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तीन साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित पूर्णिया विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी

चार साल पहले अस्तित्व में आए सीमांचल के इकलौते पूर्णिया विश्वविद्यालय का अपना पुस्तकालय-भवन नहीं है।

Novinar Mukesh Reported By Novinar Mukesh | Purnea |
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पूर्णिया कॉलेज के मुख्य प्रवेश द्वार से बाएँ मुड़कर कुछ कदम चलने और फिर दाएँ मुड़कर तिरछी राह पर चंद कदम चलते हुए एक मलिन, जर्जरता की सीमा में प्रवेश करता महिला छात्रावास अवस्थित है। भवन के बाहर कुछ मोटरसाइकिल खड़ी हैं, जिनके पास छात्रों का एक समूह आपस में बातें करता दिखता है। छात्रावास की दीवार पर प्लास्टर की पपड़ियाँ टूटकर एक-दूसरे से अलग होने की तैयारी कर रही हैं।

पीले रंग से पुते भवन के कई हिस्से पर काई की जिद्दी कालिमा ने डेरा जमाया हुआ है। सिर को ऊपर उठाने पर लाल और नीले रंग में अंकित भवन के लिखित परिचय से आगंतुकों का साक्षात्कार होता है। लिखित जानकारी की दोनों ओर चिन्ह बने हैं। आँखों पर जोर देने से पता चलता है कि लिखित पट्टी की बाईं ओर पूर्णिया विश्वविद्यालय का प्रतीक चिन्ह और दाईं ओर भारत का नक्शा युक्त एक गोलाकार आकृति बनी है, जिसके केंद्र में बड़े अक्षरों में क्यू व नैक अंकित है। क्यू क्वालिटी का सूचक प्रतीत होता है। सम्भवत: बड़ी बेसब्री से यह भवन रंग-रोगन के लिए नैक-टीम के दौरे की बाट जोह रहा है।

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चार साल पहले अस्तित्व में आए सीमांचल के इकलौते पूर्णिया विश्वविद्यालय का अपना पुस्तकालय-भवन नहीं है। फिलहाल, अंतरिम व्यवस्था के तहत महिला छात्रावास लिखे इस भवन से विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी, परीक्षा भवन और परास्नातक के कुछ विभाग संचालित किए जा रहे हैं। इसके लिए गिने-चुने कमरे आवंटित किए गए हैं। तात्कालिक व्यवस्था को पिछले चार सालों से ज्यों का त्यों रखा गया है। ऐसा तब है जब पूर्णिया विश्वविद्यालय सीमांचल के चार जिलों अररिया, किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया के हजारों छात्रों की उच्चतर शिक्षा संबंधी सेवाओं की आपूर्ति का सबसे बड़ा, महती और सार्वजनिक स्रोत है।


Purnea College

सेन्ट्रल लाइब्रेरी की आधारभूत संरचना की स्थिति

विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी में मौजूद सहायकों ने पुस्तकालय प्रभारी से फोन पर बात कर, उनसे प्राप्त दिशा-निर्देशों के तहत सामान्य रूप से सार्वजनिक रहने वाले पुस्तकालय संबंधी वांछित आँकड़े उपलब्ध कराए।

विश्वविद्यालय की अधिकृत लाइब्रेरी का संचालन प्रभारी के भरोसे है। यह प्रभार अंग्रेजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एस. एल वर्मा को दिया गया है। लाइब्रेरी के सफल संचालन में उनकी सहायता के लिए अंग्रेजी विभाग की श्वेता कुमारी को सह पुस्तकालय अध्यक्ष का प्रभार सौंपा गया है। लाइब्रेरी की शेष सेवा मुहैया कराने के लिए दो सहायक रखे गए हैं। पुस्तकालय से जुड़े कार्यों के लिए विषय-विशेषज्ञों की कमी है।

Staff in Purnea university

लाइब्रेरी के संचालन के लिए 04 कमरे आवंटित किये गए हैं जिनमें से दो भूतल पर और दो पहली मंजिल पर हैं। भूतल पर स्थित कमरों में कुल 47 रैक हैं जिनमें से 24 पर किताबें और 23 किताब रहित हैं। पहली मंजिल पर मौजूद दो कमरों में से एक लाइब्रेरी के ऑफिस के बतौर इस्तेमाल करने के लिए आरक्षित कर लिया गया है।

सेंट्रल लाइब्रेरी में 03 कंप्यूटर सिस्टम हैं जिनका इस्तेमाल पाठकों और शोधार्थियों के द्वारा किये जाने का दावा वहाँ के कर्मचारी करते हैं। आधिकारिक उद्देश्यों के लिए एक लैपटॉप भी विश्वविद्यालय द्वारा मुहैया करायी गयी है।

वहाँ बैठे सहायक ने सेंट्रल लाइब्रेरी में पत्रिकाओं सहित कुल मुद्रित पुस्तकों की संख्या 5508 बतायी। लाइब्रेरी के लिए पुस्तक क्रय के पहले चरण में 5000 और दूसरे चरण में 508 पुस्तकों की खरीद की गयी। रैक पर रखी पुस्तकें कम इस्तेमाल होने के कारण नयी-सी लगती हैं।

लाइब्रेरी में कार्यरत कर्मचारी ने बताया कि परास्नातक पाठ्यक्रमों में नामांकित 650 विद्यार्थियों और 36 पीएचडी शोधार्थियों को लाइब्रेरी कार्ड निर्गत किया गया है। विश्वविद्यालय के अधिकार-क्षेत्र में 15 अंगीभूत और 44 संबद्ध कॉलेज हैं। इस लिहाज से पूर्णिया विश्वविद्यालय करीब 120000 विद्यार्थियों और 1000 कर्मचारियों से सीधे तौर पर सम्बन्धित है।

ई-लाइब्रेरी के तहत 600 पुस्तकों तक पहुँच का दावा वहाँ के स्टॉफ करते हैं। ई-पुस्तकों तक आसान पहुँच के लिए पाठकों को शेयर्ड लॉग-इन आईडी और पासवर्ड जारी किए गए हैं।

अनुपयोगी पुस्तकों की खरीद व सॉफ्टवेयर खरीद में धांधली!

पूर्णिया विश्वविद्यालय बनाओ समिति के संस्थापक डॉ. आलोक राज बताते हैं कि लाइब्रेरी के लिए व्यापक पैमाने पर अनुपयोगी पुस्तकों की खरीद की गई हैं। ई-लाइब्रेरी के निमित्त सॉफ्टवेयर की खरीद पर धांधली की गई है। पुस्तकें और सॉफ्टवेयर की खरीद में सार्वजनिक धन की बर्बादी हुई है। लाइब्रेरी में बैठने की व्यवस्था है न वाई-फाई की। विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी व्यवस्था एकदम लचर है।

विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी के तीनों तत्व ज्ञान आकांक्षी, ज्ञान स्रोत और लाइब्रेरी स्टाफ के स्तर पर काफी खामियां हैं। लाइब्रेरी में विषय-विशेषज्ञ की कमी तो है ही, छात्र-छात्राओं का रूझान भी लाइब्रेरी सुविधाओं को प्राथमिकता के तौर पर व्यवस्थित और बहाल कराने की ओर कम ही है। जहाँ छात्र-छात्राएँ लाइब्रेरी में संसाधनों और सुविधाओं के अभाव का रोना रोते हैं, वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन कक्षाओं में छात्र-छात्राओं की कम उपस्थिति की चादर तानता दिखता है। सेंट्रल लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ने की व्यवस्था नहीं है। यह महज लाइब्रेरी कार्ड और पुस्तकें निर्गत करने, वापस लेने, रजिस्टर में प्रविष्टि करने, रजिस्टर, पुस्तकें और रैक का रखरखाव करने की मशीनरी बनी हुई है।

विश्वविद्यालय के क्षेत्राधिकार में आने वाले रामबाग स्थित एसएनएसवाई कॉलेज में पुस्तकालय के लिए अधिकृत कमरे के बगल में अध्ययन सह विनोद कक्ष की व्यवस्था बहाल है। हालांकि, इसे केवल छात्राओं के लिए आरक्षित रखा गया है। एसएनएसवाई कॉलेज की लाइब्रेरी के कर्मचारी के अनुसार वहाँ 4600 मुद्रित पुस्तकें और जर्नल हैं। इनमें हिन्दी की 405, मैथिली की 77, एल एस डब्ल्यू की 75 पुस्तकें सहित अन्य विषयों की पुस्तकें शामिल हैं।

Reading room in purnea university library

वेबसाइट पर पुस्तकालय के ई-संसाधनों का ब्यौरा तक दर्ज़ नहीं

विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आधिकारिक वेबसाइट पर भी पुस्तकालय से जुड़े जरूरी आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर दर्ज़ इन्फॉर्मेशन सेक्शन को पाँच भागों में बाँटा गया है जिनमें से एक लाइब्रेरी है, जिस पर क्लिक करने से खुलने वाली वेबपेज पर एरर 404 दिखता रहता है।

कोविड-19 महामारी के दौरान कक्षाओं के भौतिक संचालन में परेशानी आने के कारण कई विश्वविद्यालयों ने वर्गों का संचालन ऑनलाइन किया। इसके अलावा केंद्र सरकार के स्तर से भी कई परियोजनाएं विकसित की गईं ताकि महामारी के कारण विद्यार्थियों और उनके अध्ययन के बीच गहरी हो रही खाई को पाटा जा सके।

एनपीटीईएल के जरिये इंजीनियरिंग, विज्ञान और मानविकी विषयों में ऑनलाइन वेब और वीडियो पाठ्यक्रमों की सुविधा विकसित करते हुए उसे विद्यार्थियों तक इंटरनेट के जरिये सुगमता से पहुंचाने का प्रयास किया गया। ई-पीजी पाठशाला के जरिये सामाजिक विज्ञान, गणित विज्ञान, कला, ललित कला, मानविकी, भाषा विज्ञान के तहत करीब 70 विषयों में उच्च गुणवत्ता के इंटरैक्टिव ई-कंटेंट विकसित किए गए। ई-अध्ययन जैसे प्लेटफॉर्म पर विभिन्न स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की 700 से अधिक ई-बुक्स तक विद्यार्थियों की मुफ्त पहुंच की व्यवस्था विकसित की गई।

भौतिक पुस्कालय संबंधी सुविधाओं के अभाव में बिना किसी सरकारी मदद की बाट जोहे पूर्णिया विश्वविद्यालय द्वारा अपनी वेबसाइट पर इन महात्वाकांक्षी परियोजना से जुड़े वेबलिंक्स का ब्यौरा दर्ज़ किया जा सकता है। इससे विश्वविद्यालय की वेबसाइट सबके लिए खुली इस शुल्क रहित व्यवस्था से अपने अधिकार क्षेत्रांतर्गत किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया के दूर-दराज क्षेत्र के नामांकित विद्यार्थियों को जोड़ने की कड़ी बन सकती है। हालांकि, इस संबंध में विश्वविद्यालय की तत्परता, उदासीनता और जरूरी इच्छाशक्ति के अभाव की झलक मौजूदा वेबसाइट के लाइब्रेरी सेक्शन पर क्लिक करने से खुलने वाली वेबपेज पर दर्ज़ एरर 404 में स्पष्ट दिख जाती है।

देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों की वेबसाइट पर पुस्तकालय से जुड़े संसाधनों और सुविधाओं का ब्यौरा दर्ज़ होता है। पुस्तकालय के संसाधनों में विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा समर्पित शोध-प्रबंध, लघु शोध प्रबंध, ई-शोध प्रबंध, पुस्तकें, ई-पुस्तकें, ख्याति प्राप्त पत्रिकाओं की सूची उपलब्ध होती है। इसके अलावा विद्यार्थियों की इन तक आसान पहुंच बनाने के लिए उन्हें लॉग इन आईडी और पासवर्ड आवंटित कर दी जाती है।

न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरस रही विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी में दुर्लभ सामग्री के नाम पर कुछ भी नहीं है। जबकि, सीमांचल के जिले कई मायनों में ऐतिहासिक रहे हैं। इस लिहाज से पूर्णिया विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की वर्तमान हालत सीमांचल की संस्कृति और विरासत के प्रति यहाँ के आम निवासियों, जनप्रतिनिधियों, विश्वविद्यालय-अधिकारियों के नजरिये का सही प्रतिनिधित्व करती है।

एक सामाजिक और सेवा प्रदाता संस्थान के तौर पर सीमांचल समाज की तात्कालिक और दीर्घावधि अध्ययन संबंधी जरूरतों को पूरा कर सकने लायक बनने में पूर्णिया विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी को अभी काफी लंबा सफर तय करना है। इसके लिए इच्छाशक्ति, दूरदृष्टि और संसाधनों की आवश्यकता है जिसके लिए विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों सहित अन्य हितधारकों, जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की ओर से ठोस पहल समय की माँग है।

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मधेपुरा में जन्मे नोविनार मुकेश ने दिल्ली से अपने पत्रकारीय करियर की शुरूआत की। उन्होंने दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर , एडीआर, सेहतज्ञान डॉट कॉम जैसी अनेक प्रकाशन के लिए काम किया। फिलहाल, वकालत के पेशे से जुड़े हैं, पूर्णिया और आस पास के ज़िलों की ख़बरों पर विशेष नज़र रखते हैं।

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