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कटिहार में नये पुल निर्माण से पहले ही हटा दिया पुराना पुल, बाढ़ में डायवर्ज़न भी बहा, चचरी पर निर्भर

पुल ना रहने से किसानों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। जिन किसानों के खेत नदी की दूसरी तरफ हैं, उनको अपनी फ़सल इस तरफ़ लाने में काफी दुश्वारी होती है। चूंकि, तिपहिया और चार पहिया वाहन चचरी पुल से गुज़र नहीं पाता है, इसलिये सिर पर बोझा उठा कर ही किसान अपनी फ़सल घर तक ला पाते हैं।

Aaquil Jawed Reported By Aaquil Jawed |
Published On :
old bridge dismantled even before construction of new bridge in katihar

बिहार के कटिहार जिले के कोढ़ा प्रखंड और बरारी प्रखंड की सीमा पर स्थित मधुराधार पर बना चचरी पुल ही यहां के लोगों के आवागमन का एकमात्र विकल्प है। यह सड़क सेमापुर से कोलासी को जोड़ती है। साथ ही इलाक़े में रहने वाले लोगों के लिये ज़िला मुख्यालय जाने का यह एक प्रमुख मार्ग है।


यह पुल बरारी और कोढ़ा प्रखंड को भी जोड़ता है। प्रतिदिन इस रास्ते से हज़ारों मोटरसाइकिल और दूसरे वाहनों का आवागमन होता है। चचरी पुल होने की वजह से अभी सिर्फ ई-रिक्शा और मोटरसाइकिल ही गुज़र पाता है। ऑटो रिक्शा और चार चक्का वाहन पूरी तरह से बंद है।

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निर्माण से पहले हटा दिया पुराना पुल

पहले यहां लोहे का पुल था। लोहा वाला पुल के जर्जर होने के बाद विभाग ने नया पुल बनाने का काम शुरू किया और एक छोटा सा डायवर्ज़न बनाकर लोहे के पुल को हटा दिया। लेकिन, डायवर्ज़न इतना छोटा है कि इसका ज्यादातर हिस्सा बाढ़ में बह गया। इस कारण राहगीरों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।


स्थानीय ग्रामीण नसीम अख्तर बताते हैं कि डायवर्ज़न के बह जाने के बाद ग्रामीण मजबूरी में चचरी पुल बना कर आवागमन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि आने-जाने के लिये लोगों ने बांस का चचरी बना दिया है, ताकि लोगों को दिक़्क़त ना हो।

“क़रीब पांच महीने पहले ठेकेदार ने यहां पर मौजूद लोहे के पुल को तोड़ दिया। लोहा वाला पुल तोड़ कर वह अपना काम कर रहा है। उसको नीचे में अच्छा डायर्ज़न रोड बनाना था। इसलिये लोगों को परेशानी हो रही है। आने-जाने में पब्लिक को बहुत दिक़्क़त हो रही है, इसीलिये दो-तीन गांव वालों ने मिलकर आवगमन के लिये बांस का चचरी पुल बना दिया है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने आगे कहा, “इस रास्ते से हमलोग बरारी जाते हैं। प्रतिदिन 700-800 लोग गुज़रते हैं इस चचरी पुल से। बाढ़ में तो नीचे वाला चचरी भी डूब जाता है, जिस वजह से उससे ऊपर कर के नया चचरी पुल बनाया जाता है। अभी पानी थोड़ा सा घटा तो लोगों को राहत मिली है। पानी फिर बढ़ेगा तो चचरी के ऊपर से पानी चलने लगेगा।”

किसानों की बढ़ी परेशानी

पुल ना रहने से किसानों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। जिन किसानों के खेत नदी की दूसरी तरफ हैं, उनको अपनी फ़सल इस तरफ़ लाने में काफी दुश्वारी होती है। चूंकि, तिपहिया और चार पहिया वाहन चचरी पुल से गुज़र नहीं पाता है, इसलिये सिर पर बोझा उठा कर ही किसान अपनी फ़सल घर तक ला पाते हैं।

स्थानीय किसान अज़ीज़ अंसारी ने बताया कि उनलोगों का खेत नदी के उस पार है और लोहे का पुल ख़त्म हो जाने से उनलोगों को बहुत दिक़्क़त हो रही है। उन्होंने कहा कि गांव के अधिकतर लोगों का खेत नदी के उस पार है, ऐसे में गांव की बड़ी आबादी इससे प्रभावित है।

“पुल हटाने से पहले करनी थी व्यवस्था”

विभाग ने तो लोहे का पुल हटा दिया, ताकि नये पुल का निर्माण हो सके, लेकिन, इससे लोगों की परेशानी और बढ़ गई। साथ ही डायवर्ज़न को सही तरीक़े से ना बना कर सिर्फ ख़ानापूर्ति की गई, जिस वजह से बाढ़ में डायवर्ज़न भी बह गया। इससे इस सड़क पर चलना दुश्वार हो गया। मजबूरी में लोगों को चचरी पुल बनाना पड़ा, ताकि आवगमन जारी रह सके।

रकशी गांव के मोहम्मद अली ने बताया कि लोहे का पुल हटाने से पहले विभाग को यहां पर उचित व्यवस्था करनी थी, लेकिन, ऐसा नहीं हुआ, जिस वजह से लोगों को काफी परेशानी हो रही है। उन्होंने कहा कि लोगों को पुल हटाते वक्त सजग रहना चाहिये था और विभाग से आवागमन की उचित व्यवस्था करवा लेनी चाहिये थी।

“लोहा वाला पुल को अपनी जगह पर बरक़रार रखना था। साइड में नये पुल को बना देता। क्योंकि रोड से पूरब साइड बिहार सरकार की ज़मीन भी ज़्यादा थी। साइड से अगर बनाता तो लोगों को ज़्याद दिक़्क़त नहीं होती। लेकिन, उस वक़्त लोगों ने ध्यान नहीं रखा, जिस कारण अभी लोगों को बहुत ज़्यादा दिक़्क़त झेलनी पड़ रही है,” उन्होंने बताया।

मो. अली ने आगे बताया, “यह दिक़्क़त अभी दो साल तक और झेलनी होगी। दो-तीन साल तो लग ही जायेगा नये पुल निर्माण में। इससे जल्दी में तो काम होगा ही नहीं। कटिहार आने-जाने में बहुत दिक़्क़त हो रही हो लोगों को। अभी चार चक्का वाली गाड़ी पुरी तरह से बंद है। सिर्फ टोटो ही चचरी से गुज़र पाता है, जबकि, यह पुल बरारी और कोढ़ा प्रखंड को जोड़ने वाला है।”

विभाग की ग़लती या ठेकेदार की?

स्थानीय ग्रामीण मो. तजम्मुल ठेकेदार का बचाव करते हुए बताते हैं कि यहां पर ठेकेदार की ग़लती नहीं है, बल्कि, सरकार की गलती है। उन्होंने कहा कि सरकार को बाढ़ से ठीक पहले पुल निर्माण का कार्य ठेकेदार को नहीं सौंपना था।

“ठेकेदार से हमलोगों को आपत्ति नहीं है, ना ही ठेकेदार कुछ ग़लत किया है। वह तो पुल बनाने आया है, पुल बना कर जायेगा। यह ग़लती सरकार की है, क्योंकि सरकार को टाइम देख कर निर्माण कार्य देना चाहिये था। इस टाइम में एग्रीमेंट दिया ठेकेदार को तो वह बेचारा क्या करेगा?” ऐसे समय में दिया काम कि दो महीने बाद बारिश शुरू हो गई,” उन्होंने कहा।

उन्होंने आगे बताया, “जब नदी सूखी थी तो ठेकेदार ने डायवर्ज़न दिया था नीचे में। लेकिन, यहां के स्थानीय ग्रामीण, जिनको कुछ पता नहीं था वो कह दिया कि यहां पर ज़्यादा पानी होता नहीं है। ठेकेदार तो यहां का है नहीं, वह तो बाहर का है। उसको पता ही नहीं है कि यहां पर कितना पानी होता है। स्थानीय ग्रामीणों की बात पर वह नीचे करके डायवर्ज़न दे दिया था।”

वहीं, रास्ते से गुज़र रहे जितेंद्र कुमार यादव ने बताया कि जनता को हो रही परेशानी का मुख्य कारण बाढ़ से ठीक पहले लोहे के पुल को हटा लेना है। अगर बरसात से पहले पुल को नहीं हटाया जाता या कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जाती तो लोगों को इतनी दिक्कत नहीं होती। हालांकि, उन्होंने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि ग़लती ठेकेदार की है ना कि सरकार की।

“ठेकेदार को बरसात के टाइम पुल को तोड़ना नहीं चाहिये था। यह जो लापरवाही है वो ठेकेदार की है, ना कि सरकार की। इसमें सरकार की कोई ग़लती नहीं है। यह पुल लगभग दो साल से क्षतिग्रस्त है। मेरे ख़्याल से इसमें सरकार की कोई ग़लती नहीं है। यह कंस्ट्रक्शन करने वाले ठेकेदार की ग़लती है 110 परसेंट” उन्होंने बताया।

उन्होंने आगे बताया कि यह एक मुख्य मार्ग है और लगभग दो हजार गाड़ियां हर दिन इस रास्ते से होकर गुज़रती है, लेकिन, पुल के दो साल से क्षतिग्रस्त होने की वजह से ऑटो और चाय पहिया वाहनों का आना-जाना इस रास्ते पर बंद है और सिर्फ बाइक इस पुल पर से गुज़र सकता है। उन्होंने विभाग से जल्द से जल्द इस पुल के निर्माण की मांग की।

जांच करवायी जायेगी: ग्रामीण कार्य विभाग

मामले को लेकर ‘मैं मीडिया’ ने पुल बनाने वाले ठेकेदार से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन, उनसे हमारा संपर्क नहीं हो सका।

हमने ग्रामीण कार्य विभाग के कटिहार प्रमंडल के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर अजय सिंह से फोन पर बात की। उन्होंने बताया कि बिना डायवर्ज़न के कहीं भी कोई पुल बनाने की प्रक्रिया शुरू नहीं की जाती है, फिर भी अगर डायवर्ज़न में कोई दिक्कत है तो एसडीओ और जूनियर इंजीनियर को भेज कर जांच करवायी जायेगी।

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Aaquil Jawed is the founder of The Loudspeaker Group, known for organising Open Mic events and news related activities in Seemanchal area, primarily in Katihar district of Bihar. He writes on issues in and around his village.

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