बिहार विधानसभा चुनाव में 121 विद्यानसभा सीटों के लिए 6 नवंबर को पहले चरण को वोटिंग हुई। वहीं, दूसरे व अंतिम चरण का चुनाव 11 नवंबर को होगा जिसमें 122 सीटों के उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला ईवीएम में कैद हो जाएगा। सीमांचल में दूसरे चरण में मतदान किये जाएंगे।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सीमांचल के जिलों में एनडीए और महागठबंधन के साथ-साथ जन सुराज और एआईएमआईएम समेत कई दलों के उम्मीदवार मैदान में हैं। इस चुनाव पर युवाओं की क्या सोच है यह जानने के लिए हमने विधानसभा चुनाव में पहली बार वोट करने वाले किशनगंज जिले के कुछ मतदाताओं से बात की।
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कई युवा ऐसे मिले जो किसी एक पार्टी को वोट देने का मन बना चुके हैं जबकि कुछ अभी विकल्प तलाश रहे हैं। “हमारे पास विकल्प कम है, इन्हीं में से किसी को चुनना होगा।,” 18 वर्षीय सरवर अहमद ने ‘मैं मीडिया’ से कहा, “उम्मीदवारों में जो कम खराब है उसको वोट करेंगे। जो भी जीत कर आये वो विधानसभा में अपनी बात अच्छे तरीके से रख पाए और उसकी नीयत अच्छी हो।”
बहादुरगंज प्रखंड स्थित बड़ा अलताबाड़ी गांव निवासी सरवर मानते हैं कि इस बार बहादुरगंज विधानसभा सीट पर काबिल उम्मीदवारों की सूची लंबी नहीं है। गिने चुने कुछ विकल्पों में से ही उन्हें कुछ फैसला करना होगा। वह चाहते हैं कि उनके क्षेत्र से जीतने वाला विधायक सत्ताधारी दल से हो ताकि वह क्षेत्र के लिए बेहतर तरीके से काम कर सके।
वह आगे कहते हैं, “एनडीए की सरकार न आ जाए इसी को देखते हुए लोग वोट करना चाहते हैं। इसके उलट मेरी सोच है कि क्षेत्र का विकास बड़ा मुद्दा होना चाहिए।”
शिक्षा व्यवस्था युवाओं का बड़ा मुद्दा
सरवर अहमद किशनगंज शहर के मारवाड़ी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में स्नातक कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बहादुरगंज के नेहरू कॉलेज में केवल गिने-चुने आर्ट्स डिग्री कोर्स ही कराए जाते हैं, जिस कारण युवाओं को बाहर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिला लेना पड़ता है।
किशनगंज प्रखंड की बेलवा पंचायत निवासी मीर रैयान ने बताया कि वह एक ऐसे प्रत्याशी को चुनना चाहते हैं जो उनके क्षेत्र में सालों से काम कर रहे हों। उनका आदर्श विधायक एक जाना पहचाना और भरोसेमंद चेहरा वाला होना चाहिए।
23 वर्षीय रैयान ने इसी वर्ष स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। आगे वह बीएड की पढ़ाई करना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि किशनगंज में कॉलेज की कमी एक बड़ी समस्या है। जिले में स्नातक के लिए जो गिने चुने कॉलेज हैं वहां बहुत अधिक विकल्प नहीं होते। स्नातक के बाद हालत और बदतर हो जाती है। बीएड करने के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है।
रैयान पश्चिम बंगाल के रायगंज जिले की एक निजी संस्था से बीएड करना चाहते हैं। उनके जानने वालों में कई विद्यार्थी वहीं से बीएड की पढ़ाई कर रहे हैं। उनमें से एक आकिब रज़ा ने बताया कि किशनगंज में बीएड की पढ़ाई नहीं होती। सरकारी संस्थाओं से किया जा सकता है लेकिन उसके लिए कई तरह की एंट्रेंस परीक्षा देनी पड़ती है जिसमें कोर्स कितने दिनों में पूरा होगा इसकी गारंटी नहीं होती। इसी वजह से वह और उनके कई साथियों ने बीएड की पढ़ाई के लिए पश्चिम बंगाल को चुना।
“यहां बीएड कॉलेज खुलना चाहिए। किशनगंज को छोड़कर बच्चे दूसरे शहरों में जाते हैं,” 23 वर्षीय मोहम्मद फैज़ ने कहा।
मोहम्मद फैज़ किशनगंज शहर के मोहिउद्दीनपुर इलाके में रहते हैं। पिछले वर्ष ठाकुरगंज के एमएच आज़ाद कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब वह बीएड करना चाहते हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल से बीएड करने का फैसला किया है।
एहतेशाम रज़ा और शादाब आलम पश्चिमपाली में एक निजी क्लिनिक में काम करते हैं। दोनों बी-फार्मा की पढ़ाई करना चाहते हैं।
कोचाधमन विधानसभा क्षेत्र के चकला पंचायत निवासी एहतेशाम रज़ा रक्त जांच करते हैं और आगे इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं।
बी-फार्मा के लिए वह पश्चिम बंगाल के दालखोला के एक निजी संस्था से पढ़ना चाहते हैं। “बंगाल में बी-फार्मा करने से एक से डेढ़ लाख रुपया कम खर्च होगा। यहां 3 लाख लगेगा तो वहां एक लाख में हो जाएगा,” एहतेशाम ने कहा।
वहीं, बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र के शादाब आलम बिहार की शिक्षा व्यवस्था से निराश हैं लेकिन शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया को वह एक सकारात्मक क़दम मानते हैं। उनका कहना है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में बेहतरी आएगी।
एएमयू की बढ़ती मांग
किशनगंज में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की शाखा के निर्माण का काम सालों से अटका है। कानूनी पेंच और केंद्र सरकार के फंड की कमी ने इस बड़े प्रोजेक्ट को लंबे समय से रोक कर रखा है। किशनगंज के युवा विद्यार्थी एएमयू सेंटर को इस चुनाव में भी एक बड़ा मुद्दा मानते हैं।
इस पर मीर रैयान कहते हैं, “किशनगंज में पर्याप्त कॉलेज नहीं है। बाहरी शहरों में लोगों को मनपसंद कॉलेज मिलता है, यहां वैसा नहीं है। यहां एक अच्छी यूनिवर्सिटी खुले। एएमयू का काम बहुत सालों से रुका हुआ है, हम चाहते हैं वो काम आगे बढ़े। कई सालो से उसको मुद्दा बनाकर रखा हुआ है लेकिन काम नहीं करवाते हैं।”
कोचाधमन विधानसभा क्षेत्र से आने वाले 21 वर्षीय एहतेशाम रज़ा ने कहा कि वह शिक्षा के लिए आवाज़ उठाने वाला नेता चाहते हैं। “मुझे बोलने वाला नेता चाहिए जो हर मद्दे पर बात करे।।” वह कहते हैं, “हमारे यहां एक मेडिकल कॉलेज बनना चाहिए। यहां एएमयू का काम रुक गया है, वो भी बनना चाहिए। अभी वहाँ केस वग़ैरह चल रहा है, काफि दिन से अटका हुआ है, कोई सुनवाई नहीं हो रही है।”
बिहार में रोज़गार, अलादीन का चिराग!
23 वर्षीय मोहममद फैज़ के पिता किशनगंज के पशिमपाली में खिलौने की छोटी सी दुकान चलाते हैं जबकि फैज़ एक कॉस्मेटिक दुकान में पार्ट टाइम जॉब करते हैं। इसके अलावा वह सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “सबसे बड़ा मुद्दा तो रोज़गार का है। सभी युवा रोज़गार चाहते हैं। वादा सब पार्टी करती है लेकिन पूरा नहीं करती है।”
फैज़ बताते हैं कि कुछ महीने पहले उन्होंने डाटा एंट्री की सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा दिया था। परीक्षा में क्वालीफाई करने के बावजूद उनसे नौकरी के लिए 2 लाख रुपये की मांग की गई जो वह देने में असमर्थ थे। पैसे न देने के कारन उन्हें नौकरी नहीं मिली।
“इसको लेकर पटना में प्रदर्शन भी हुआ। अधिकारी भी आये लेकिन कुछ हुआ नहीं। अधिकारी बोले कि तुमलोग क्वालीफाईड नहीं हो, हालांकि हमलोग क्वालिफिकेशन का सर्टिफिकेट भी दिखाए थे,” फैज़ ने कहा।
बेलवा निवासी मीर रैयान चाहते हैं कि राज्य के युवाओं के लिए प्राइवेट सेक्टर में नौकरी के अवसर बढ़े ताकि सरकारी नौकरी पर निर्भरता कम हो। उन्होंने कहा, “यहां कोई इंडस्ट्री नहीं है। हम चाहेंगे नया नया इंडस्ट्री आये बिहार में। जो सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, अच्छी बात है लेकिन प्राइवेट जॉब का भी अवसर खुले ताकि इतने सारे लोग जो बाहर जा रहे हैं वो कम जाएँ।”
खेल के क्षेत्र में पिछड़ता किशनगंज
कोचाधमन विधानसभा क्षेत्र के वासिफ रज़ा स्नातक करने के बाद सरकारी नौकरी की तलाश में हैं। वासिफ क्रिकेट खिलाड़ी रह चुके हैं। उन्होंने किशनगंज प्रीमियर लीग का दो सीज़न खेला और जिला स्तर पर भी कई वर्षों तक खेलते रहे।
वासिफ ने बताया कि किशनगंज प्रखंड स्थित बेलवा हाट के पास खेल का एक मैदान हुआ करता था जहां अब इमारतें बन चुकी हैं। क्षेत्र के सैकड़ों खिलाड़ी जिस मैदान में खेलकूद कर बड़े हुए अब वो नहीं रहा।
वह कहते हैं, “यहां क्रिकेट का फील्ड था जो अब लगभग पूरी तरह से कवर हो चुका है। खेलकूद में किशनगंज के लीडरों का इन्वॉल्वमेंट बहुत कम है। जब तक वे इन्वॉल्व नहीं होंगे तो कुछ नहीं हो सकता।”
वह मानते हैं कि बिहार टीम में किशनगंज का एक भी खिलाड़ी का न होना एक चिंताजनक बात है। इसके अलावा सीमांचल की जोनल टीम में भी किशनगंज का नेतृत्व ना के बराबर होता है। इसका ज़िम्मेदार वह स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी मानते हैं।
“सीमांचल जोनल टीम कहीं खेलने जाती है तो उसमें किशनगंज के खिलाड़ी बहुत काम पाए जाते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि, हमारे लीडर कुछ बोलते ही नहीं है इस पर। ढंग का मैदान भी नहीं है हमारे पास। रुईधासा का एक मैदान था उसे भी घेरा जा रहा है,” वासिफ रज़ा बोले।
किशनगंज के युवा वोटर इस चुनाव में प्रत्याशियों से क्या चाहते हैं, इस के जवाब में वासिफ कहते हैं, “मैं प्रत्याशियों से यह पूछता हूँ कि वह मेरे विधानसभा क्षेत्र के लिए वे क्या करेंगे। वह चाहें तो हमारे लिए हमारा हक़ छीन कर ला सकते हैं। नेता के अंदर यह खौफ होना चाहिए कि वह यह काम नहीं करेंगे तो हार सकते हैं।”
इस बारे में बेलवा निवासी मीर रैयान कहते हैं, “अगर मेरे पास कोई नेता आएगा, तो तो हम पूछेंगे कि इन मांगों को पूरा करने का वादा करते हैं? अगर ये सब पूरा कर के देंगे तो आगे उनके बारे में सोचेंगे, चाहे वो कोई भी नेता हो। किशनगंज में शिक्षा का स्तर बहुत निचले स्तर पर है, उसको बढ़ाया जाए।”
बड़ा अलताबाड़ी निवासी सरवर अहमद पैसे लेकर वोट देने की समस्या से चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में इतनी बदहाली है कि लोग एक वक्त की रोटी के लिए अपना वोट बेच देते हैं। कई बार युवा भी इस झांसे का शिकार हो जाते हैं जिससे बाद में क्षेत्र की बदहाली बढ़ जाती है।
“गरीब लोगों को 500-1000 दिया जाता है कि ये लो और हमको वोट दो। यह सबसे बड़ी समस्या है।,” 18 वर्षीय सरवर बोले, “इसी की वजह से जनता नेता के पास नहीं जा पाती है। अगर जाती भी है तो नेता भगा देता है कि हम तुमको पैसा दे चुके हैं, तुम्हारा वोट खरीद लिए हैं, अब क्या बोल रहे हो ?..” सरवर ने कहा।
सोशल मीडिया: दौर का ओपिनियन मेकर
विधानसभा चुनाव में पहली बार वोट कर रहे इन युवाओं में एक बात जो सामान्य थी, वो थी सोशल मीडिया का प्रयोग। सभी ने माना कि वोट किसे करना है इसका फैसला सोशल मीडिया पर राजनीतिक सामग्री देख कर करना अब काफी प्रचलित है। आज युवाओं में राजनीतिक समझ के लिए सोशल मीडिया की भूमिका काफी बड़ी हो चुकी है।
युवा वोटर एहतेशाम रज़ा, शादाब आलम, वासिफ़ रज़ा और मोहम्मद फैज़ सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं। वे सभी अपनी अपनी पसंदीदा पार्टी या प्रत्याशी को वोट करने का मन बना चुके हैं।
बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र निवासी शादाब आलम सोशल मीडिया से पार्टियों का प्रचार प्रसार देखते हैं। वह एक दल का खुला समर्थन भी करते हैं लेकिन वह यह कहते हैं कि विधायक किसी दल का भी बने चुनाव जीतने के बाद उसका ग़ायब होना तय है।
“स्कूल, मदरसे में पढ़ाई ठीक से नहीं होती। कोई विधायक किसी का नहीं होता है, सब कमा कर खाता है। 14 तारीख को जीतने के बाद 15 तारीख को वो नज़र नहीं आएंगे, ऐसे ही सब एमएलए होते हैं। जीतने के बाद कोई किसी का नहीं होता,” शादाब आलम ने कहा।
वहीं अलताबाड़ी पंचायत निवासी सरवर अहमद ने सोशल मीडिया के प्रयोग पर कहा,”मैं यह कोशिश करता हूँ कि मेरे सोशल मीडिया पर नया नया कंटेंट आए , सिर्फ एक ही पार्टी का न आए। इसके लिए मैं सर्च करके देखता हूँ ताकि एकतरफा कंटेंट न दिखे।
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