साढ़े-तीन महीने के आर्यांश को जन्म से ही न्यूमोनिया की शिकायत है। उसकी माता आशा देवी ने बताया कि शुरुआत से ही आर्यांश को सांस लेने में दिक्कत आती है और उसके दिल में भी छेद है। आशा देवी ने बताया कि ये उनका तीसरा बच्चा है और उनके दूसरे बच्चे की भी मौत फेफ़ड़े में खून जमा होने से हुई थी। पटना के बख्तियारपुर की आशा देवी गोइठा और लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं।
पटना की रहने वाली एक साल की आकांक्षा भी न्यूमोनिया के कारण दो से तीन बार अस्पताल के चक्कर काट चुकी है। उनकी माता काजल देवी ने बताया कि उन्हें भी पांच साल पहले टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) की बीमारी हुई थी।
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ये बच्चे पटना के एनएमसीएच में भर्ती थे। एनएमसीएच के डॉक्टरों ने बताया कि आजकल बच्चों में सांस की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। अस्थमा, ब्रोंकलाइटिस, न्यूमोनिया, बरम्बार न्यूमोनिया, एलआरटीआई (लोअर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन) जैसी मामले अस्पतालों में बढ़ रहे हैं।
अस्पताल के डॉक्टर अभिषेक अडिग ने बताया कि प्रदूषण एक बहुत बड़ा कारण है बीमारियों के बदलते ट्रेंड का। उन्होंने लोगों की जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति के साथ-साथ बदलते वातावरण को भी ज़िम्मेदार ठहराया। वह कहते हैं, “लोगों में प्रदूषण और उससे संबंधित बाकी पहलू एंटीबायोटिक प्रतिरोध पैदा कर रहे हैं।” एंटीबायोटिक प्रतिरोध वह स्थिति है जब बैक्टीरिया (जीवाणु) उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं जो उन्हें मारने या उनकी वृद्धि को रोकने के लिए बनाई जाती है।
स्वास्थ्य बीमा दावों के आंकड़ों से पता चलता है कि हाल ही में भारत में वायु प्रदूषण के कारण बीमा दावों में भारी वृद्धि देखी गई है, विशेष रूप से सर्दियों के महीने में। आंकड़ों से मालूम चलता है कि प्रदूषण से संबंधित बीमारियों के दावों (2025-26) में 8% से अधिक की वृद्धि हुई है। इसमें सबसे ज़्यादा प्रभावित जनसंख्या बच्चों की है। भारत में 0-10 साल की उम्र के बच्चों में प्रदूषण से संबंधित स्वास्थ्य बीमा दावों में 43% की बढ़ोतरी देखने को मिली है।

सांस संबंधी मामलों का इज़ाफ़ा
ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि बिहार के पटना ज़िले के अस्पतालों में जनवरी 2025 में न्यूमोनिया और छाती में संक्रमण के 20-25% केस दर्ज किये गये थे । बिहार राज्य में तीव्र श्वसन संक्रमण की व्यापकता दर 6.8% है जो कि राष्ट्रीय औसत दर (2.7-2.8%) से कहीं गुना ज़्यादा है।
एनएमसीएच और पटना स्थित मेडिवर्सल मैत्री अस्पताल में कार्यरत शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर आशुतोष मिश्रा का कहना है कि बदलते वातावरण और बढ़ते प्रदूषण के कारण बच्चों में हाइपर-सेंसिटिविटी बढ़ गई है। ख़ास तौर पर अस्थमा और एलर्जी विकार में वृद्धि हो रही है। जहां अस्थमा की व्यापकता दर बढ़ कर 12% है। वहीं, एलर्जिक रायनाइटिस की व्यापकता दर 15% और एक्ज़िमा की दर 20% है।
डॉक्टर मिश्रा ने यह भी बताया कि सांस संबंधी समस्याओं जैसे कि न्यूमोनिया, सीओपीडी (क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसऑर्डर), श्वसन विफलता, फेफ़ड़ों में गंभीर समस्या इत्यादि के कारण मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी (हइपोक्सिआ) या कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर बढ़ने (हईपरकेपनीआ) से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र विकार हो सकते हैं। मुख्य प्रभावों में भ्रम, मानसिक थकान, सिरदर्द, चेतना का स्तर कम होना और गंभीर मामलों में कोमा या कॉग्निटिव डिक्लाइन शामिल हैं।
सांस से संबंधित मामलों पर और जानकारी देते हुए डॉक्टर आशुतोष ने बताया कि बदलते वातावरण, इंडोर प्रदूषक, ख़राब वेंटिलेशन, आसपास का माहौल और जीवनशैली, सांस संबंधी बीमारियों के बहुत बड़े कारक हैं।
उन्होंने ये भी कहा कि एंटीबायोटिक का असर अब कम हो रहा है। “पहले ट्रीटमेंट से ठीक होने का समय 4-5 दिनों का होता था, लेकिन अब 10-14 दिन लग जाते हैं।”

बिहार के रहने वाले पर्यावरण विशेषज्ञ इश्तियाक़ अहमद कहते हैं, “वायू प्रदूषक हवा में वायरस और बैक्टीरिया को एक प्लेटफार्म प्रदान करते हैं, जिससे वायु जनित बीमारियां बहुत आसानी से और तेज़ी से फैलती हैं। हवा में मौजूद छोटे कण रोगाणुओं को न केवल जीवित रखते हैं, बल्कि उन्हें फेफड़ों में गहराई तक ले जाने में मदद भी करते हैं।”
प्रदूषण की गंभीरता पर बात करते उन्होंने यह भी बताया कि अगर हवा में ज़हर जब पहले से ही शामिल हो, तो बायोमास कुकिंग (जैविक पदार्थों जैसे लकड़ी, कृषि अपशिष्ट, गोबर के उपले इत्यादि का उपयोग खाना पकाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल करना) काफी हानिकारक साबित हो सकता है।
क्या कहते हैं आंकड़े?
बिहार में कई ज़िले एक्यूट रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन यानी कि तीव्र श्वसन संक्रमण के लिए हॉटस्पॉट के रूप में पहचाने गए हैं, जहाँ प्रति वर्ग किलोमीटर संक्रमण की दर काफी अधिक है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, कटिहार, बेगूसराय, अररिया, किशनगंज, मुज़फ्फरपुर, पटना, हाजीपुर (वैशाली) जैसे ज़िले उच्च वायु प्रदूषण के कारण हॉटस्पॉट की श्रेणी में आते हैं।
नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के उत्तर पूर्वी इलाके (पूर्णिया, कटिहार, सहरसा) और गंगा के मैदानी हिस्से जिसमें वैशाली, समस्तीपुर शामिल हैं, उच्च जोखिम में हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ के शोध से पता चलता है कि एक्यूट रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन के हॉटस्पॉट का सीधा संबंध वायु प्रदूषण [पीएम(पार्टिकुलेट मैटर) 2.5], जनसंख्या घनत्व, तम्बाकू धूम्रपान, और खाना पकाने के अस्वच्छ ईंधन के प्रयोग से है।
बिहार में प्रदूषण बिहार के कारण नहीं है, ऐसा इश्तियाक़ अहमद का मानना है। उन्होंने कहा, “बिहार और उसके आस-पास के इलाकों में न तो आधुनिक तकनीकों से खेती होती है, न तो यहां कोई बड़ी इंडस्ट्रीज़ हैं और न ही कोई बहुत सारा थर्मल पावर प्लांट। बिहार में प्रदूषण के बढ़ने का एक कारण इसकी भौगोलिक स्थिति है। बिहार इंडो-गंगेटिक मैदान के निचले हिस्से में आता है जिस कारण यहाँ एक प्रकार का डिप्रेशन बन जाता है। अतः पश्चिमी प्रदूषक हवाएं बिहार आ जाती हैं। वहीं, दक्षिणी हिस्सों जैसे ओडिशा, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश से भी दूषित हवा यहां उड़ कर आ जाती है।
सरकार के उपाय कारगर हैं?
बिहार में बढ़ते वायु प्रदूषण और उसके कारण बढ़ती गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं जैसे सांस से जुड़ी बीमारियों के मामलों को नियंत्रण में लाने के लिए बिहार सरकार कई योजनाओं और प्रस्तावों पर काम कर रही है। बिहार सरकार ईंट भट्ठों, निर्माण गतिविधियों और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को विनियमित करने और उन पर निगरानी में सुधार की दिशा में काम कर रही है।

नवंबर से फरवरी माह के बीच बिहार में प्रदूषण स्तर गंभीर रूप से बढ़ जाता है, इसे नियंत्रित करने के लिए बिहार सरकार ने पटना, मुज़फ्फरपुर और गया जैसे शहरों में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) लागू किया है। इसके अंतर्गत ईंट भट्ठों का नियमन, निर्माण और विध्वंस कार्यों में डस्ट कंट्रोल (धूल दमन), सड़क की सफाई, कचड़े को खुले में जलाने पर रोक, पुराने डीज़ल और पेट्रोल वाहनों के मानदंडों में सख्ती, ट्रैफिक जाम वाले इलाकों में भीड़ कम करने की कोशिश की जा रही है।
बिहार में अपशिष्ट प्रबंधन और वायु प्रदूषण को कम करने के लिए बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (बीएसपीसीबी) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (बीएसडीएमए) मिलकर कई महत्त्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं। जैसे कि अपशिष्ट प्रबंधन और कम-कार्बन कार्य योजना, बुनियादी ढांचे पर निगरानी, जन जागरूकता और स्वास्थ्य परामर्श जैसी योजनाएं शामिल हैं, जिनका उद्देश्य बिहार में वायु प्रदूषण को 40% तक कम करना है।
हालांकि, आकड़ों से पता चलता है कि सरकार को इस पर सख़्ती से काम करने की आवश्यकता है। बढ़ते प्रदूषण और सांस संबंधी मामलों के डेटा कुछ और ही दर्शा रहे हैं। ऐसे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने पर भी बिहार सरकार को सख़्ती से काम करना होगा। अभी भी कूड़े-कचड़ों के ढेर जगह-जगह वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। सड़क सफाई और पुराने वाहनों में इज़ाफ़ा ही होता दिख रहा है, जिस पर प्रशासन की सख्ती नहीं दिखती है।
इश्तियाक अहमद कहते हैं, “वायु प्रदूषण कितनी बड़ी चुनौती है, इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हम बड़ी-बड़ी पॉलिसी बना लेते हैं, पर उन्हें लागू नहीं कर पाते। सरकार बहुत सारा दिशानिर्देश ले आती है, पर ज़मीनी हक़ीक़त में हमारे लिए ये व्यावहारिक है कि नहीं इस पर काम नहीं किया जाता।”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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