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मोल का पानी, मुफ़्त का ज़हर: अररिया की मांस फ़ैक्ट्रियों का जलवायु सच

बिहार के अररिया ज़िले के फारबिसगंज क्षेत्र में भूजल अब पीने योग्य नहीं रह गया है। दूषित हवा में बदबू और बीमारी के सूक्ष्मजीव मौजूद होने से ग्रामीणों ने अपनी और मवेशियों की तबीयत लगातार बिगड़ते रहने पर ‘मैं मीडिया’ से बातचीत करते हुए इलाक़े के मांस फ़ैक्ट्रियों को जवाबदेह क़रार दिया है।

hammad haider, araria Reported By Hammad Haider |
Published On :
cow dung dumped by a meat factory in forbesganj
फॉरबिसगंज के एक मांस फैक्ट्री द्वारा फेंका गया गोबरी

मो. सलमान ने अपने ट्यूबवेल (चापाकाल) को चार अलग-अलग जगहों पर लगवा कर देख लिया है । बिहार के अररिया ज़िले के फारबिसगंज प्रखंड के पोठिया गाँव के निवासी सलमान के चापाकाल से हर बार एक ही जैसा पानी आया। सलमान ने सुन रखा था कि पानी का कोई रंग नहीं होता। पर हर बार बोरिंग करने पर पीला पानी आता और सलमान को अपनी आँखों पर भरोसा नहीं होता। 


आँखों-देखी, कानों से सुनी बातों को अक्सर पछाड़ दिया करती है। 

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वो सोचते कि दूसरी जगह बोरिंग करवा लेता हूँ, ठीक हो जाएगा। उन्होंने शूरू में 20 फ़ीट, फिर 35, 40 और अंततः 30 फीट पर चौथी बार बोरिंग करवा लिया। इसके बावजूद पानी ठीक नहीं हुआ। उन्होंने कारण जानने की कोशिश की। उनके अलावा अन्य लोग भी साफ़ पानी की तलाश में अपने घरों में लगे चापाकल को कई बार एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह लगा चुके थे, लेकिन गहराई बढ़ाने के बावजूद पानी पीने लायक़ नहीं मिल रहा था।


उन्हें लगा, हो न हो पोठिया और झिरवा पूर्वारी पंचायत के बीच स्थित मांस फ़ैक्ट्रियाँ ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं।  

उन्होंने मैं मीडिया  को बताया, “फ़ैक्ट्रियों में उत्पन्न होने वाली गोबरी के अंश के कारण ट्यूबवेल का पानी ख़राब निकल रहा है।” वह कहते हैं कि फ़ैक्ट्री वाले पहले इसे दूर फेंकते थे, लेकिन अब बाउंड्री के अंदर ही डंप कर देते हैं। सलमान ने सोचा कि क्या यही गोबर या स्लरी बरसात के पानी के साथ-साथ भूजल में मिल जाते हैं, जिससे उनके गाँव का पानी पीला हो गया है । 

“ऐसा होना पूरी तरह संभव है,” भूवैज्ञानिक और विशेषज्ञ परवेज़ आलम, सलमान की इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं। वो कहते हैं कि बिना ट्रीटमेंट के कचरा फेंकना एक गंभीर ख़तरा है। 

उन्होंने मैं मीडिया  को बताया, “यदि किसी एक स्थान पर लंबे समय तक बिना किसी उचित उपचार के फ़ैक्ट्री का अपशिष्ट- जैसे गोबर या स्लरी- खुले में फेंका जाता है, तो बारिश के दौरान उसका रिसाव ज़मीन के अंदर होना पूरी तरह संभव है। ऐसी स्थिति में भूजल का प्रदूषित होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि बारिश का पानी ही भूजल को रिचार्ज करता है।” 

जब इनपुट ही में मिलावट हो तो चापाकाल क्या करे! 

the water in mohammad salman's tubewell has changed colour
सलमान के ट्यूबवेल का रंग बदला हुआ पानी

मोल लेकर पानी पीने की मजबूरी

एक वक़्त था जब बिहार में गर्मियों के दिनों में आने वाले मेहमानों को नींबू, चीनी और पानी का शर्बत दिया जाता था। फिर उसके बाद रसना आया। मेहमान आते और रसने की शर्बत पीकर बैठते और लम्बी-लम्बी बातें किया करते। मो. इरफान और मो. सिराजुद्दीन, दोनों ग्रामीणों ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए बताया कि बदबू के कारण उनके घरों में आए मेहमान भी चाय पीकर तुरंत लौट जाते हैं। वो अब बैठते नहीं, चले जाते हैं। शायद वे जल ग्रहण करने से हिचकते भी हैं। इससे स्थानीय लोगों को शर्मिंदगी का एहसास जकड़ लेता है। 

यह अलग बात है कि वे सब पानी बाहर से मोल लेकर पीते हैं। बताते चलें कि बिहार में हर घर नल जल योजना मौजूद है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसे और मज़बूत होना होगा। 

सिराजुद्दीन बेबसी जताते हुए कहते हैं, “ग़रीब लोगों को कौन देखता है?”

दूसरे रहवासी मो. हेफाज़ का कहना है कि इस पानी से खाना तक नहीं पकाया जा सकता। यह दूषित जल सिर्फ़ इंसानों ही को नहीं, मवेशियों को भी प्रभावित कर रहा है। हेफाज़ ने बताया कि चारा खाने और गंदा पानी पीने से उनका 10 किलो का खस्सी (बकरा), 27 हज़ार रुपए की गाय और एक भैंस मर गई।

marhaba frozen foods
मरहबा फ्रोज़न फूड्स के वेबसाइट से ली गई तस्वीर

नूरजहां ख़ातून अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहती हैं, “रात में इतनी बदबू आती है कि बर्दाश्त नहीं होता। बाल-बच्चे बीमार हो रहे हैं, उल्टी-बुख़ार और ख़ांसी लगी रहती है।” पिछले ही बरस नूरजहां और अन्य ग्रामीणों ने मिलकर सड़क जाम कर अपना विरोध भी जताया था। “फ़ैक्ट्री वाले मगर नहीं माने,” नूरजहां कहती हैं।  

सिराजुद्दीन, नूरजहां की बात से सहमत हैं, “रात-रात भर जेसीबी चलती है, बदबू से सोना मुहाल है।” अन्य बीमारियाँ होंगी, होती रहेंगीं, नींद की कमी से मगर, मनोरोग तो हो ही जाएगा। इस तरफ़ ज़रा ध्यान भी कम ही जाता है। 

यहाँ ज़करिया एग्रो प्राइवेट लिमिटेड, मरहबा फ्रोज़न फूड्स प्राइवेट लिमिटेड और अल-समीर एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड नामक तीन मुख्य फ़ैक्ट्रियाँ हैं। ज़करिया एग्रो प्राइवेट लिमिटेड के यासिर शाहिद मैं मीडिया को बताते हैं, “हमने सारे नियम क़ानून को माना है। हमारे यहाँ हर हफ़्ते सरकारी अधिकारी निरीक्षण करने नियमित रूप से आते हैं ।” 

वो आगे कहते हैं कि आज मीट फ़ैक्ट्री में कोई बाई-प्रोडक्ट (स्लरी, गोबर, ख़ून, नाख़ून  इत्यादि) नहीं बचता। ऑर्गैनिक खाद के लिए गोबर किसान ले जाते हैं, ब्लड मीट लगभग सौ रुपए प्रति किलो बिकता है जो चिकन को खिलाने में काम आता है । 

इसी फ़ैक्ट्री के बुश्रां शाहिद बताते हैं, “हमारे पास 52 एनओसी सर्टिफ़िकेट्स मौजूद हैं। अगर सरकार को लगता कि हमसे कोई चूक हो रही है तो वो हमें ज़रूरी नोटिस भेजती या अधिकारी हमें अवगत कराता।”    

फ़ैक्ट्री की वजह से पानी और हवा दूषित होने के संभावनाओं को यासिर ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि आप आकर फ़ैक्ट्री देख लीजिए। आपको लगेगा कि आप दिल्ली के किसी मॉल में टहल रहे हैं ।  

मरहबा और अल-समीर के मालिकों से तमाम कोशिशों के बवजूद संपर्क नहीं हो सका।  

sirajuddin, salman, hefaz and noor jehan (left to right)
सिराजुद्दीन, सलमान, हेफाज और नूरजहां (बाएँ से दाएँ)

मीट उद्योग का जलवायु परिवर्तन से संबंध

यह समस्या सीधे-सीधे जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ती है। कई शोध पत्र ऐसे भी हैं जो इस बात से आगाह करते हैं। साइंस डिरेक्ट की पीप पित्क, प्रसाद कपाराजु और रैवो विलू की एक रिपोर्ट कहती है कि एक टन ख़ून, चर्बी, हाड़ और मांस सड़ने से जो मिथेन गैस बनती है, उससे लगभग 65000 ग़ुब्बारे भर जायेंगे। इसमें अगर थोड़ी चर्बी मिल जाए, फिर मीथेन उत्पादन तीन गुना बढ़ जाता है। एलपीजी सिलेंडर इतने आ जाएँगे कि एक पांच-सितारा होटल आराम से सालभर अपनी रसोई सँभाल लेगा। पृथ्वी को गर्म वाली गैसों में ये गैस भी शामिल है। 

परवेज़ आलम इसी की तरफ़ इशारा कर रहे थे । 

विज्ञान कहता है कि यह संकट कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि मांस उद्योग के कारण जल प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है । 

अमेरीकी संस्था ‘फीडिंग आवरसेल्व्स थर्स्टी’, जो खाने-पीने की कंपनियों द्वारा जल की गुणवत्ता और उसके उपयोग पर नज़र रखती है, की एक रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य क्षेत्र के सभी उद्योगों की तुलना में मांस उद्योग जल संसाधन प्रबंधन और पानी की गुणवत्ता बनाए रखने में सबसे कमज़ोर और ख़राब प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों में एक है।

इसी संस्था ने अमेरिका के शहर वरजिनिया स्थित स्मिथफ़ील्ड फ़ूडस नामक कंपनी, जो सुअरों को बूचड़खाने ले जाती है, की स्टडी की और पाया कि खुले लगून (गड्ढों) में जमा पशुओं का मल-मूत्र और स्लरी बारिश के दौरान रिसकर सीधे भूजल (ग्राउंडवाटर) में मिल जाता है, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रहता। 

मल-मूत्र और स्लरी चाहे सुअर का हो या गाय-भैंस का, भूजल में मिलने के बाद पानी का रंग पीला कर देता है। वहाँ वरजिनिया में कोई सैम्यूअल और यहाँ अररिया में कोई सलमान जगह-जगह खुदाई करवा रहा है ताकि उसे आँखों-देखी पर विश्वास न हो और वह यह मान ले कि पानी का कोई रंग नहीं होता। 

goats graze in the meat factory's dumping grounds
मीट फैक्ट्री के कचरा फेंकने वाले मैदान में बकरियां चरती हैं

विज्ञान की एक शोध के अनुसार, सघन पशुपालन और मांस उत्पादन, मीठे पानी के सिस्टम को ख़राब करते हैं। इन फ़ैक्ट्रियों से निकलने वाले कचरे के कारण भूजल में भारी मात्रा में नाइट्रेट और अन्य प्रदूषक घुल जाते हैं, जो इंसानी उपभोग के लिए पानी को असुरक्षित बना देते हैं। यह शोध पिछले बरस जून में नेचर में छपा है । 

स्पेन की ‘सिग्मा डीएएफ़’ में छपी सीलीआ इबानेज़ की 25-मिनट की रिपोर्ट ने दर्शाया है कि बूचड़खानों के अपशिष्ट जल में केवल मिट्टी नहीं होती, बल्कि इसमें पशुओं के ऊतक, रक्त, वसा (फैट), बाल, भोजन के कण और मल भारी मात्रा में होते हैं। अगर इस पानी का ठीक से ट्रीटमेंट न किया जाए, जैसा कि वैज्ञानिक परवेज़ आलम भी कह रहे थे, तो इसमें मौजूद ख़तरनाक बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी (पैथोजन्स) सीधे पर्यावरण और पीने के पानी में प्रवेश कर जाते हैं। इस रिपोर्ट ने बात इधर-उधर घुमाई नहीं, सीधे-सीधे साक्ष्य रख दिया है। 

बस देखने वाली बात यह है कि क्या ऐसा कोई साक्ष्य – सरकारी या ग़ैर-सरकारी – इस बात की ओर इशारा करता है कि नहीं कि इस इलाक़े में इन फ़ैक्ट्रियों की वजह से भूजल और हवा दूषित हो चुकी है । 

विधानसभा में भी इस समस्या की गूंज

फारबिसगंज के नवनिर्वाचित विधायक मनोज विश्वास ने मैं मीडिया  से बात करते हुए कहा कि वह इस प्रक्रिया में जुट चुके हैं और उन्होंने कुछ लैब-टेस्टिंग करवाया है और कुछ और जाँच करवाने की ओर अग्रसर हैं । 

यह पूछने पर कि वहाँ की फ़ैक्ट्रियों के मालिक इस बात को सच नहीं मान रहे और यह कह रहे हैं कि अधिकारी जो हर हफ़्ते निरीक्षण के लिए आता है, वो क्यों नहीं कुछ कहता – विधायक ने कहा, “सब मैनेज हो जाता है।” 

हाल ही में बिहार विधानसभा के सत्र के दौरान स्थानीय विधायक मनोज विश्वास और अररिया विधायक आबिदुर रहमान ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। कोई आँकड़ा दिए बग़ैर आबिदुर रहमान ने कहा कि औद्योगिक मुनाफ़े के सामने पर्यावरण और लोगों की सेहत के नियमों को ताक़ पर रख दिया गया है। 

गाँव वालों की मांग है कि या तो इन फ़ैक्ट्रियों को रिहाइशी इलाक़ों से हटाया जाए, या फिर राज्य का प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (BSPCB) यहाँ सख़्त वाटर ट्रीटमेंट और कचरा-निस्तारण प्रणाली लागू करवाए । 

पोठिया और झिरवा पूर्वारी पंचायत के बीच अपने घर में नूरजहां को रात को नाक पर दुपट्टा रखकर सोने की कोशिश कर रही हैं। हेफ़ाज खस्सी, गाय और भैंस को याद कर रहे हैं। सिराजुद्दीन को किसी करवट नींद नहीं। उधर सलमान के चापाकाल से पीले पानी का आना जारी है। 

ऐसा लगता है कि सारी ग़लती चापाकल की है। शायद, कुछ-कुछ नाक की भी।   

संपादन: आमिर मलिक

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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हम्माद हैदर 2020 से अलग-अलग डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ काम कर रहे हैं। जनहित से जुड़ी ख़बरें करना उनकी प्राथमिकता है। उनके लिए काम करना ही शौक है, और वे हर दिन कुछ नया सीखने की कोशिश करते हैं। हम्माद बिहार के अररिया ज़िले के रहने वाले हैं।

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