बिहार के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री अब्दुल जलील मस्तान का 12 सितंबर, 2026 को दिल्ली के AIIMS में निधन हो गया। वह पूर्णिया ज़िले के अमौर विधानसभा क्षेत्र से छह बार विधायक रहे। 2015 में बनी महागठबंधन सरकार में उन्हें उत्पाद, मद्य निषेध एवं निबंधन विभाग का मंत्री बनाया गया था।
अब्दुल जलील मस्तान का राजनीतिक सफर करीब चार दशकों का रहा। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राजनीति की शुरुआत की और बाद में कांग्रेस से जुड़ गए। इस दौरान उन्होंने विधानसभा के कई चुनाव लड़े, छह बार अमौर का प्रतिनिधित्व किया और लोकसभा चुनाव में भी अपनी किस्मत आजमाई।
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साल 2025 में ‘मैं मीडिया’ को दिए एक इंटरव्यू में मस्तान ने अपने राजनीतिक सफर के शुरुआती दिनों को याद किया था। उन्होंने बताया था कि 1985 के विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले ही वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर घर लौटे थे। इसी दौरान समाज के लोगों के दबाव और आग्रह पर उन्होंने चुनावी राजनीति में उतरने का फैसला किया।
1985 में निर्दलीय बने विधायक
मस्तान ने 1985 में अमौर विधानसभा सीट से अपना पहला चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा। पांच उम्मीदवारों के बीच हुए करीबी मुकाबले में उन्हें महज़ 17.55 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन इतने वोट ही उनकी जीत के लिए पर्याप्त साबित हुए और वह पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे।
मस्तान के मुताबिक, तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने उन्हें अपने साथ आने की दावत दी और इसके बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए।
कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने 1990 के विधानसभा चुनाव में अमौर से दोबारा जीत दर्ज की। इस बार उनका वोट शेयर बढ़कर 43.06 प्रतिशत हो गया।
हालांकि, 1995 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बेहद करीबी मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा। वह महज़ 755 वोटों से चुनाव हार गए।
इसके बाद तत्कालीन विधायक मुज़फ्फर हुसैन के आकस्मिक निधन के कारण अमौर में हुए उपचुनाव में मस्तान ने एक बार फिर किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें दोबारा हार का सामना करना पड़ा।
2000 में वापसी, लड़ा लोकसभा चुनाव
लगातार दो चुनावी हार के बाद मस्तान ने साल 2000 के विधानसभा चुनाव में वापसी की और अमौर से एक बार फिर विधायक चुने गए।
विधानसभा की राजनीति के साथ उन्होंने लोकसभा पहुंचने की भी कोशिश की। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर किशनगंज संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली।
इसके बाद 2005 बिहार की राजनीति के लिए असामान्य चुनावी साल रहा। उस वर्ष राज्य में दो बार विधानसभा चुनाव हुए और दोनों ही चुनावों में मस्तान अमौर से जीतकर विधानसभा पहुंचे।
इस तरह 1985 से शुरू हुए अपने राजनीतिक सफर में वह अमौर से लगातार एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरा बने रहे।
2010 में हार, 2015 में रिकॉर्ड वापसी
2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में मस्तान को भाजपा प्रत्याशी सबा ज़फर के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
लेकिन पांच साल बाद बिहार का राजनीतिक समीकरण बदल चुका था। 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद, जदयू और कांग्रेस ने मिलकर महागठबंधन बनाया। कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर मस्तान ने अमौर से एक लाख से अधिक वोट हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की और एक बार फिर विधानसभा पहुंचे।
चुनाव के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी महागठबंधन सरकार में अब्दुल जलील मस्तान को उत्पाद, मद्य निषेध एवं निबंधन विभाग का मंत्री बनाया गया।
मस्तान के मंत्री रहते हुए ही बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुई। अप्रैल 2016 में राज्य सरकार ने शराब की बिक्री और सेवन पर व्यापक प्रतिबंध लागू किया। इस तरह बिहार में शराबबंदी लागू करने के शुरुआती दौर में संबंधित विभाग की जिम्मेदारी मस्तान के पास थी।
2015 की बड़ी जीत के बाद मस्तान के लिए अगले दो विधानसभा चुनाव संघर्षपूर्ण रहे।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में वह अमौर से अपनी सीट नहीं बचा सके और मुकाबले में तीसरे स्थान पर रहे। 2025 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने अमौर से चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार भी वह तीसरे स्थान पर रहे।
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