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बिहार में दलहन की खेती पर जलवायु परिवर्तन का कैसा असर?

बिहार के अरवल ज़िले में जहां कभी बुद्ध के शिष्य मूँग-दाल और मरुआ खाकर उनकी वाणी लोगों तक ले जाते थे और जहां कभी आर्यभट्ट ने दाल-रोटी खाई थी - क्या है वहाँ के दलहन उगाने वाले किसानों का हाल ? क्या है दलहन का हाल

sm zafar equbal arwal Reported By SM Zafar Equbal |
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what is the impact of climate change on pulses cultivation in bihar

बिहार की सोन नदी के पूर्वी तट पर बसे ज़िले अलवर में 118222 चूल्हे जलते हैं। एक समय में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक बुद्ध के अनुयायी और शिष्य इस ज़िले में भ्रमण करते और बुद्ध के उपदेशों को लोगों के दिलों तक ले जाते। बदले में वे कुछ चाहते तो नहीं, मगर हिन्दुस्तान चूँकि अपने शिक्षकों के सत्कार के लिए जाना जाता है, आज के किसान कामेश्वर जैसे उस समय के गाँव वाले उन भिक्षुओं के झोले में कुछ अनाज जैसे मरुआ, कोई फल, थोड़ा नमक, हल्दी और कोई दाल रख दिया करते। 


वे बौद्ध भिक्षु झोला उठाते और चल देते। जब उन्हें रास्ते में भूख लगती तो वे चूल्हा जलाते, उसपर न जाने कौन सी पतीली रखते, दाल को सोन के पानी में गर्म करते, उसमें नमक और हल्दी डालते, मरुआ और दाल खाते और आगे बढ़ते जाते। इस तरह बुद्ध का उपदेश और बौद्ध-वचन विश्वभर में पहुँचा। यह इतिहास की बात है। वे भिक्षु आज जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अगर ज़िंदा होते तो उनके लिए एक से दूसरे गाँव जाना मुहाल हो जाता। क्योंकि उनके झोले में रखने के लिए किसान कामेश्वर के पास न तो खेसारी है, न ही मसूर और किसान लखन के पास तो मूँग भी नहीं। 

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कामेश्वर एक वृद्ध किसान हैं। इस बरस उन्होंने खेसारी और मसूर की खेती की थी। 


उन्होंने मैं मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, “दाल इस बार बहुत कम हुआ।” 

किसान लखन ने मूँग रोपा था। उन्हें ऐसा लग रहा था कि मूँग-दाल खिचड़ी में मिलाकर उसे स्वादिष्ट बनाएँगे और खिचड़ी को घी और अचार के साथ खाएँगे। वह सोच रहे थे कि खाने के बाद दोपहर में बरामदे में खाट पर थोड़ी देर सुस्ता लेंगे। जगे होने और नींद में होने के बीच की अवधि को औंघी लगना कहते हैं। आजकल वे इसी अवधि में रहने लगे हैं। जलवायु परिवर्तन से उनकी आठ कट्ठे की मूँग की खेती का नास हो गया। 

“पूरा नुक़सान हो गया,” वह भावुक हो जाते हैं, जैसे आँसू गले की हड्डी हो गया हो – न नैन में आ रहा है और न ही नीचे उतर रहा है। किसान लखन को यह उम्मीद मूँग के फूल को देखकर जगी थी। उनकी आँखों को शायद फूल देखना ही नसीब रहा हो, हाथों की लकीरों में मूँग-दाल का आना न रहा हो। जलवायु परिवर्तन के समय में मगर क़िस्मत को कोसना भूसे में भगवान को खोजने जैसा है । 

किसान लखन मूँग की खेती के बारे में आगे बताते हैं, “फूल देके सब सूख गया।” 

शहर की शादियों में आमतौर पर मूँग-दाल का हलवा खाते हुए पाठक इस बात को ज़रूर सोचें कि मूँग के पौधों पर किस रंग के फूल आते हैं। मूँग की फली लाल होती है या पीली? आलू की तरह ज़मीन के नीचे से मूँग को निकालते है या आम की तरह पेड़ की टहनियों से?  

कामेश्वर की खेसारी का फूल मगर तितली जैसे आकार में था। आमतौर यह तेज़ आसमानी, पर्पल, गुलाबी, लाल और सफ़ेद के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। जिस तरह सुबह होने तक, शम्मा हर रंग में जलती रहती है – वैसे ही खेसारी भी अपने फूलों को कई रंग दे जाता है।  

उनकी फ़सल को मगर समय पर बारिश नहीं मिली। उनकी आँखों ने तो वे सब रंग भी नहीं देखे जो लखन ने अपनी मूँग के देख रखे थे। 

कामेश्वर मैं मीडिया से बात करते हुए कहते हैं, “समय पर बारिश नहीं हुआ,फिर कुहासा हो गया, पूरा सूख गया।” यह बारिश नहीं होना और कुहासे का छा जाना – जलवायु परिवर्तन का हिस्सा है। यह आर्थिक रूप से भी हानि पहुँचाता है। 

वे पहले अपनी खेती से छह क्विंटल खेसारी की पैदावार ले लेते थे । इस बार दो क्विंटल भी नहीं हुआ। 

वे कहते हैं, “पहले 15-17 मन (40 किलो का एक मन होता है) दलहन हो जाता था, इस बार पाँच मन भी नहीं हुआ।” 

farmer kameshwar
किसान कामेश्वर

पहला नुक़सान हुआ कि पैदावार गिर गई। दूसरा, बीज, खाद, सिंचाई सब मिलकर खेसारी में ख़सारा बहुत हुआ। कम से कम एक से डेढ़ लाख रुपया बर्बाद हो गया। जलवायु परिवर्तन का यह नुक़सान सबसे ग़रीब माने जाने वाले राज्य में किसान कामेश्वर को क़र्ज़े में डाल देगा। उनके घर में चूल्हा जल रहा होगा। नमक और हल्दी भी होगी। सोन नदी पानी भी दे जाएगी। वह दाल से अपने परिवार का पेट भरें या बुद्ध भिक्षु का झोला भरें – इस दुविधा में इतिहास ने उन्हें नहीं डाला, पर्यावरण संकट ने डाला है। 

शायद किसान रामजीवन भिक्षु को खेसारी दे दें। पर मसूर वह भी नहीं दे पाएँगे। वह कहते हैं, “खेसारी ठीक हुआ, मसूर में क़रीब तीन-गुना नुक़सान हो गया। तीन-गुना नुक़सान सुनने में तीन-गुना लगान जैसा लगता है। सन उन्नीस सौ सैंतालीस से पहले अनाज अंग्रेज़ लूट ले जाते थे, अब बदलता हुआ मौसम किसानों से उनकी फ़सलें छीन ले रहा है। अलवर के किसानों ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर अंग्रेज़ों से स्वतंत्रा तो हासिल कर ली, इस मौसम की मार से वे कैसे बाहर आएँ, इसी की तलाश जारी है।   

रामजीवन ने तीन बीघा खेत में मसूर, खेसारी आदि की खेती की है। वह मासूमियत में अपने नुक़सान के लिए प्रकृति को ज़िम्मेवार ठहराते हुए कहते हैं, “सब प्रकृति की देन है, बारिश नहीं हुई।” 

मैं उन्हें इस सवाल के साथ छोड़ आया कि प्रकृति अपना नुक़सान स्वयं क्यों करेगी? 

बिहार में अरहर और खेसारी की खेती रबी फ़सलें हैं, इन्हें मूलतः अक्टूबर-दिसंबर में ठंड के दौरान बोया जाता है और मार्च-अप्रैल में इसकी कटाई होती है। इन फ़सलों को पहली सिंचाई रोपण के 40-45 दिन बाद, दूसरी, फली भरने के समय चाहिए होती है। मौसम विभाग कहता है कि जनवरी-फ़रवरी 2026 में चम्पारण के दो ज़िले के अलावा पूरे राज्य में बारिश नहीं हुई। मार्च से बारिश शुरू हुई, लेकिन अरवल में इस दौरान भी 31% कमी दर्ज की गई। 

अरवल के ज़िला उद्यान अधिकारी, सुधांशु कुमार सिंह मैं मीडिया को बताते हैं, “इस साल उपज में थोड़ी कमी रही है। उसका कारण यह रहा कि बारिश नहीं हुई। रबी की बुवाई के बाद पहले कुछ-न-कुछ बारिश हो जाती थी, जिससे (मिट्टी में) नमी बरक़रार रहती थी। इस बार नमी के अभाव के कारण दलहन पर प्रभाव पड़ा।”

हर खेत में अलग कहानी है। किसी का मसूर ठीक है, तो मूँग और खेसारी ख़राब। यह विविधता नहीं, विचित्रता है। ऊँट की करवट का तो फिर भी पता है, जलवायु परिवर्तन हर खेत में आड़े-तिरछे बैठता है। 

किसान लालजी पहले पाँच बीघा में खेती करते थे, अब चार में कर रहे हैं। वह कहते हैं, “इस बार सबसे ज़्यादा क्षति हुई। मौसम के कारण बहुत नुक़सान हुआ।” 

“सबसे ज़ायदा मसूर और खेसारी में नुक़सान है। पहले एक बीघा में 10 मन (चार क्विंटल दलहन) तक हो जाता था, इस बार चार-छह मन (लगभग दो क्विंटल) हुआ है।” 

आर्थिक रूप से उन्हें एक लाख रुपये का घाटा हुआ है। बिहार में कौन मुख्यमंत्री बनेगा- इस होड़ और हंगामे में सरकार का ध्यान किसानों की इन नुक़सानों की तरफ़ नहीं गया। सवाल यह रह जाता है कि क्या मुख्यमंत्री के न होने से दूसरे अधिकारी उस बैल की तरह हो जाते हैं जिसे किसान जब तक न हड़काए, वह खेत नहीं जोत सकता? 

रामजीवन कहते हैं, “कोई मुआवज़ा नहीं मिला, अगर सरकारी योजना है तो हमको नहीं मालूम। सरकार से कोई मदद नहीं मिल रहा है।” 

farmer ramjeevan
किसान रामजीवन

दलहन का घट रहा उत्पादन

पिछले बरस सरकार ने बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में दलहन का उत्पादन कम होता जा रहा है। किसान अमूमन धान-गेहूं उगाते हैं। पिछले साल (2024-25) राज्य में उगाई जाने वाली तमाम फ़सलों में दलहन 6% है। इसमें 2023-24 के मुकाबले तुलनात्मक वृद्धि हुई। यह क्षेत्रफल 2022-23 में 433.9 हज़ार हेक्टेयर था, जो 2023-24 में 46 हज़ार हेक्टेयर हुआ। मगर, जलवायु को यह परिवर्तन पसंद नहीं आया। बीते बरस फिर 2021-22 से भी कम पैदावार देकर गया। ज्ञात हो कि यह कोविड का समय था। मज़दूर गाँव लौट रहे थे। यह तय हुआ कि प्रवास रुकने से अपने गाँव की खेती में विभिन्नता और पैदावार में बढ़ोतरी आती है। यानी, प्रवासी मज़दूर, अपने गाँव में एक किसान है ।  

अरहर तो आधा रह गया। मूँग, मसूर, खेसारी के अलावा बिहार में 2022-23 में 1869 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अरहर की पैदावार हुई थी, जो 2023-24 में घट कर 1688 और 2024-25 में 1558 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। इसी दौरान खेसारी की उपज 1090, से घटकर 901 हुई, फिर 1049 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। 

ज्ञात हो कि विश्व को ज़ीरो देने वाला गणितज्ञ आर्यभट्ट भी कभी बिहार के अलवर के इलाक़े में रहा था। उन्होंने बिहार के स्टूडेंट्स को “मान जीजिए” सिखाया। अगर हम मान लें कि ऐसी ही कोई गिरावट शेयर बाज़ार में दिख जाए, तो डॉलर अरबपतियों के होश जाएं और सरकारें इसे ठीक करने के लिए नोटबंदी तक कर दे। जलवायु परिवर्तन का असर जिस दिन इन बाज़ारों में दिखने लगेगा, बाज़ार के रंग को औंघी आने लगेगी। 

आर्यभट के ज़ीरो खोज लेने में दाल की अहम भूमिका रही होगी। इस समय अगर ज़िंदा होते तो वे भी दाल से महरूम रह जाते, क्योंकि दलहन उगाने में बिहार के 38 ज़िलों में अरवल की हिस्सेदारी महज़ 1.1% है। यहाँ 2021-22 में दलहन का रकबा 3.51 हज़ार हेक्टेयर था, जो 2024-25 में बढ़ कर 4.8 हज़ार हेक्टेयर हुआ,फिर भी उपज में गिरावट ही दर्ज की गई। आर्यभट्ट के इस ज़िले में 2021-22 में पैदावार 1018 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो 2024-25 में घटकर 970 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गयी। 

जलवायु परिवर्तन से जूझती दलहल फसलें

हिन्दुस्तान विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक है और वैश्विक उत्पादन में लगभग 25% योगदान देता है। मुख्यतः वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में इन फ़सलों की खेती होती है इसलिए बारिश कहीं ज़्यादा, कहीं कम – दोनों ही कारणों से इन फ़सलों पर जलवायु परिवर्तन का गहरा प्रभाव और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कृषि क्षेत्रों में शोध के लिए ख्यात पश्चिम बंगाल स्थित संस्था Asian Journal of Advances in Agricultural Research ने वर्ष 2021 में एक शोध किया, जिसका शीर्षक था –  जलवायु परिवर्तन का दलहन पर प्रभाव। इस रिपोर्ट में साफ़ तौर पर पाया गयी कि यह आज एक प्रमुख पर्यावरणीय समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। 

शोध ने आगे पाया कि वायुमंडल में कार्बन डायआक्सायड (CO₂) जैसे ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा वैश्विक तापमान को बढ़ाने में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) का काम करती है, जिससे अधिक गर्मी-जाड़ा न सह पाने वाली दलहनी फसलें प्रभावित होती हैं। 

शायद लखन के खेत में मूँग के फूलों को बारिश निगल गई होगी।  

इस प्रकार की परिस्थितियाँ खाद्य और चारे की अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती हैं। दलहनी फ़सलें मानव आहार में वनस्पति प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। न जाने बिहार को प्रोटीन कहाँ से मिलेगा। रिपोर्ट आगे बताती है कि वर्तमान में इनके उत्पादन की वृद्धि दर में गिरावट के कारणों में अनियमित और अपर्याप्त वर्षा, अचानक तापमान में वृद्धि तथा असमय सूखा जैसी परिस्थितियाँ शामिल हैं। 

पाँचवाँ कारण यह भी है कि मानसून में बदलाव के कारण ख़रीफ फ़सलों की बुवाई में देरी होती है, जिसका प्रभाव रबी मौसम की दलहनी फ़सलों की बुवाई पर भी पड़ता है। देर से बोई गई फ़सलें अपनी वृद्धि अवस्था के दौरान अंतिम चरण में अधिक ताप का सामना करती हैं, जिससे उनकी उपज क्षमता घट जाती है। दूसरी ओर, फरवरी–मार्च के दौरान प्रजनन अवस्था में होने वाली असमय वर्षा भी उपज को काफ़ी कम कर देती है।

इसके अलावा, छठी और सातवीं वजह क्रमशः लवणता और जलभराव हैं। बदलती जलवायु परिस्थितियाँ कीट एवं रोगों के प्रकोप तथा खरपतवारों की वृद्धि को भी बढ़ावा देती हैं, जिससे उत्पादन में भारी कमी आ सकती है। कीटनाशक डालने से खेत भी ख़राब हो रहा है। 

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राँची, मन्दसौर और कानपुर के शोधकर्ताओं ने पिछले ही साल प्रकाशित हुई रिपोर्ट Impact of Climate Change on Seed Production of Pulses Crops में सुझाया कि जलवायु परिवर्तन दलहनी फ़सलों के बीज उत्पादन, उनकी वृद्धि, उपज और गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

अत्यधिक तापमान फ़सलों की बढ़ने की अवधि को कम कर देता है और फूल आने की प्रक्रिया को बाधित करता है। वहीं असामयिक ठंड पौधों की प्रारंभिक अवस्था और फूलों को नुक़सान पहुँचा कर उत्पादन को प्रभावित करती है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक है कि ऐसी रणनीतियाँ विकसित की जाएँ जिनमें कृषि विज्ञान (एग्रोनॉमी) और उन्नत प्रजनन तकनीकों का समन्वय होने के साथ ही, सरकारी नीतियों, फ़सल बीमा योजनाओं और उचित प्रबंधन उपायों का समुचित उपयोग हो।  

मैं आर्यभट्ट के शून्य में देखता हूँ। आर्यभट्ट के ‘शून्य’ में देखने पर मुझे अरवल के किसानों की मूँग, उनकी खेसारी और मसूर नज़र आती है। सोन नदी के पूर्वी तट पर जल रहे 118222 चूल्हे पर गलाई जा रही दाल में आज का कोई आर्यभट्ट नमक डालना भूल गया है। बुद्ध के शिष्य न जाने कहाँ उपदेश दे रहे होंगे। मुझे उनके उपदेशों पर अरवल के अरहर का नाम लिखा दिखाई देता है। कोई किसान कामेश्वर उनका झोला एक और बार भरने को तैयार है। क्या जलवायु परिवर्तन ऐसा संभव होने देगा? 

संपादन: आमिर मलिक 

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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