मनरेगा यानी ग्रामीण भारत में रहने वाले गरीब लोगों को न्यूनतम आय का इंश्योरेंस। इन क़ानून ने पिछले दो दशकों से मनरेगा जॉब कार्ड धारकों को साल में 100 दिन काम पाने का अधिकार दे रखा था। अब इसे रिप्लेस कर इसकी जगह विकसित भारत- जी राम जी क़ानून लाया गया है। लेकिन, इस क़ानून के लागू होने से पहले ही ज़मीन पर इसका असर दिखने लगा है। मजदूर काम के लिए दफ़्तरों का चक्कर लगाते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं।
ग्रामीण इलाक़ों के गरीब व अकुशल मज़दूरों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने साल 2005 में मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट लाया था। इसे 2 फ़रवरी 2006 को लागू किया गया। यह एक अधिकार आधारित क़ानून है और भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद इस क़ानून ने दो दशकों तक ग्रामीण भारत के ग़रीबों को आजीविका मुहैया कराई।
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प्रेस सूचना ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि इस क़ानून से आने से लेकर अब तक 1200 करोड़ व्यक्ति दिवस कार्य उपलब्ध कराये गये। फ़िलहाल 29.68 करोड़ लोगों का मनरेगा में पंजीयन हो चुका है और 15.38 करोड़ सक्रिय जॉब कार्ड हैं।
लेकिन, पिछले साल दिसम्बर में केंद्र सरकार ने मनरेगा क़ानून को रिप्लेस करते हुए इसकी जगह विकसित भारत- जी राम जी विधेयक, 2025 लाया।
इस नये एक्ट के प्रावधानों ने ग्रामीण भारत के ग़रीबों में डर और अनिश्चितता भर दी है। अव्वल तो मनरेगा मज़दूरों का कहना है कि इस नये एक्ट के आने के बाद से उन्हें काम मिलना बंद हो गया और दूसरा उन्हें चिंता है कि नया क़ानून उनके काम करने के अधिकार से वंचित कर सकता है।
MNREGA अधिकार आधारित रोज़गार गारंटी क़ानून है जिसमें सरकार का फ़ोकस रोज़गार मुहैया कराने पर होता है वहीं, VB-G RAM G का उद्देश्य ग्रामीण विकास या बुनियादी ढाँचा विकसित करने पर है। मनरेगा 100 दिनों की रोज़गार गारंटी देता है, VB-G RAM G में कार्य अवधि को 100 से बढ़ाकर 125 दिन किया गया है। मनरेगा स्पष्ट तौर पर कहता है कि मनरेगा मज़दूर अगर काम माँगते हैं, तो उन्हें शर्तिया काम दिया जाएगा, लेकिन नया क़ानून कहता है कि काम फंड की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। मनरेगा क़ानून में आर्थिक बोझ केंद्र सरकार पर था, लेकिन नये क़ानून में कुल खर्च का 60 फ़ीसद हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगा और 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार को देना होगा। मनरेगा क़ानून कहता है कि जॉब कार्ड धारियों को किसी भी वक़्त काम दिया जाएगा। वहीं, नया क़ानून कहता है कि खेती के पीक सीज़न में 60 दिनों तक मज़दूरों को काम नहीं दिया जाएगा।
संजय साहनी ख़ुद मनरेगा वर्कर रहे हैं और पिछले डेढ़ दशकों से मुज़फ़्फ़रपुर व आसपास के इलाक़ों में मनरेगा वर्करों के लिए काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि नया मनरेगा क़ानून, मनरेगा वर्करों के लिए ख़तरनाक है। नये क़ानून के प्रावधान मनरेगा वर्करों के हित में नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर मनरेगा क़ानून में कोई गड़बड़ी थी, तो इसमें संशोधन किया जाना चाहिए था न कि रिप्लेस।
पुराने क़ानून को लागू करने और मनरेगा मज़दूरों को काम देने की माँग पर मुज़फ़्फ़रपुर के मनरेगा मज़दूर पिछले 100 दिनों से डीएम कार्यालय के सामने धरना दे रहे हैं। धरनास्थल के बग़ल में आधा दर्जन मिट्टी के चूल्हे हैं, जिन पर धरना में आने वाले वर्करों के लिए खाना पकता है। धरना मनरेगा वर्करों के सहयोग से चल रहा है। खाना पकाने के लिए अनाज मनरेगा वर्कर स्वेच्छा से देते हैं।
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