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गयाजी के किसानों पर मौसम की मार, मोटर बनी मजबूरी

दक्षिण बिहार के अधिकांश जिलों में अभी गेहूँ, सरसों और चने की फसल लहलहा रही है और पकने की अवस्था में है। अगर तेज हवा और बेमौसम बरसात हुई तो फसल पर असर पड़ेगा।

cropped saurav singh.jpeg Reported By सौरव सिंह |
Published On :
weather hits farmers in gayaji, motor becomes a compulsion
60 वर्षीय किसान अवधेश मांझी

जलवायु परिवर्तन से हो रहे मौसम में बदलाव की मार से हर किसान जूझ रहा है, लेकिन सबसे ज़्यादा चोट उन्हें खानी पड़ रही है जिनके पास सिंचाई का साधन नहीं है।


गयाजी जिले के टिकारी प्रखण्ड स्थित छटवां गांव के 60 वर्षीय किसान अवधेश मांझी अपने 12 वर्ष के नाती के साथ गेहूं का पटवन कर रहे हैं। वह घर से ही खाना लेकर आये हैं। खेत में खाना खाते हुए वह कहते हैं, “अब खेती पूरी तरह मोटर पर निर्भर हो गई है, जिसके पास मोटर है वह अच्छे से खेती कर रहा लेकिन हम जैसे गरीब किसानों का भगवान ही सहारा है।”

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अवधेश के पास एक बीघे से भी कम जमीन है। वह बताते हैं, “मोटर लगवाने में करीब डेढ़ लाख रुपये तक खर्च आता है। हम कहां से इतना पैसा लाएंगे? अगर 5-10 बीघा जमीन होती तो कहीं से कर्ज लेकर भी लगवा लेते। लेकिन स्थिति ऐसी है, हम ना कर्ज लेने में सक्षम हैं और ना ही हमें कोई उधार देने को तैयार होगा क्योंकि ज़मीन ही नहीं है उतनी। ऐसे में हमें पैसा देकर दूसरे के मोटर से पटवन करना पड़ता है। कभी कभी समय पर कोई पटवन करने को तैयार भी नहीं होता।”


पहले गांवों में सिंचाई के लिए आहर, पोखर और पइन जैसे पारंपरिक साधन थे। बरसात का पानी इन जलाशयों में जमा होता और धीरे-धीरे खेतों तक पहुंचता था। लेकिन अब यह व्यवस्था कमजोर पड़ गई है। अवधेश बताते है, “पहले चाड़ चलाकर भी खेत में पानी पहुंचा दिया जाता था और समय पर बारिश भी हो जाती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में हालात बदल गए है।”

चाड़ टीन का एक डब्बा जैसा होता है, जिसके दोनों किनारों पर रस्सी बंधी होती है। इसका उपयोग गांवों में किसी जलाशय से पानी खेत तक लाने के लिए किया जाता था।

सिंचाई के लिए मोटर पर निर्भरता ने किसानों की लागत बढ़ा दी है।

गयाजी जिले के चिरैली गांव में किसान प्रदीप शर्मा कहते हैं, “अगर एक बीघा धान का पटवन करना होता था तो पहले 250 – 300 रुपए का तेल लगता था। पहले डीजल सस्ता था। अब तो फिक्स्ड पैसा जाता है, बिजली ऑफिस को एक धान के सीजन में 7000 – 8000 रुपया देना होता। अगर एक बार फिक्स कर लिये तो, बारिश हो या न हो पैसा तो देना ही पड़ता है।”

एक अन्य किसान महेश कुमार ने कहा कि जिसके पास मोटर है वो ठेका पर दूसरों का पटवन करता है, एक सीजन में 1 बीघा का 2000 लेता है, कभी कभार उससे ज्यादा या कम भी लगता है। ऐसे में बारिश हो गया तब भी पैसा चला ही जाता है। नहीं हुआ बारिश तो धान पकने तक पटवन करता है।

गौरतलब हो कि इस इलाके में ऐतिहासिक तौर पर भी बारिश कम होती है, इसलिए यहां हजारों साल से आहर-पाइन व्यवस्था चल रही थी। इस व्यवस्था के जरिए बारिश और बाढ़ के पानी का संग्रह किया जाता है ताकि सिंचाई और पेयजल की किल्लत न रहे।

बताया जाता है कि बुद्ध के समय आहर पाइन सिंचाई व्यवस्था प्रचलन में थी, जिसका मतलब है कि इसकी शुरुआत काफी पहले हुई थी। कौटिल्य के आर्थशास्त्र में भी आहर का ज़िक्र मिलता है। ग्रीक यात्री मेगस्थनीज़, जिसने चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत की यात्रा की थी, ने भी अपने यात्रा वृतांत दक्षिणी बिहार में आहर-पाइन की मौजूदगी के बारे में विस्तार से लिखा है। 

आंकड़े बताते हैं कि साल 1930 में दक्षिण बिहार के 9,40,000 हेक्टेयर खेत की सिंचाई आहर-पाइन से की जाती थी, जो 1997 में घटकर 5,30,000 मिलियन हेक्टेयर पर आ गया।

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सूखे पाइन

कभी सूखा, कभी अचानक तेज बारिश

गयाजी जिला, दक्षिण बिहार में स्थित है, जहां मॉनसूनी बारिश औसतन कम होती है। इसलिए क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा अक्सर सूखे की चपेट में आ जाता है। 

आंकड़े बताते हैं कि इलाके में बारिश में एक अस्थिरता आई है। जलस्तर का गिरना, समय पर वर्षा न होना, अचानक बारिश, वज्रपात और तेज हवाएँ सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन की ओर इशारा करती हैं।

पिछले साल की ही बात करें तो जुलाई के महीने में गयाजी, औरंगाबाद, पटना तथा अन्य मगध क्षेत्र में अचानक हुई तेज बारिश से फल्गु और नॉर्थ कोयल जैसी नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ गया था। बिहार जल संसाधन विभाग के अनुसार, उस समय गया में स्थित फल्गु नदी का डिस्चार्ज 5,693 क्यूसेक से बढ़कर 97,763 क्यूसेक तक पहुँच गया था, जो बारिश की तीव्रता को दिखाता है। 

मौसम विभाग के मुताबिक, तब गयाजी जिले के डोभी इलाके में सिर्फ 24 घंटे में 82.4 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। वहीं, जिले के कोंच ब्लॉक में 57.8 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। पिछले साल मौसम विभाग ने कई बार गयाजी, औरंगाबाद और रोहतास में तेज बारिश और 30-40 किमी/घंटे की रफ्तार से हवा चलने का अलर्ट जारी किया था। 

ग्राउंडवाटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट जर्नल के एक अध्ययन में पता चलता है कि 1958 से 2019 के बीच दक्षिण बिहार में बारिश और तापमान में उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किया गया है। इस दौरान औसत तापमान में लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई और मानसूनी बारिश का पैटर्न अधिक अनियमित हुआ। शोध में यह भी पाया गया कि पूरे दक्षिण बिहार में सतही और भूजल दोनों में 600 मिमी से अधिक जल-घाटा (वाटर डेफिसिट) दर्ज किया गया है, जिससे खेती और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा है। अब बारिश कम दिनों में अधिक मात्रा में होती है। यानी कभी लंबे समय तक सूखा रहता है और फिर अचानक भारी बारिश हो जाती है। सरकारी आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं, क्योंकि पिछले साल गयाजी जिले में महज कुछ दिनों की बारिश में वार्षिक वर्षा औसतन से कहीं ज़्यादा दर्ज की गई थी। 

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कृषि विभाग के प्रोफ़ेसर हेमंत कुमार सिंह बताते हैं, “पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण बिहार (गयाजी, औरंगाबाद, नवादा, नालंदा, रोहतास आदि) में मॉनसून अधिक अनियमित और अस्थिर हुआ है। कभी लंबे सूखे अंतराल, तो कभी कम समय में अत्यधिक बारिश देखने को मिल रही है। पिछले कुछ वर्षों में कई बार मॉनसून के दौरान कुल वर्षा सामान्य से 25-50% तक कम रही है। बिहार में पिछले 10 वर्षों में 7 बार वर्षा सामान्य से कम दर्ज की गई है। बारिश के दिनों की संख्या कम हो रही है और कम समय में तेज बारिश की घटनाएँ बढ़ रही हैं।”

ऐसी अकास्मिक मौसमी घटनाएं किसानों के लिए चुनौती बनती जा रही हैं। कभी लंबे समय तक पानी नहीं मिलता और कभी अचानक इतनी बारिश हो जाती है कि खेत संभालना मुश्किल हो जाता है। हर साल सैकड़ों किसान इससे प्रभावित होते हैं और उनकी फसलें नष्ट हो जाती हैं। 

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सूखे जलाशय

बढ़ती लागत और कमती फसलें 

अवधेश बताते हैं कि सबसे ज्यादा दिक्कत धान की खेती के समय होती है क्योंकि धान को लगातार पानी चाहिए।

“धान के लिए खूब पानी चाहिए। दो-तीन पटवन में कुछ नहीं होता, जिन किसानों के पास मोटर नहीं है उनके सामने दो ही विकल्प बचते हैं, या तो भगवान के भरोसे खेती करें या फिर किसी दूसरे किसान को पैसे देकर सिंचाई करवाएं। लेकिन इसके लिए भी अब ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं।”, वह आगे कहते है । 

प्रदीप शर्मा भी खेती की बढ़ती लागत से परेशान हैं। उनके पास करीब आठ बीघा जमीन है। वह बताते हैं कि पहले खेती से ठीकठाक बचत भी हो जाती थी, लेकिन अब खेती लगातार महंगी होती जा रही है। “अब खेत की जुताई, पटवन, रोपनी, मजदूर का पैसा और खाद-बीज खरीदने में ही पूरा पैसा लग जाता है,” वह कहते हैं।

प्रदीप बताते हैं कि पहले धान के समय सिंचाई की इतनी चिंता नहीं होती थी। “एक-दो पटवन में काम चल जाता था, बाकी भगवान बरसा देते थे, लेकिन अब बिना मोटर के खेती करना मुश्किल हो गया है।” उन्होंने अपने खेत के लिए मोटर लगवाया है, लेकिन खेत अलग-अलग जगह होने के कारण सिचाई मे उन्हें परेशानी आती है।

इस मामले में प्रोफेसर हेमंत का भी यही कहना है कि धान-गेहूं की पारंपरिक फसल प्रणाली अब पहले जितनी स्थिर नहीं रही। वह बताते हैं, “धान की रोपनी का समय जून के मध्य से जुलाई तक होता है। जब शुरुआती मॉनसून कमजोर रहता है तो नर्सरी सूख जाती है और रोपनी देर से होती है। कई वर्षों में किसान लक्षित क्षेत्र से कम भूमि पर धान लगा पाए। धान के बाद खेत में नमी कम रहने से रबी सीजन की बुवाई प्रभावित होती है। तापमान बढ़ने से गेहूं के दाने छोटे और हल्के बनते हैं और इसकी पैदावार घटने की संभावना भी होती है। अनियमित बारिश और बढ़ते तापमान से पैदावार का सीधा असर फसल की उत्पादकता और लागत दोनों पर पड़ा है।

कोंच प्रखंड में रहने वाली 55 वर्षीय राजकुमारी देवी की कहानी भी महंगाई और मौसम की मार को बयाँ करती है। उनके पास लगभग 6 बीघे खेत हैं, घर में पति के अलावा तीन बेटे और दो बेटियां हैं। पहले वह परिवार के साथ ही मिलकर खेती करते थे, जिससे घर चल जाता था, लेकिन बदलते मौसम और महंगाई के साथ खेती करना मुश्किल होता गया। महीनों मेहनत करने के बाद भी खेती से होने वाली आमदनी कुछ खास नहीं थी, बाद में दो बेटे बाहर (दूसरे शहर) कमाने चले गए जिसमें एक की एक्सीडेंट मे मृत्यु हो गई। 

rajkumari devi, a 55 year old farmer
55 वर्षीय किसान राजकुमारी देवी

राजकुमारी बताती हैं, “अब दोनों बेटा घर ही रहता है, कमाने के लिए बाहर भेजने से डर लगता है।” वह बताती है कि उन्होंने कुछ जमीन को इजारा पर दे दिया जिससे कुछ पैसे मिल गए और उससे बेटों ने पास के ही बाजार में दुकान लगा लिए हैं।” उनका कहना है कि यह खेती से तो बढ़िया है, दुकान से रोज के 500-800 कमा लेते हैं और बाकी बची जमीन में खेती से खाने भर का अनाज हो जाता है। 

जलवायु परिवर्तन ने फसल उगाने के तरीकों के साथ-साथ किसानों के जीवन में भी एक बड़ा बदलाव लाया है। लोग खेती करने से बेहतर दिहाड़ी करना समझने लगे हैं क्योंकि इसकी लागत कहीं ज़्यादा बढ़ गई है। बीते कुछ सालों से गयाजी और दक्षिण बिहार के ज्यादातर इलाक़ों में मोटर पम्प लगाना अनिवार्य हो गया है। चाहे छोटे किसान हों या बड़े, लगातार बदल रहे खेती-गृहस्थी और इसमें लगने वाली लागत से त्रस्त हैं। जब सतही जलस्रोत कमजोर पड़ते हैं तो खेती का बोझ भूजल पर बढ़ जाता है। दक्षिण बिहार के ज्यादातर इलाक़ों में यही हो रहा है। अध्ययनों के अनुसार, पिछले तीन दशकों में मानसून की अनिश्चितता बढ़ने के साथ-साथ किसानों की भूजल पर निर्भरता भी बढ़ी है। गयाजी जैसे इलाकों में भूजल का दोहन बढ़ने से कई जगह जलस्तर गिरने की समस्या सामने आई है। इन परिस्थितियों में बिजली से चलने वाला मोटर किसानों का मुख्य सहारा बन गया है। जिन किसानों के पास मोटर है, वे किसी तरह सिंचाई कर लेते हैं। लेकिन, सीमांत किसानों के लिए यह विकल्प महंगा है। 

पारंपरिक जलस्रोत ही एकमात्र समाधान 

गयाजी प्रशासन और असर फाउंडेशन द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक, अगर दक्षिण बिहार में आहर, पोखर और पइन (छोटी नहरों) जैसे पारंपरिक जलस्रोतों का पुनर्जीवन नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में खेती और मुश्किल हो सकती है। आहर–पाइन प्रणाली बिहार की लगभग 2000 साल पुरानी जल प्रबंधन तकनीक है, जिसमें पइन के जरिए बारिश या बाढ़ का पानी लाकर आहर (मिट्टी के बांध से घिरे जलाशय) में जमा किया जाता है और उसी पानी से रबी व खरीफ दोनों फसलों की सिंचाई की जाती है। इस प्रणाली की महत्ता को समझते हुए बिहार सरकार ने जल-जीवन हरियाली योजना के तहत सभी जिलों में बर्बाद हुए पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का मुहिम शुरू किया हुआ है। 

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सिंचाई मोटर

असर फाउंडेशन के स्टेट क्लाइमेट एक्शन (बिहार-झारखंड) के डायरेक्टर मुन्ना झा बताते हैं, “बिहार के कई इलाके में पहले किसान बारिश और पारंपरिक सिंचाई के साधन पर ही आश्रित रहते थे। लेकिन, पिछले कुछ सालों में ये कई तरीकों से बर्बाद हुआ है, या तो बारिश कम होने के कारण सुख गए या लोगों ने आपसी जमीन के झगड़े में इसे बर्बाद किया। बिहार में ऐसे ही जनसंख्या की तुलना में जमीन कम है, ऐसे में लोग सूखे पड़े आहार-पोखर को कब्जाने में लग जाते हैं जो बिहार की एक बड़ी समस्या है।” 

“ऐसे कई पोखर-तालाब जो सरकार द्वारा बनाये गये थे, उन्हें लोगों ने भर दिया। उसमें कचरे या बाकी चीजें डालने लगे जिससे वे बर्बाद हो गये। ऐसे में लोगों में जागृति और व्यवहरिक बदलाव लाने के क्षेत्र में भी काम किए जाने की जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो संभवत: हम पुराने तरीके के जलाशयों को जीवित कर सकते हैं, जिससे जल स्तर भी बना रहेगा और साथ में किसानों को सिचाई में भी मदद मिलेगी,” उन्होंने कहा।

प्रोफेसर हेमंत सलाह देते है कि आहर, पोखर और पइन जैसे पारंपरिक जलाशय को पुनर्जीवित करने के अलावा, अब कम पानी और कम अवधि वाली फसलों की तरफ रूख करना चाहिए। “फसल विविधीकरण पर जोर नहीं दिया गया तो धान-गेहूं आधारित खेती मॉडल के कारण दक्षिण बिहार में और अस्थिरता हो सकती है। इसमें संभावित विकल्प हैं: खरीफ (मॉनसून) में अरहर (तूर), मूंग, उड़द, बाजरा, मक्का और रबी (सर्दी) में चना, मसूर, सरसों, अलसी। अन्य विकल्प के तौर पर सब्जी और फल आधारित खेती जैसे आंवला, अमरूद, सहजन इत्यादि भी शामिल किया जा सकता है। ये फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन दे सकती हैं।”

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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सौरव दैनिक भास्कर में बतौर पत्रकार कार्यरत हैं। वे सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों, खेती-किसानी, पर्यावरण और हाशिए के समुदायों पर लिखना पसंद करते हैं। उनकी बायलाइन द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, द मोजो स्टोरी, ग्राउंड रिपोर्ट और द मूकनायक जैसे मीडिया संस्थानों में प्रकाशित हो चुकी है। सौरव ने हैदराबाद विश्वविद्यालय से मीडिया स्टडीज़ में पढ़ाई की है।

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