Thursday, October 6, 2022

ना खुदा ही मिले ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के हम

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ये शेर बिहार में चुनावी फिजाओं के दौरान मोदी के हनुमान बनकर घूम रहे चिराग पासवान पर आज सटीक बैठ रहा है। लगातार बदलती हुई संभावनाओं का खेल राजनीति जहां कोई भी दोस्ती या दुश्मनी स्थायी नहीं होती, जहां खून के रिश्ते को भी सियासी नफा-नुकसान की कसौटी से होकर गुजरना पड़ता है, इसी खेल में चिराग पासवान के साथ खेला हो गया है।

कोरोना की दूसरी लहर के कहर के बाद बिहार की राजनीति ने बड़ी करवट ली है। जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी की नाराजगी वाली खबरों से एनडीए के भीतर तनातनी की अटकलों के बीच लॉकडाउन के बाद बिहार की सियासत ने नीतीश कुमार का कहर देखा है। जी हां कोरोनाकाल वाले बिहार के ऐतिहासिक चुनाव में सत्ताधारी जेडीयू को 43 सीटों पर सिमटाने वाले चिराग पासवान को नीतीश कुमार ने इतना बड़ा झटका दे दिया, जिसने चिराग की राजनीति के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।

बिहार में चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी में बड़ी बगावत हो गई है। एलजेपी के पांच सांसदों ने पार्टी से अलग होने का फैसला कर लिया है। एलजेपी के छह में से पांच लोकसभा सांसदों ने हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से MP पशुपति कुमार पारस को संसदीय दल का नेता चुना है। पशुपति चिराग पासवान के चाचा हैं। चिराग पासवान को हटाकर नेता चुना जाना बिहार की राजनीति के लिहाज से बड़ी घटना है। चिराग को अकेला छोड़ने पर चाचा पशुपति पारस ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि हम तीनों भाइयों में बहुत बनती थी, लेकिन राम विलास के निधन के बाद मैं अकेला महसूस कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि हमने पार्टी तोड़ी नहीं बल्कि बचाई है। पारस ने कहा कि चिराग पासवान के रहने से मुझे कोई परेशानी नहीं है। पशुपति पारस ने साफ कर दिया है कि लोजपा पहले की तरह ही एनडीए का हिस्सा रहेगी, इसके साथ ही पारस ने नीतीश कुमार की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए उन्हें विकास पुरुष करार दिया है। पारस ने कहा कि पार्टी में असामाजिक तत्व घुस आए और उन्होंने बिहार में गठबंधन तोड़ दिया। चिराग पासवान से मुझे कोई शिकायत नहीं है। वो जिस तरह से पार्टी चला रहे थे उससे सब नाराज थे।

राजनीति के मौसम वैज्ञानिक माने जाने वाले रामविलास पासवान जब तक पार्टी के अध्यक्ष रहे, तब तक वो अपने साथ सबको साधने में सफल रहे थे। हालांकि पार्टी में टूट की खबरें तब भी हावी होती रही थी, लेकिन उनके निधन के बाद लोजपा में टूट का नया अध्याय लिखना शुरू हो गया। जिसकी पटकथा बिहार विधानसभा चुनाव में ही लिखी जा चुकी थी। चिराग का बिहार विधानसभा चुनाव में अकेले सभी सीटों पर लड़ने का दांव उल्टा पड़ गया। एनडीए से निकलकर जेडीयू और खासकर नीतीश कुमार को पर्सनली टारगेट पर लेना चिराग को इतना भारी पड़ेगा, ये उन्होंने शायद सोचा नहीं होगा। आपको बता दें कि लोजपा में इस बड़ी टूट की सबसे बड़ी वजह नीतीश के सबसे भरोसेभंद सिपाही सासंद ललन सिंह को माना जा रहा है, जिनके साथ पशुपति पारस की मुलाकात के बाद ही इस पूरे खेला को अमलीजामा पहनाया गया है।

बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी तमाम ऊर्जा लगाने के बाद भी चिराग पासवान को आशातीत सफलता नहीं मिल सकी थी। तब उन्होंने सूबे की सभी 143 सीटों पर अपने उम्मीदवारों का उतारा था, लेकिन सफलता भी मिली तो केवल एक पद पर। तब मटिहानी से लोजपा के टिकट पर राजकुमार सिंह को जीत मिली थी, हालांकि चिराग राजकुमार को अपने साथ रखने में सफल नहीं हो पाये थे और बाद में वह जेडीयू में शामिल हो गये थे। अप्रैल महीने में जब यह हुआ तो कहा जाने लगा कि जदयू ने लोजपा को निपटा दिया है। बिहार विधानसभा अध्यक्ष ने लोजपा विधायक दल के जद यू में विलय की मान्यता दे दी। बताया गया कि बेगूसराय के मटिहानी विधानसभा से लोजपा के टिकट पर जीत कर आए विधानसभा पहुंचे राजकुमार सिंह काफी दिनों से जदयू के संपर्क में थे। उन्होंने कई बार सरकार का खुलकर समर्थन किया था। फिर अप्रैल में उन्होंने विधिवत लोजपा छोड़कर जदयू का दामन थाम लिया।

इसके पहले फरवरी में लोजपा की इकलौती एमएलसी नूतन सिंह बीजेपी में शामिल हो गई थी। उनके बीजेपी में शामिल होने के साथ ही बिहार विधान परिषद में चिराग पासवान की पार्टी लोजपा के सदस्यों की संख्या शून्य हो गई थी। नूतन सिंह ने पटना बीजेपी ऑफिस में बिहार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल की मौजूदगी में ‘कमल’ को थामा था।

फरवरी माह में ही चिराग पासवान को तब और धक्का लगा था जब लोजपा के 200 से अधिक नेता जनता दल (युनाइटेड) में शामिल हो गए थे। इन सभी नेताओं ने जद (यू) के प्रदेश कार्यालय में आयोजित एक मिलन समारोह में जदयू की सदस्यता को ग्रहण किया था, तब इनका नेतृत्व लोजपा के पूर्व प्रवक्ता केशव सिंह ने की थी। लोजपा से आये इन नेताओं को जदयू अध्यक्ष आरसीपी सिंह और प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवाई थी।

यानि नीतीश कुमार का ऑपरेशन लोजपा चुनावी नतीजों के बाद से ही शुरु हो चुका था। नीतीश कुमार की सियासत को करीब से जानने वाले ये जानते हैं कि कोई उन्हें राजनीतिक तौर पर टारगेट करे तो वो एक बार के लिए उसे माफ कर भी देते हैं, लेकिन जिस तरह से चिराग ने उन्हें पर्सनली टारगेट किया था, ऐसी स्थिति में राजनीतिक बदला लेने में सियासत के माहिर खिलाड़ी नीतीश जी होमियापैथी में यकीन रखते हैं और यही इस बार भी हुआ है। नीतीश कुमार ने चिराग पासवान के ईलाज के लिए पॉलिटिकल होमियोपैथी ईलाज करने वाले ललन सिंह को चुना था और ललन सिंह ने अपना काम बखूबी कर दिया है।

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