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राजगीर के पवित्र गर्म जलकुंडों का अस्तित्व खतरे में!

बिहार के राजगीर के ऐतिहासिक और बहु-धार्मिक महत्व वाले गर्म जलकुंड आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। घटती जलधाराएँ, गिरता भूजल स्तर, कम होती वर्षा और बढ़ते बोरवेल इन प्राकृतिक तापीय स्रोतों के लिए खतरा बन गए हैं। वैज्ञानिक अध्ययन भी संकेत दे रहे हैं कि यदि स्थानीय स्तर पर भूजल रिचार्ज नहीं हुआ, तो इन पवित्र कुंडों का भविष्य असुरक्षित हो सकता है।

cropped akash raj.jpeg Reported By Akash Raj |
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the existence of the sacred hot springs of rajgir is in danger

बिहार के राजगीर में स्थित पवित्र गर्म जलकुंड अपने ऐतिहासिक महत्व और बहु-धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्व रखते हैं। यहाँ तापीय झरने या Thermal Springs अपनी अनोखी प्रकृति और आध्यात्मिक महत्व के कारण वर्षों से श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। लगभग 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले इन कुंडों के जल को रोगनाशक और शुद्धिकारी माना जाता है, और मकर संक्रांति तथा कुंड स्नान पर्व जैसे अवसरों पर यहाँ हजारों लोग स्नान करने आते हैं। लेकिन हालिया समय में इन कुंडों की घटती धाराओं ने स्थानीय लोगों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।


22 कुंड, 52 धाराएँ

राजगीर में कुल 22 गर्म जलकुंड और 52 जल धाराएं हैं। लेकिन इनमें से कई अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन, आसपास के क्षेत्रों में बढ़ती वनों की कटाई, तेज़ी से हो रहा निर्माण कार्य, अपर्याप्त वर्षा और भूमिगत जल स्तर में गिरावट, इन सभी कारणों ने इस स्थल के अस्तित्व पर गंभीर खतरा खड़ा कर दिया है। इन दिनों गंगा-यमुना कुंड और व्यास कुंड में कम होता पानी चर्चा का विषय है।

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करीब एक दशक पहले 22 एकड़ में फैले पाण्डु पोखर में बोरिंग होने के बाद गंगा-जमना कुंड की धाराएं लगातार सूखती जा यही हैं। कभी गंगा-यमुना कुंड की धाराएं सबसे तेज़ हुआ करती थीं, लेकिन पोखर में बोरिंग होने के बाद वाटर लेवल नीचे जा चुका है। राजगीर विकास मंच के उमराँव प्रसाद निर्मल के अनुसार इलाके में कई बोरवेल बनाये जा चुके हैं, जिस वजह से गर्म जल कुंड सूखते जा रहे हैं। क्योंकि भूमिगत जल ही गर्म होकर सतह पर झरने के रूप में बाहर आता है।


वर्षा, भूजल और झरनों का गहरा संबंध

भारत सरकार के Central Ground Water Board द्वारा वर्ष 2024 में राजगीर तापीय झरना क्षेत्र पर किए गए शोध के अनुसार, क्षेत्र में ऐतिहासिक वर्षा, झरनों के प्रवाह और भूजल स्तर का आपसी संबंध स्पष्ट रूप से देखा गया है। अध्ययन में पाया गया कि अधिकतम वर्षा और भूजल स्तर के चरम बिंदु के बीच औसतन 20-30 दिनों का समय अंतर होता है, जबकि अधिकतम वर्षा और झरनों के अधिकतम प्रवाह के बीच लगभग 30 दिनों का अंतर रहता है। यह निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करता है कि तापीय झरना क्षेत्र के अस्तित्व के लिए स्थानीय स्तर पर रीचार्ज अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वर्षा और संभावित भूगर्भ जल के वाष्पीकरण के आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हुआ कि भूजल रिचार्ज तभी संभव है जब सालाना बारिश 850 मिमी से अधिक हो। जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश में अनिश्चितता हो, तो भूजल के रिचार्ज पर खतरा बन सकता है। इसके साथ ही, क्षेत्र में बढ़ते शहरीकरण ने स्थानीय भूजल व्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। ऐतिहासिक जलस्तर के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले एक दशक में भूजल स्तर लगभग 2 मीटर तक नीचे चला गया है।

लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग, राजगीर के सहायक अभियंता अमीरुद्धीन अंसारी की मानें तो कुंड में पानी की कमी को देखते हुए कई अवैध बोरवेल को 2010-12 में बंद करवाया गया था, जिसके बाद जलधाराएं वापस आयी थीं।

बोरवेल और शहरीकरण

मौसम विज्ञान केंद्र पटना के वैज्ञानिक आशीष कुमार बताते हैं कि नालंदा जिले में पिछले दशक बारिश की कमी दर्ज की गई है। खासकर राजगीर की बात करें तो, पिछले दो सालों में भारी बारिश नहीं हुई है। एक तो बारिश कम हो रही है, ऊपर से भूगर्भ जल के बढ़ते दोहन की वजह से ऐसे हालात हो गए हैं।

11 फरवरी, 2026 को एमएलसी नागेंद्र कुमार द्वारा पूछे गए प्रश्न का जवाब देते हुए बिहार के पर्यटन मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने कहा कि जल्द ही विशेषज्ञों की एक टीम राजगीर का स्थलीय निरीक्षण करेगी। इसके बाद प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर इन प्राकृतिक गर्म जल स्त्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए ठोस कदम उठाये जाएंगे।

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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आकाश राज नालंदा के रहने वाले हैं। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक किया है और तत्पश्चात जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से टीवी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। वे फिलहाल डीडी न्यूज़ में बतौर जिला संवाददाता कार्यरत हैं।

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