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‘मोबाइल एडिक्शन’ की चपेट में युवा पीढ़ी, बच्चों में हालात और भी चिंताजनक

मोबाइल और इंटरनेट अब हमारी ज़िंदगी का जरूरी हिस्सा बन गए हैं। ज़्यादातर घरों में एक से ज़्यादा मोबाइल फोन होते हैं, इसलिए छोटे बच्चों तक मोबाइल और इंटरनेट आसानी से पहुंच जाते हैं।

syed jaffer imam Reported By Syed Jaffer Imam |
Published On :
the young generation is in the grip of 'mobile addiction', the situation is even more worrying among children

रोज़मर्रा के जीवन में मोबाइल फ़ोन की बढ़ती भूमिका ने इंसानों के जीने का तरीका बदल दिया है। जीवन को आसान बनाने के लिए आविष्कार किया गया ये आधुनिक डिवाइस धीरे धीरे मानसिक परेशानियों का भी कारण बनने लगा है।


बिहार के किशनगंज नगरीय क्षेत्र स्थित चूड़ीपट्टी निवासी ग़ुलाम अब्बास फेरी कर चश्मे बेचता है। वह पिछले 6 महीने से मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। वजह ये है कि उसे मोबाइल और इंटरनेट की ऐसी लत लगी कि कई दिनों तक वह काम पर नहीं गया। देर रात जाग कर रील देखना और दोपहर को सोकर उठना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था।

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सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग करने से सेहत पर भी असर पड़ने लगा। इन चीज़ों से परेशान होकर 21 वर्षीय गुलाम अब्बास ने अपना मोबाइल फ़ोन बेच दिया। वह कहता है, “रात में जल्दी नींद नहीं आती थी, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर रील देखते रहते थे और फिर दोपहर तक सोते थे। अपने मोबाइल बेचकर व्यापार करने के लिए चश्मा ले लिए। तब से हम रात 10 बजे सोते हैं और 6 बजे उठ जाते हैं।”


ग़ुलाम का कहना है कि मोबाइल का उपयोग न करने से उसके जीवन में अनुशासन आया है और अब वह सोशल मीडिया के तनाव से भी दूर रहता है। “आप नया मोबाइल भी दीजिएगा तो हम नहीं लेंगे। नहीं तो फिर से वही ज़िन्दगी हो जाएगी, रात रात भर मोबाइल चलाना और काम नहीं करना। मेरी दोस्ती यारी में हम अकेले हैं जिसके पास फ़ोन नहीं है।”

सोशल मीडिया से मानसिक तनाव

किशनगंज की गाछपाड़ा पंचायत निवासी 30 वर्षीय कमरुल होदा पिछले 12 वर्ष से गाड़ी चला रहे हैं। कमरुल ने चार साल पहले इंटरनेट से पूरी तरह से दूरी बना ली और आज एक पुराने कीपैड मोबाइल फ़ोन से लोगों से संपर्क साधते हैं।

एंड्रॉयड मोबाइल छोड़ने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल करने से उनके काम पर काफी असर पड़ रहा था। देर रात तक मोबाइल में वीडियो देखने और सोशल मीडिया पर रहने से आँखों में पानी आता था जिससे उन्हें गाड़ी चलाने में दिक़्क़त आने लगी। नींद पूरी न होने से सेहत खराब रहने लगी जिसके बाद उन्होंने इंटरनेट और एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोन से दूरी बना ली।

“मोबाइल रहने से नुकसान काफी था। सेहत खराब, नींद की कमी, सर में दर्द रहना और आंख से पानी आता था। गाड़ी चलाने में भी परेशानी हो रही थी। मोबाइल छोड़ने के छह महीने के अंदर यह सब परेशानी खत्म हो गई। पहले तीन महीने तक बहुत दिक्कत हुई, अजीब-सा महसूस होता था। फिर धीरे धीरे ठीक हो गया,” कमरूल होदा बोले।

सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग करने से उनकी मानसिक शांति पर असर हो रहा था। राजनीति से जुड़ी सामग्री देखने से वह अंदर से काफी प्रभावित हो रहे थे।

“सोशल मीडिया चलाने से एक दिक्कत ये थी कि कोई संवेदनशील वीडियो जैसे दंगे वगैरह के वीडियो देखने के बाद नींद नहीं आती थी,” कमरूल ने कहा। “मारने पीटने की वीडियो देखने से इमोशनल तौर पर असर हो रहा था और वही चीज़ दिनभर दिमाग़ में घूमती रहती थी। दिमाग़ में टेंशन रहेगा तो आपको नींद नहीं आएगी। समाज में हो रही बुराई हम सुधार नहीं सकते थे बस देख कर परेशान होते थे।”

आगे उन्होंने कहा, “15-20 साल पहले सोशल मीडिया आया है, जब यह नहीं था तो आदमी कैसे गुज़ारा करता था? मोबाइल खतरनाक चीज़ है। यह आपके साथ सीधे संपर्क में है, यह आप से सटा हुआ है। हम 2016 में एंड्रॉयड लिए थे और 2021 में छोड़ दिए। जब तक इस्तेमाल किए कोई फायदा नहीं देखे, नुकसान ही देखे।”

डिजिटल हो चली जीवनशैली में मोबाइल न होने के कुछ परेशानियां भी होती हैं। गाड़ी चालक कमरूल होदा को सबसे अधिक दिक्कत तब होती है जब लोग ऑनलाइन पेमेंट के लिए उनका यूपीआई नंबर मांगते हैं। कमरूल कहते हैं, “इस डिजिटल जमाने में मोबाइल की ज़रूरत पड़ती है लेकिन हमको मोबाइल लेना नहीं है। किसी तरह कॉलिंग से काम चला रहे हैं।”

छोटे बच्चों में मोबाइल की लत

मोबाइल और इंटरनेट अब हमारी ज़िंदगी का जरूरी हिस्सा बन गए हैं। ज़्यादातर घरों में एक से ज़्यादा मोबाइल फोन होते हैं, इसलिए छोटे बच्चों तक मोबाइल और इंटरनेट आसानी से पहुंच जाते हैं।

पेशे से रत्न व्यापारी, किशनगंज निवासी हबीब अली के तीन बच्चे महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़ा बेटा 12 वर्ष का है जो पांचवीं कक्षा में पढता है। दूसरा बेटा 10 वर्ष का है और तीसरी कक्षा में पढ़ता है। सबसे छोटे बेटे की आयु 8 वर्ष है और वह पहली कक्षा का छात्र है।

तीनों बच्चों में मोबाइल का इस्तेमाल इतना बढ़ गया कि हबीब ने बच्चों का अतिरिक्त ट्यूशन लगा दिया। ऐसा करने से बच्चों को मोबाइल का प्रयोग करने का समय थोड़ा कम मिलता है। हालांकि इस फैसले से हबीब की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। वह अपने तीनों बेटों को स्कूल के अलावा दो ट्यूशन भेजते हैं।

वह कहते हैं, “बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मैंने दो ट्यूशन लगा रखा है ताकि उनका ध्यान पढ़ाई में ज्यादा और मोबाइल पर कम रहे। आर्थिक तौर पर थोड़ी समस्या तो होती है लेकिन इससे मोबाइल से कुछ देर के लिए बच्चे दूर रहते हैं।”

पढ़ाई पर मोबाइल का प्रभाव

हबीब ने आगे कहा कि मोबाइल की आदत लगने से बच्चों की पढ़ाई पर काफी असर पड़ता है लेकिन बिना मोबाइल के बच्चों को शांत रख पाना लगभग नामुमकिन है।

उन्होंने कहा, “बार बार बोलने से भी बच्चा नहीं सुनता है। जैसे ड्रग एडिक्शन होता है, एक तरह से मोबाइल भी एक एडिक्शन है। बिना मोबाइल के बच्चा कोई काम नहीं करता है। सबसे अधिक समस्या पढ़ाई के मामले में हो रही है। होमवर्क और परीक्षा की तैयारी बच्चे ठीक से नहीं करते हैं। बच्चों पर आप कितनी सख्ती कर सकते हैं? एक लिमिट है, उसको क्रॉस करेंगे तो बच्चा दिमागी तौर पर और परेशान हो जाएगा। पहले से ही पढ़ाई का दबाव है।”

मोबाइल फ़ोन के बढ़ते उपयोग से बच्चों के व्यवहार में चिड़चिड़ापन की बात पर हबीब कहते हैं, “सबसे ज़्यादा मेरा आठ साल का बेटा परेशान करता है। अगर उसको मोबाइल नहीं दिया जाए तो वह ऐसा व्यवहार करता है जैसे एक मेन्टल इंसान करता है। चीज़ों को तोड़ना या उनपर लात मारना। यह हमलोग की भी गलती है कि हम फ्री होने के लिए बच्चे को मोबाइल दे देते हैं। हमलोग खुद समय नहीं दे पा रहे हैं। किसी काम में व्यस्त रहते हैं तो मोबाइल बच्चे को थमा देते हैं और धीरे धीरे उसकी लत लग जाती है।”

बच्चों में बढ़ता मोबाइल एडिक्शन

मनोचिकित्सक डॉक्टर कृष्ण मोहन सिंह के पास 10 वर्ष का अनुभव है और वह पिछले चार साल से किशनगंज और आसपास के मरीज़ों को देख रहे हैं। हमसे बातचीत में उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में काफी बच्चों में मोबाइल एडिक्शन देखने को मिल रहा है। उनके पास बच्चों के मुकाबले वयस्कों के केस कम आते हैं। 5-6 साल के बच्चों में मोबाइल फ़ोन की लत काफ़ी देखी जा रही है, इसके अलावा 12 से 16 साल के बच्चों में भी ऐसे मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

“बच्चों में मोबाइल फोन की लत का बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। बचपन में बच्चों का मानसिक और व्यक्तित्व विकास होता है और इसी समय तय होता है आप कैसे इंसान बनोगे। मोबाइल में तरह तरह गेम होते हैं जिससे तुरंत रिवॉर्ड मिलता है जिससे दिमाग को तुरंत ख़ुशी मिलती है,” डॉक्टर कृष्ण बोले।

उन्होंने आगे कहा, “जिस उम्र में बच्चों से किताब पढ़ने की अपेक्षा होती है वे मोबाइल में बिता रहे हैं। बच्चों का सामाजिक दायरा भी काफी छोटा हो गया है। फ़ोन की लत लग जाए तो बच्चे का लोगों से मिलना जुलना कम होता है। जब इस तरह का बच्चा बड़ा होगा तो न उसके दोस्त होंगे, न सोशल सर्किल होगा। वह बहुत अच्छा इंसान बन कर निकलेगा, इसकी संभावनाएं बहुत कम हैं।”

मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव

किसी भी तरह की लत लगने से दिमाग बार बार रिवार्ड यानी किसी कार्य का सुखद नतीजा ढूंढ़ता है। डॉक्टर कृष्ण मोहन ने बताया कि मस्तिष्क में डोपामिन नामक एक न्यूरोट्रांसमीटर होता है जो हमें खुशी, प्रेरणा और संतोष का अहसास कराता है। किसी भी प्रकार की लत में यही रासायनिक पदार्थ रिलीज़ होता है जिससे व्यक्ति को तुरंत अच्छा महसूस होने लगता है। बार बार इसी आंनद का एहसास करने के लिए व्यक्ति लत का शिकार हो जाता है।

बच्चों को अक्सर पता नहीं होता कि कितनी मात्रा में डोपामिन उनके लिए ठीक है और कितना नुकसानदायक हो सकता है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका बहुत अहम हो जाती है। इससे एक और समस्या होती है कि बच्चों के व्यवहार में भी बदलाव देखे जाते हैं।

“मोबाइल एडिक्शन से बच्चों में चिड़चिड़ापन हो जाता है। मोबाइल मिला तो ठीक, लेकिन माता-पिता के मना करने पर बच्चे आक्रामक हो जाते हैं। तब बच्चों को लगता है कि इसके सिवा कुछ और करने के लिए नहीं है। फिर बच्चे में डिप्रेशन और व्यावहारिक समस्या भी शुरू हो जाती है। बच्चों को वर्चुअल दुनिया ही असली दुनिया लगने लगती है,” डॉक्टर कृष्ण बोले।

क्या करें माता पिता?

डॉक्टर कृष्ण मोहन मानते हैं कि बच्चों में मोबाइल का उपयोग कम करने के लिए माता पिता को उनके साथ अधिक समय बिताना चाहिए। उन्हें शारीरिक गतिविधियां करने के लिए प्रेरित कर मैदान तक लाना चाहिए। अधिकतर मरीज़ के माता पिता यह शिकायत लेकर आते हैं कि उनका बच्चा बिना मोबाइल के खाना नहीं खाता और मोबाइल न मिलने पर शोर मचाता है, घर के सामान तोड़फोड़ करता है और कभी कभी अपने घर वालों पर हाथ भी उठा देता है।

“कुदरत ने हमें इस तरह नहीं बनाया है कि बच्चा बैठकर मोबाइल पर दस साल बिताए। हमें बनाया है कि हम बाकी इंसानों के साथ मिलें, घूमें फिरें, मेहनत करें। अगर हम इस तरह दिमाग़ का काम नहीं लेंगे तो मानसिक विकास पर असर पड़ेगा। इसका शारीरिक रूप से भी नुकमान हो सकता है। खेलकूद न करने से शरीर कमज़ोर रहता है। गतिहीन जीवनशैली के कारण कई बार ऐसा होता है कि जो बीमारी 40 में आने थी वो 20 साल में ही आ जाती है,” मनोचिकित्सक डॉ कृष्ण ने कहा।

तीन बेटों के पिता हबीब अली हर दिन अपने बच्चों को कोई न कोई नया काम करने को कहते हैं। जब बच्चे वह काम पूरा कर लेते हैं, तब उन्हें आधे घंटे के लिए मोबाइल इस्तेमाल करने को मिलता है। बच्चों से कभी वह चित्र बनवाते हैं, तो कभी घर का कोई हिस्सा अच्छे से सजाने का टास्क देते हैं। इससे बच्चे मन लगाकर दूसरा काम करते हैं और उस दौरान मोबाइल से भी दूर रहते हैं।

हबीब कहते हैं, “मेरा बड़ा बेटा पांचवीं में पढता है। वह कभी कभी झूठ बोलकर मोबाइल लेता है कि इंटरनेट पर किसी सवाल का जवाब चाहिए। बाद में देखता हूँ कि वह या तो वीडियो देखता है या गेम खेल रहा होता है। मोबाइल पर पढ़ाई करना भी एक अच्छा बहाना बन गया है, इसलिए मैं रोज़ उन्हें कोई एक्टिविटी करने को कहता हूँ, जब तक वह काम ख़त्म नहीं करते मोबाइल नहीं मिलता है। ऐसा करने से बच्चे काम जल्दी खत्म कर लेते हैं।”

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सैयद जाफ़र इमाम किशनगंज से तालुक़ रखते हैं। इन्होंने हिमालयन यूनिवर्सिटी से जन संचार एवं पत्रकारिता में ग्रैजूएशन करने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी पत्रकारिता (पीजी) की पढ़ाई की। 'मैं मीडिया' के लिए सीमांचल के खेल-कूद और ऐतिहासिक इतिवृत्त पर खबरें लिख रहे हैं। इससे पहले इन्होंने Opoyi, Scribblers India, Swantree Foundation, Public Vichar जैसे संस्थानों में काम किया है। इनकी पुस्तक "A Panic Attack on The Subway" जुलाई 2021 में प्रकाशित हुई थी। यह जाफ़र के तखल्लूस के साथ 'हिंदुस्तानी' भाषा में ग़ज़ल कहते हैं और समय मिलने पर इंटरनेट पर शॉर्ट फिल्में बनाना पसंद करते हैं।

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