाल बाहर करना है। आरम्भ से ही बिहार के हिंदी पाठ्यक्रमों से अनूपलाल मंडल का नाम मिटा देने की साज़िश का नतीजा है कि विद्यार्थियों की कौन कहे, एमए तक हिंदी पढ़ानेवाले बिहार के प्राध्यापकों तक ने ऐसे महत्वपूर्ण उपन्यासकार का नाम नहीं सुना ! किसी भी साहित्यकार का कुछ नहीं पढ़ना और साहित्यकार का नाम ही न सुनना– दो भिन्न स्थितियाँ हैं। अनेक साहित्यकार हैं, जिनका लिखा हमने-आपने नहीं पढ़ा है, लेकिन नाम सुना है, किंतु अनूपलाल मंडल बिहार के ऐसे अभिशप्त कथाकार हैं, जिनका नाम ही मिटता जा रहा है।”

क्या केवर्त समाज को लुभाना चाहते हैं नीतीश

अनूप लाल मंडल, केवर्त समाज से आते हैं, जिनकी बिहार में अनुमानित आबादी लगभग 2.65 लाख है। हालांकि, केवर्त समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि नीतीश सरकार ने जातिगत सर्वेक्षण में केवर्त समाज को कई हिस्सों में बांट दिया, जिसकी वजह से उनकी आबादी कम दिख रही है। अखिल भारतीय केवर्त कल्याण समिति का कहना है कि केवर्त समाज की आबादी अधिक है, लेकिन उन्हें चार अलग अलग जातियों में बांट दिया गया जिससे केवर्त की आबादी कम लग रही है।

इस जाति का मुख्य काम नाव खेना और मछली पकड़ना है। इस जाति की आबादी मुख्य तौर पर नदियों के किनारे मिलती है।

जाति सर्वेक्षण-2023 के मुताबिक, केवट जाति की आबादी बिहार में 9.37 लाख है। वहीं गंगोता जाति की आबादी 6.48 लाख है। अखिल बारतीय केवर्त कल्याण समिति से जुड़े अरुण कुमार ने कहा कि गंगोता, केवट, कउट सभी केवर्त समाज में ही आते हैं। अरुण कुमार ने आगे कहा कि उत्तर बिहार के अलग अलग हिस्सों में इस जाति के लोग अलग अलग सरनेम इस्तेमाल करते हैं। मसलन केवर्त जाति के लोग सिंह, राय, गुप्ता, मंडल, आदि सरनेम भी लगाते हैं।

बिंद और मल्लाह को भी केवर्त जाति से ही जोड़ा जाता है, लेकिन जाति सर्वेक्षण में मल्लाह को अलग जाति के तौर पर चिन्हित किया गया है। जाति सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में मल्लाह जाति की आबादी लगभग 34 लाख और बिंद जाति की आबादी 12.85 लाख है।

ये जातियां बिहार में अतिपिछड़ा वर्ग में शामिल हैं, जो कि एक बड़ा समूह है, लेकिन राजनीति में इनकी भागीदारी कम ही है।

बिहार की राजनीति में जातियों की भागीदारी पर पैनी नजर रखने वाले पत्रकार बीरेंद्र यादव कहते हैं, “राजनीति में इनकी भागीदारी कम है क्योंकि ये समाज आर्थिक तौर पर भी कमजोर है उनकी आबादी भी कम है। मुझे लगता है कि बिहार में इस समाज से आधा दर्जन से भी कम विधायक होंगे और सांसद तो सिर्फ एक ही हैं दिलेश्वर कामैत।”

उल्लेखनीय हो कि दिलेश्वर कामैत, जनता दल (यूनाइटेड) के टिकट पर सुपौल संसदीय सीट से सांसद हैं। सुपौल में इस जाति की ठीकठाक आबादी है। सुपौल के अलावा कटिहार, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, भागलपुर आदि जिलों में भी इनकी अच्छी आबादी है। ऐसे में अनूपलाल मंडल की मूर्ति के अनावरण को बिहार में होनेवाले विधानसभा चुनाव और वोट बैंक से जोड़ कर देखा जा रहा है।

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Umesh Kumar Ray started journalism from Kolkata and later came to Patna via Delhi. He received a fellowship from National Foundation for India in 2019 to study the effects of climate change in the Sundarbans. He has bylines in Down To Earth, Newslaundry, The Wire, The Quint, Caravan, Newsclick, Outlook Magazine, Gaon Connection, Madhyamam, BOOMLive, India Spend, EPW etc.

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