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मोतिहारी के महात्मा गांंधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में नहीं शुरू हो पाया उर्दू विभाग, “उर्दू को मज़हबी चश्मे से ना देखे सरकार”

जनता दल यूनाइटेड के एमएलसी ख़ालिद अनवर ने ‘मैं मीडिया’ को बताया कि राज्य सरकार भी चाहती है कि मोतिहारी की महात्मा गांधी सेनट्रल यूनिवर्सिटी में उर्दू डिपार्टमेंट की स्थापना हो। उन्होंने कहा चूंकि यह एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी है और इसमें राज्य सरकार की बहुत अधिक भूमिका नहीं होती है, इसलिये, केन्द्र सरकार और यूनिवर्सिटी प्रशासन को इस पर ग़ौर करना चाहिये।

Nawazish Purnea Reported By Nawazish Alam |
Published On :
urdu department could not be started at mahatma gandhi central university in motihari

बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी की स्थापना के आठ साल गुज़र चुके हैं, लेकिन, अबतक उर्दू विभाग की स्थापना नहीं हो पायी है, जबकि, उर्दू बिहार की दूसरी आधिकारिक भाषा है। जानकार बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में संस्कृत और उर्दू विभाग की स्थापना के लिये इलाक़े के लोगों ने एक साथ आवाज़ उठायी थी, लेकिन, 2020 में यूनिवर्सिटी ने संस्कृत विभाग तो शुरू कर दिया, पर, उर्दू विभाग अब तक शुरू नहीं हो सका है।


मोतिहारी की महात्मा गांधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी की स्थापना 2016 में हुई थी। वर्तमान में विश्वविद्यायल के 7 संकायों (फैकल्टीज़) के 20 विभागों में पढ़ाई चल रही है। मानिविकी और भाषा संकाय में तीन भाषाओं की पढ़ाई होती है, जिसमें हिंदी, अंग्रेज़ी और संस्कृत शामिल हैं। लेकिन, बिहार की दूसरी आधिकारिक भाषा होने के बावजूद यूनिवर्सिटी में अब तक उर्दू विभाग की स्थापना नहीं हो पायी है, जिस वजह से राज्य में उर्दू बोलने वालों में ख़ासी नाराज़गी है।

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राजद एमएलसी क़ारी शोएब ने यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग ना होने पर नाराज़गी जताते हुए इसे उर्दू का साथ नाइंसाफ़ी क़रार दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाक़ात की और ज्ञापन सौंपकर यूनिवर्सिटी में जल्द से जल्द उर्दू विभाग क़ायम करने का अनुरोध किया।


एक्स पर उन्होंने लिखा, “विश्वविद्यालय स्थापना के समय उर्दू व संस्कृत विषय को छोड़कर सभी विभाग की स्थापना कर पढ़ाई शुरू की गई थी। उर्दू और संस्कृत विभाग को विश्वविद्यालय में स्थापित करने की मांग चारों तरफ से उठने लगी, तो कुछ साल बाद 2020 में संस्कृत विषय को यूनिवर्सिटी में शामिल कर लिया गया, लेकिन, राज्य की दूसरी सरकारी भाषा उर्दू को अभी तक विश्वविद्यालय में शामिल नहीं किया गया है।”

उन्होंने आगे लिखा, “उर्दू के साथ इतने बड़े पैमाने पर हो रही नाइंसाफ़ी को लेकर आज बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को ज्ञापन सौंपा और महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में जल्द से जल्द उर्दू विभाग क़ायम करने को लेकर मुलाक़ात की। उसी वक्त सीएम नीतीश कुमार जी ने शिक्षा विभाग के एसीएस एस सिद्धार्थ को बुला कर फ़ौरन आदेश दिया। उम्मीद है बिहार की दूसरी सरकारी भाषा उर्दू को जल्द इंसाफ़ मिलेगा।”

बिहार की दूसरी आधिकारिक भाषा है उर्दू

बिहार में हिन्दी के बाद उर्दू दूसरी आधिकारिक भाषा है और यहां पर उर्दू बोलने वालों की बड़ी आबादी है। जानकारों की मानें तो ग़ैर-मुस्लिमों की भी एक बड़ी आबादी है जो राज्य में उर्दू बोलती है और उर्दू भाषा में दिलचस्पी रखती है।

बिहार में उर्दू भाषा के लिये संघर्ष करने वाली संस्था ‘बिहार स्टेट उर्दू टीचर्स एसोसिएशन’ के जनरल सेक्रेटरी मो. शफ़ीक़ ने ‘मैं मीडिया’ को बताया कि उर्दू बिहार की दूसरी आधिकारिक भाषा है, उसके बावजूद एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग का ना होना तकलीफ़ की बात है।

“मोतिहारी में उर्दू पढ़ने वालों की अच्छी ख़ासी आबादी है। ग़ैर-मुस्लिम भी वहां के उर्दू पढ़ते हैं और उससे दिलचस्पी रखते हैं। यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग क़ायम होना ही चाहिये, ताकि लोगों को मौक़ा मिले। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में अगर उर्दू की सहूलियत नहीं दी जायेगी तो बच्चे तो जूनियर क्लॉस में ही उर्दू छोड़ देंगे,” उन्होंने कहा।

उन्होंने आगे कहा, “सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी में उर्दू पढ़ कर बच्चे आगे जायेंगे और अगर उनको मौक़ा ही नहीं मिलेगा तो वे वहीं पर उर्दू छोड़ देंगे। इसलिये ज़रूरी है कि आगे उनको उर्दू में मौक़ा दिया जाये। ऐसा ना हो कि उनको उर्दू पढ़ने के लिये बिहार से बाहर जाना पड़े। मोतिहारी के लोगों को मोतिहारी में ही उर्दू पढ़ने का मौक़ा मिल जाये, यही हमारी मांग है।”

महात्मा गांंधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ने दिया था उर्दू विभाग खोलने का भरोसा

‘ऑल बिहार उर्दू टीचर्स एसोसिएशन’ बिहार के उर्दू शिक्षकों का एक संगठन है, जिसने महात्मा गांधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग की स्थापना के लिये पहले भी आवाज़ उठायी है।

संगठन के सचिव मो. अमानुल्लाह ने ‘मैं मीडिया’ को बताया कि इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिये पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण के लोगों ने मिलकर संघर्ष किया था, मोतिहारी में उर्दू बोलने वालों की तादाद अच्छी ख़ासी है, उसके बावजूद महात्मा गांधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग का ना होना दुख की बात है।

“पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, मधुबनी, शिवहर, सीतामढ़ी और मुज़फ़्फ़रपुर में उर्दू बोलने वालों की अच्छी ख़ासी आबादी है। ऐसे क्षेत्र में एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी हो और उसमें उर्दू डिपार्टमेंट ना हो, इससे परेशानी होती है। स्टेट यूनिवर्सिटीज़ में तो है उर्दू डिपार्टमेंट, लेकिन, शिक्षा की जो क्वालिटी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में होती है, वो क्वालिटी स्टेट यूनिवर्सिटी में नहीं है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने आगे कहा, “शुरू में जब हमलोग उर्दू विभाग के लिये आवाज़ उठाये तो बताया गया कि चूंकि यूनिवर्सिटी नई है, इसलिये रिसोर्सेज़ की कमी है। उस वक़्त संस्कृत डिपार्टमेंट भी नहीं था। उस वक़्त के वाइस चांसलर साहब ने कहा था कि जब संस्कृत डिपार्टमेंट शुरू होगा तो उस वक़्त उर्दू डिपार्टमेंट भी चालू कर दिया जायेगा। तीन चार साल पहले संस्कृत डिपार्टमेंट शुरू हो चुका है, लेकिन, अब तक उर्दू विभाग शुरू नहीं हो सका है।”

मो. अमानुल्लाह ने आगे बताया कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कहा था कि जैसे-जैसे बिल्डिंग निर्माण की जगह मिलती जायेगी तो वे नये डिपार्टमेंट शुरू कर देंगे, लेकिन, अभी यूनिवर्सिटी के पास बहुत जगह है, उसके बावजूद उर्दू विभाग खोलने को लेकर यूनिवर्सिटी गंभीर नहीं दिख रही है।

“उर्दू को सिर्फ़ मुसलमानों से ना जोड़ा जाये”

मो. शफ़ीक़ ने बताया कि भारत में अक्सर उर्दू को सिर्फ़ मुस्लिमों के साथ जोड़ दिया जाता है, जो कि सही नहीं है। वह बताते हैं कि अभी भी ग़ैर-मुस्लिमों की अच्छी ख़ासी आबादी उर्दू पढ़ती है और उर्दू से दिलचस्पी रखती है।

“उर्दू को सिर्फ मुसलमानों से नहीं जोड़ा जाये। मेरी पोस्टिंग मोतिहारी में ही है, मैं ख़ुद देखता हूं कि यहां ग़ैर-मुस्लिम भी उर्दू पढ़ते हैं। मैं देखता हूं ग़ैर-मुस्लिमों में बड़ी दिलचस्पी है उर्दू को लेकर। अक्सर बच्चे बोलते हैं कि उन्हें भी उर्दू में नाम लिखाना है। यह कहना कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है, मेरे ख़्याल से सही नहीं है,” उन्होंने कहा।

‘उर्दू विभाग का ना होना उर्दू के साथ नाइंसाफी है’

‘बिहार स्टेट उर्दू टीचर्स एसोसिएशन’ के जनरल सेक्रेटरी मो. शफ़ीक़ कहते हैं कि उर्दू को बिहार में दूसरी सरकारी भाषा की हैसियत हासिल है, इसलिये एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग का ना होना उर्दू के साथ कहीं ना कहीं नाइंसाफ़ी है। उन्होंने केन्द्र सरकार और यूनिवर्सिटी प्रशासन से जल्द से जल्द मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी सेनट्रल यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग खोलने की अपील की।

“अभी सहायक उर्दू अनुवादक की बहाली आयी थी कुछ साल पहले। उसकी नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है। उसमें बड़ी संख्या में ग़ैर-मुस्लिम छात्र भी हैं। मोतिहारी के कई लोग भी उसमें शामिल हैं। मोतिहारी में कई उर्दू टीचर भी ग़ैर-मुस्लिम हैं। उर्दू को सिर्फ हम मज़हबी चश्मे से ना देखें,” उन्होंने कहा।

उन्होंने आगे कहा, “बिहार में उर्दू को दूसरी सरकारी ज़बान की हैसियत हासिल है। इसलिये उर्दू को तो नज़रअंदाज़ करना ही नहीं चाहिये। वरना यह बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी उर्दू वालों के साथ होगी। इसलिये यूनिवर्सिटी में उर्दू डिपार्टमेंट का क़याम होना चाहिये। इसके लिये हमलोग भी अपने तरीक़े से सीएम, राज्यपाल, शिक्षा मंत्री के साथ-साथ दूसरे ज़िम्मेदारान से मुलाक़ात करेंगे और अपना मेमोरेंडम देंगे।”

मांग को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं: ख़ालिद अनवर

इस संबंध में जनता दल यूनाइटेड के एमएलसी ख़ालिद अनवर ने ‘मैं मीडिया’ को बताया कि राज्य सरकार भी चाहती है कि मोतिहारी की महात्मा गांधी सेनट्रल यूनिवर्सिटी में उर्दू डिपार्टमेंट की स्थापना हो। उन्होंने कहा चूंकि यह एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी है और इसमें राज्य सरकार की बहुत अधिक भूमिका नहीं होती है, इसलिये, केन्द्र सरकार और यूनिवर्सिटी प्रशासन को इस पर ग़ौर करना चाहिये।

उन्होंने आगे कहा कि इस इलाक़े में उर्दू बोलने वालों की बड़ी आबादी रहती है, इसलिये इस मांग को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं है। यह पूछने पर कि क्या बिहार सरकार, केन्द्र सरकार के समक्ष इस मुद्दे को उठायेगी?

इसके जवाब में ख़ालिद अनवर कहते हैं, “सीएम नीतीश कुमार जी उस यूनिवर्सिटी को खुलवाने के लिये तो गये ही थे। सीएम अपने स्तर से इस मुद्दे को उठायेंगे, यह तो मैं नहीं कह सकता। लेकिन, सीएम को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने दुख का इज़हार करते हुए कहा कि क्यों नहीं है उर्दू विभाग? होना चाहिये।”

यूनिवर्सिटी एक्सपैंड होने पर नया कोर्स शुरू होगा: पीआरओ

महात्मा गांधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी की जनसंपर्क पदाधिकारी (पीआरओ) शेफालिका मिश्रा ने ‘मैं मीडिया’ को बताया कि अभी तक यूनिवर्सिटी अपनी ज़मीन पर नहीं आई है, जैसे-जैसे यूनिवर्सिटी एक्सपैंड होगा, उसमें नये कोर्सेज़ की पढ़ाई शुरू की जायेगी।

“अभी तो यूनिवर्सिटी फ़िलहाल अपनी ज़मीन पर आई भी नहीं है। जितने डिपार्टमेंट चल रहे हैं, वे अलग अलग किराये के मकानों में चला रहे हैं…अभी यूनिवर्सिटी का डीपीआर बन रहा है। जैसे-जैसे यूनिवर्सिटी बनेगी वैसे-वैसे बढ़ेगी भी। अभी सिर्फ 20 डिपार्टमेंट ही चल रहा है। हमारा मुख्य डिपार्टमेंट जैसे कि लॉ वग़ैरह तो अभी शुरू भी नहीं हुआ है। जैसे-जैसे यूनिवर्सिटी एक्सपैंड होगा, वैसे-वैसे नये कोर्सेज़ भी एड होंगे,” उन्होंने कहा।

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नवाजिश आलम को बिहार की राजनीति, शिक्षा जगत और इतिहास से संबधित खबरों में गहरी रूचि है। वह बिहार के रहने वाले हैं। उन्होंने नई दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मास कम्यूनिकेशन तथा रिसर्च सेंटर से मास्टर्स इन कंवर्ज़ेन्ट जर्नलिज़्म और जामिया मिल्लिया से ही बैचलर इन मास मीडिया की पढ़ाई की है।

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