बिहार: अप्रैल 2006, बारिश की रात मुजफ्फरपुर के जुब्बा साहनी पार्क में सैकड़ों लोग एक मशहूर शायर को सुनने जमा हुए। बारिश में भीगता मजमा सर पर गिर रहे पानी की बूंदों से बेपरवाह दाद पर दाद दे रहा था। शायर ने एक शेर पढ़ा,
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
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न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
शेर सुनकर मजमे में कुछ लोगों ने कहा कि हम तो ये शेर सुनते आ रहे थे पर आज पता चला कि ये शेर बशीर साहब का है। जी हाँ, वह शायर थे डॉक्टर बशीर बद्र जिन्हें उनके दौर का सबसे ज्यादा कोट करने वाला शायर कहा जाता है। 28 मई 2026 को बशीर बद्र ने भोपाल स्थित अपने आवास पर आखिरी सांस लीं। ईद-अल-अज़हा के दिन उन्होंने 91 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कहा।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्में सैयद मोहम्मद बशीर, जो बाद में बशीर बद्र के नाम से पहचाने गए, जवानी के दिनों में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बस गए। उन्होंने वहां लंबे समय तक बड़े-बड़े साहित्यिक पदों पर काम किया। बशीर बद्र उर्दू ग़ज़ल की दुनिया के सबसे कामियाब शायरों में से एक थे। उन्होंने बिहार में भी कई मुशायरे पढ़े और उनमें चाँद की तरह चमकते रहे। शायरी की दुनिया में बेमिसाल सफलताओं के लिए बिहार उर्दू अकादमी ने उन्हें सम्मानित भी किया।
बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में एमए और पीएचडी की। वह मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी और मेरठ यूनिवर्सिटी की रिसर्च डिग्री कमेटी के सदस्य रहे और इसके अलावा उन्होंने उर्दू बोर्ड दिल्ली, साहित्य अकादमी दिल्ली और उर्दू अकादमी लखनऊ के सदस्य के तौर पर भी काम किया।
मुज़फ़्फ़रपुर मुशायरे की वो यादगार रात
“वह एक ऐसा बड़ा शायर था जो लोगों के मन की बात करता था तो वो मरहम की तरह काम करता था,” बिहार के मुजफ्फरपुर जिला निवासी, लेखक और कवि डॉक्टर संजय पंकज ने ‘मैं मीडिया’ से बातचीत में कहा। ऊपर जिस मुशायरे का ज़िक्र है उसका संचालन डॉक्टर संजय पंकज कर रहे थे। वह उस कार्यक्रम के बारे में कहते हैं,” लोग भीगते हुए शेर-ओ-शायरी का आनंद ले रहे थे। वह एक अद्भुत रात थी।”
डॉ संजय आगे बोले, “यहां जुब्बा साहनी पार्क है, वहां एक डेढ़ घंटे की सूचना पर काफी भीड़ जमा हो गई। जिसको जैसे जगह मिली, वो वहीं से शेर सुन रहा था। उन्होंने उस दिन इतनी ग़ज़लें सुनाईं कि कुछ ग़ज़लें रिपीट भी हुईं लेकिन किसी को एहसास नहीं हुआ और लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। उनकी शायरी का ऐसा अंदाज़ था कि मजमे में पिन ड्रॉप साइलेंस था। लोगों ने खूब फरमाईशें की और वे बारी-बारी से सबके पसंदीदा शेर सुनाते रहे। एक शायर के इतने सारे शेर आम आदमी को याद रहना बहुत बड़ी बात थी।”
कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा
बशीर बद्र ने अपने जीवन में भारत के लगभग हर राज्य में मुशायरे पढ़े, कई बार विदेश जाने का भी अवसर हुआ। वह बिहार में भी दर्जनों बार मुशायरे पढ़ने आये। बिहार के मशहूर शायर और साहित्यकार डॉक्टर शकील मोईन उन चंद लोगों में से हैं जिन्होंने बशीर बद्र के साथ लंबा अरसा गुज़ारा है। चम्पारण या आसपास के ज़िलों में जब भी किसी मुशायरे में बशीर बद्र आते तो वह मुशायरे के बाद डॉ शकील मोईन के घर पर रुकते थे।
शकील मोईन ने मुज़फ़्फ़रपुर में हुए उस यादगार मुशायरे के बारे में बताया कि अप्रैल 2006 में मुज़फ़्फ़रपुर के तत्कालीन डीआईजी गुप्तेश्वर पांडेय ने डॉक्टर बशीर बद्र को मुज़फ़्फ़रपुर बुलवाया। वह कार्यक्रम ख़ास कर बशीर बद्र के लिए रखा गया था। शकील मोईन और बशीर बद्र मोतिहारी से मुज़फ़्फ़रपुर ट्रेन पर आये। उनके ट्रेन से उतरते ही बैंड बाजा के साथ कई लोग स्टेशन पर पहुंच गए।
“हमलोग मिथला एक्सप्रेस से सुबह 5 बजे मुजफ्फरपुर पहुंचे। स्टेशन पर 15-20 लोग बैंड-बाजा के पोशाक में पहुंचे। ‘बहारों फूल बरसाओ” के गाने पर बैंड बजाया गया। रात में कार्यक्रम हुआ जिसमें बशीर साहब को सुनने बहुत बड़ी भीड़ आई। उस मुशायरे का समा देखने लायक था,” डॉक्टर शकील मोईन ने उस 20 वर्ष पुराने मुशायरे को याद करते हुए कहा।
दर्द-ओ-ग़म को ज़बान देने वाला शायर
शकील मोईन 2001 में मोतिहारी में हुए एक मुशायरे का ज़िक्र करना भी नहीं भूलते। उस मुशायरे में 40 से ज्यादा शायर आए थे। बशीर साहब के पढ़ने का नंबर सबसे आखिर में आया और फिर वह सुबह (फज्र) की अज़ान तक अपनी ग़ज़लें सुनाते रहे और मजमा खचाखच भरा रहा। बशीर बद्र ने पटना, गया, समस्तीपुर, मुज़फ़्फ़रपुर, सिवान, बांका, चम्पारण समेत बिहार के कई ज़िलों में मुशायरे पढ़े।
“वह बेहद आम आदमी थे। बशीर साहब बहुत सहजता से एक-एक व्यक्ति से मिलते जुलते थे,” डॉक्टर संजय प्रकाश ने कहा। “वह अक्सर कहते थे, आप लोग भी लिखिए, पढ़िए, क्योंकि इंसानियत को साहित्य ही बचा सकता है। उनकी एक ग़ज़ल भुलाए नहीं भूलती।
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है।
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है। “
एक दिलचस्प घटना
बशीर बद्र ने 1990 के दशक और 2000 के शुरूआती वर्षों में बिहार में कई मुशायरे पढ़े। एक बार वह मोतिहारी में मुशायरा पढ़कर डॉक्टर शकील मोईन के घर पर रुके थे। दूसरे दिन उन्हें वापस लौटना था लेकिन उन्हें उनके मेज़बान शकील मोईन ने रोक लिया। उस रात लैंडलाइन पर एक फ़ोन बजता है, फ़ोन बशीर साहब के लिए था। फ़ोन पर अगले शख्स ने न जाने क्या कहा कि डॉक्टर बशीर बद्र अचानक से माज़रत करने लगे यानी माफ़ी मांगने लगे।
शकील मोईन ने वजह पूछी तो बशीर बद्र ने निदामत वाले चेहरे से कहा कि उस रात लखनऊ में उत्तर प्रदेश के गवर्नर के साथ उन्हें डिनर करना था लेकिन उन्हें याद नहीं रहा।
“किसी इंसान को डीएम या एसपी खाने पर बुलाये तो वह हफ्ते भर से तैयारी करेगा लेकिन बशीर साहब को गवर्नर का डिनर याद नहीं था। वह इतने ही सादा और बेनयाज़ शख्स थे। कभी मेरे साथ सुबह वाक पर निकलते थे तो यूँही किसी चाय की टपरी में बेंच पर बैठकर चाय पीते थे। दुनिया का सबसे बड़ा शायर इतनी सादगी के साथ रहता था,” डॉक्टर शकील मोईन कहते हैं।
आगे वह बोले, “शेर-ओ-सुखन की दुनिया में बशीर बद्र का जाना हम सबके लिए बहुत बड़ा नुकसान है।”
आसान और सादा लहजा बना पहचान
डॉक्टर बशीर बद्र की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि वह आम लोगों में काफी प्रसिद्ध थे। भारत में 90 के दशक में बशीर बद्र से ज़्यादा सुना जाने वाला शायर शायद ही कोई और होगा। आम बोलचाल की ज़बान को ज़िन्दगी के सांचे में ढालकर शेर बनाना बशीर साहब की ख़ास कारीगिरी थी। वह आसान शब्दों में काफी भारी भरकम और मुश्किल बातें कह दिया करते थे।
इसपर कई अवार्ड से सम्मानित लेखक व स्वतंत्र पत्रकार डॉ संजय पंकज कहते हैं, “आम अवाम की ज़बान पर ग़म को साधारण तरीके से कहने की जो कला थी वो बशीर बद्र से बेहतर किसी के पास नहीं थी।”
“हमलोग जो घंटों में दिल की बात करते हैं उसे बशीर साहब एक शेर में कह दिया करते थे। यह हम लोगों के लिए बड़ी सुविधा होती है।”
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
एक बीमारी ने छीन ली यादों की पोटली
बशीर बद्र ने करीब 40 वर्ष मुशायरे पढ़े। 2000 के दशक में उन्होंने धीरे धीरे मुशायरों में जाना कम कर दिया। वजह थी उनकी घटती याददाश्त। वह डेमेंशिया नामक ब्रेन मेमरी की बीमारी से ग्रसित थे। डॉक्टर शकील मोईन ने हमें बताया कि कई बार मंच पर वह एक ग़ज़ल दो बार पढ़ दिया करते थे। इससे बचने के लिए वह काग़ज़ पर ग़ज़लों की फेहरिस्त बनाकर रखने लगे।
यह एक विडंबना है कि जिस शायर ने याद और प्रेम पर हज़ारों शेर लिखे, जीवन के आखिरी दिनों में उनके पास याद करने को कुछ भी नहीं था।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है उस को भूल जाने में
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