भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने 24 जून को बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ ही महीने पूर्व मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की घोषणा की। हालांकि ये पुनरीक्षण चुनावी प्रक्रिया का एक नियमित हिस्सा होते हैं, लेकिन इस बार इसके साथ 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने वालों के लिए नागरिकता का प्रमाण मांगने की शर्त जोड़ दी है, जिसने करोड़ों मतदाताओं के बीच आशंका और भ्रम पैदा कर दिया है।
चुनाव आयोग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, इस प्रक्रिया का उद्देश्य सभी पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में दर्ज करना, किसी भी अपात्र व्यक्ति को सूची से बाहर रखना, और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है। अर्थात्, SIR का घोषित मकसद बिहार में चुनाव को निष्पक्ष और आसान बनाना है।
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लेकिन जब चुनाव सिर पर हैं (नवंबर 2025 में), ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या ईसी को यह कार्य करना चाहिए? क्या एक महीने (25 जुलाई तक) में SIR सम्पन्न करना संभव है? इतनी कम समयावधि में, जब राज्य की एक बड़ी आबादी रोज़गार के लिये दूसरे राज्यों में पलायन करती है और जन्म-मृत्यु के रिकॉर्ड बेहद असंतुलित हैं, क्या लोगों के पास अपनी नागरिकता साबित करने का वास्तविक अवसर है? क्या चुनाव आयोग के पास पर्याप्त संसाधन और कैडर हैं, जो इस वादे को बेहद दक्षता से लागू करें? आयोग ने भले ही इन तमाम सवालों के उत्तर दिए हैं, लेकिन अभी तक जमीनी रिपोर्टों ने इनका पूरी तरह समाधान नहीं किया है।
संवैधानिक ढांचा और कानूनी प्रावधान
यहाँ तीन मुद्दे विवाद का विषय हैं। पहला, नागरिकता, जिसका निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 (2019 के संशोधन अधिनियम सहित) के अनुसार और नागरिकता नियम, 2009 के तहत केंद्र सरकार द्वारा (नागरिकता के लिए आवेदन के आधार पर) किया जाता है। दूसरा, जनगणना – जिसके जरिए उम्र, लिंग, समुदाय, धर्म, जाति, भौगोलिक सीमाएँ आदि कई मापदंडों के आधार पर आबादी की गिनती और निवास स्थान (डोमिसाइल) का निर्धारण होता है। तीसरा, मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल), जो यह तय करती है कि नागरिकों में से कौन मतदान के योग्य है। ER का उद्देश्य पूरी तरह अलग है; इसका मकसद न तो नागरिकता की स्थिति पर प्रभाव डालना है और न ही मतदाता के निवास (डोमिसाइल) को चुनौती देना।
इस संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 324 और 326 विशेष महत्व रखते हैं। अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने की शक्ति देता है, जिसमें ‘संशोधन’ का अधिकार भी शामिल है। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के मापदंड और मतदाता के रूप में अयोग्यता के आधार तय करता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RP Act) की धारा 16, मतदाता सूची में शामिल होने से संबंधित अयोग्यता के आधार प्रदान करती है। अनुच्छेद 326 और धारा 16 को एक साथ पढ़ने पर, मतदाता सूची में नाम शामिल न होने के दो प्रमुख आधार, अनिवासिता (non-residency) और अनागरिकता (non-citizenship), स्पष्ट रूप से स्थापित होते हैं।
इरादे में खोट
निर्वाचन आयोग को “संशोधन” करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन जब इस अधिकार का प्रयोग किया जाता है, तब उसके इरादे और तरीके की भी परख जरूरी है।
क्या SIR के पीछे आयोग का इरादा उसके घोषित उद्देश्य से मेल खाता है?
निर्वाचन आयोग ने उम्र के आधार पर सत्यापन की प्रक्रिया को निम्नलिखित प्रकार से विभाजित किया है—
- जुलाई 1987 से पहले जन्मे व्यक्ति: इनसे जन्म तिथि और जन्म स्थान का प्रमाण मांगा गया था, लेकिन अब वे 2003 की मतदाता सूची से अपना विवरण (जो ऑनलाइन उपलब्ध है) दर्शाते हुए नामांकन प्रपत्र जमा कर सकते हैं।
- जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे व्यक्ति: इन्हें स्वयं के साथ-साथ अपने माता-पिता में से किसी एक का प्रमाण-पत्र देना अनिवार्य है।
- दिसंबर 2004 के बाद जन्मे व्यक्ति: इन्हें स्वयं के और अपने माता-पिता दोनों की जन्म तिथि और जन्म स्थान का प्रमाण देना होगा।
इस प्रक्रिया के लिए आयोग ने कुल 11 प्रकार के दस्तावेज़ स्वीकार्य माने हैं, जिनमें प्रमुख रूप से जन्म प्रमाणपत्र, मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, स्थायी निवास प्रमाणपत्र और जाति प्रमाणपत्र आदि शामिल हैं।
SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) का उद्देश्य तभी पूरा माना जाएगा जब मतदाता सूची इलेक्टोरल रोल से केवल गैर-नागरिक (आरपी अधिनियम की धारा 16 के तहत) और गैर-निवासी (अनुच्छेद 326 के तहत) व्यक्तियों को ही बाहर किया जाए। दुर्भाग्यवश, वास्तविकता इससे भिन्न है। जब आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे आम पहचान पत्रों को मान्य दस्तावेजों की सूची से बाहर कर दिया गया है और माता-पिता की पहचान अनिवार्य कर दी गई है, तो यह इरादा अपने घोषित उद्देश्य को पूरा करता नजर नहीं आता। इसके अतिरिक्त, जब इस प्रक्रिया के कारण लाखों नागरिकों के नाम ही सूची से बाहर किए जा सकते हैं, तो उद्देश्य किस प्रकार पूरा होगा? दिशा-निर्देशों के अनुसार, जिन व्यक्तियों के नाम 2003 की मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) में नहीं हैं, उन्हें एक महीने के भीतर नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य है। अनुमानतः लगभग 2.93 करोड़ मतदाता, यानी बिहार के कुल मतदाताओं का लगभग 37 प्रतिशत, इस श्रेणी में आते हैं।
त्रुटिपूर्ण तरीका
सूची संशोधन की प्रक्रिया भी कई मायनों में सवालों के घेरे में है। तर्कसंगत रूप से देखा जाए तो मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया उन परीक्षाओं की तरह होनी चाहिए जिसमें उत्तीर्णता का सिद्धांत (जैसे हाई स्कूल, स्नातक इत्यादि) अपनाया जाता है, न कि प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UPSC, NEET) की तरह, जिसका उद्देश्य चयन के बजाए बाहर करना होता है। पूर्व प्रकार की प्रक्रिया समावेशी होती है जबकि उत्तर प्रकार की प्रक्रिया अपवर्जनात्मक। उसी तरह, मतदाता सूची भी इस प्रकार तैयार हो कि अधिकाधिक लोगों को शामिल किया जा सके, न कि उन्हें बाहर करने की प्रवृत्ति अपनाई जाए। इसके लिए आवश्यक है कि नागरिकता और निवास का अनुमान मतदाता के पक्ष में हो। दुर्भाग्यवश, संशोधन की मौजूदा प्रक्रिया इस तर्क को नकारती है, क्योंकि इसमें आधार और राशन कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मान्य नहीं हैं।
यह तरीका एक अन्य दृष्टि से भी दोषपूर्ण है। निर्वाचन आयोग ने ऐसे लोगों के लिए एक मौका देने की बात कही है, जिनका नाम इलेक्टोरल रोल से हट गया है। यह स्थिति स्वयं में समस्या पैदा करती है, क्योंकि पूरा बोझ अब मतदाता पर आ जाता है। सबसे पहले, उसे सिद्ध करना होगा कि वह भारतीय नागरिक है और बिहार का निवास भी रखता है; और यदि उसका दावा साबित नहीं होता, तो उसे पुनः अपना नाम सूची में जोड़ने के लिए आवेदन करना होगा। आखिर निर्वाचन आयोग चुनाव से ठीक पहले इस पूरी प्रक्रिया को इतना जटिल क्यों बना रहा है? मतदान का अधिकार देने की जिम्मेदारी राज्य की है, तो फिर मतदाता पर अनावश्यक बोझ डालना कहां तक उचित है?
सीमांचल की विशेष स्थिति
हालाँकि SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) की प्रक्रिया पूरे बिहार में लागू है, लेकिन इसका सबसे गहरा असर सीमांचल—अररिया, कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया पर पड़ने की आशंका है। यह सीमावर्ती इलाका राज्य के सबसे अधिक आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिए पर रहने वाले क्षेत्रों में शामिल है। यहाँ मुस्लिम आबादी का अनुपात काफी अधिक है, जिनमें अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और मजदूरी या कृषि मजदूरी करने वाले भूमिहीन या श्रमिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं।
2011 की जनगणना के अनुमान के अनुसार, किशनगंज में बिहार की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी (68%) है, इसके बाद कटिहार (44%), अररिया (43%) और पूर्णिया (38%) का स्थान है। इन जिलों में साक्षरता दर भी राज्य के अन्य हिस्सों की अपेक्षा बेहद कम है। वर्ष 2001 में इस क्षेत्र की लगभग एक-तिहाई आबादी निरक्षर थी, जो उस समय के बिहार के औसत 47% से काफी कम थी। किंतु 2011 में सीमांचल की साक्षरता दर बढ़कर 54% पहुंची, जबकि बिहार की औसत साक्षरता दर 64% रही—जो अभी भी प्रदेश के अन्य इलाकों की तुलना में कम ही मानी जाएगी।
इन जिलों के कई परिवारों में वर्तमान पीढ़ी पहली बार औपचारिक विद्यालय जा रही है। 25 वर्ष से अधिक आयु के अधिकांश वयस्क पूरी तरह अशिक्षित हैं और कभी राज्य के संस्थानों से उनका संपर्क नहीं रहा है। अनेक गांवों में निजी मदरसे ही शिक्षा का एकमात्र साधन हैं, जो बिहार मदरसा बोर्ड या सरकारी शिक्षा तंत्र से जुड़े नहीं हैं। नतीजतन, स्कूल छोड़ने या मैट्रिक के प्रमाणपत्र जैसे सरकारी दस्तावेज अक्सर उपलब्ध नहीं हैं। अगर इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा 2003 की मतदाता सूची में नाम से वंचित है और उनके पास शैक्षिक प्रमाणपत्र भी नहीं है, तो वे अपने और अपने माता-पिता के जन्म-विवरण का प्रमाण कैसे देंगे?
बिहार लगभग हर साल भीषण बाढ़ की चपेट में आता है, विशेषकर कोसी-सीमांचल क्षेत्र अपनी भौगोलिक संवेदनशीलता और तटबंधों की कमी के कारण सबसे अधिक प्रभावित होता है। कोसी और महानंदा जैसी नदियाँ सीमांचल में बार-बार बाढ़ लाती हैं, जिससे खेत-खलिहान डूबते हैं, घर उजड़ते हैं और हजारों लोग विस्थापित होते हैं। सीमांचल के कई इलाकों, विशेषकर महानंदा नदी के किनारे लगातार भूमि कटाव होता रहता है, जिससे लोग बार-बार उजड़ने और पुनर्वास के चक्र में फँस जाते हैं।
सीमांचल की लगभग 90% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और इनमें से अधिकांश भूमिहीन हैं। रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग कृषि सीजन के दौरान पंजाब और हरियाणा की ओर प्रवास कर खेतों में काम करते हैं। ये प्रवासी परिवार महीनों तक घर नहीं लौट सकते और उनके लिए 30 दिन की समयसीमा में सरकारी औपचारिकताएँ पूरी करना लगभग असंभव है। उनसे यह अपेक्षा करना कि वे खेतों पर काम करते हुए वेबसाइट खोलें, फॉर्म डाउनलोड करें और दस्तावेज अपलोड करें, न सिर्फ अव्यावहारिक है, बल्कि ग्रामीण भारत की वास्तविकता को समझने से भी दूर है।
CAA/NRC का डर
ऐसी प्रबल संभावना है कि संशोधन प्रक्रिया केवल मतदाता सूची (ER) के अद्यतन तक सीमित नहीं रहेगी। प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 पहले ही सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती के दायरे में हैं। सरकार शीघ्र ही जनगणना कराने की घोषणाएँ भी कर चुकी है। यदि यह जांच-पड़ताल सही तरीके से नहीं हुई, तो इसकी व्यापक और गहरी संवेदनात्मक प्रभाव दिख सकता है, क्योंकि इससे मतदाताओं का अधिवास (डोमिसाइल) एवं नागरिकता दोनों तय हो सकते हैं।
इस प्रक्रिया का समय और स्वरूप सीमांचल के मुसलमानों से जुड़े राजनीतिक विमर्श से अलग नहीं किया जा सकता। यह क्षेत्र सुरजापुरी, शेरशाबादी, कुलहैया जैसी मुस्लिम जातियों का घर है, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रही हैं और अक्सर ‘बाहरी’ के रूप में देखी जाती हैं। NRC-CAA आंदोलन के बाद से सीमावर्ती मुस्लिम समुदायों की नागरिकता को लेकर संदेह और भी बढ़ा है।
2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा नेताओं ने सीमांचल में ‘अवैध घुसपैठ’ का मुद्दा लगातार उठाया। आमतौर पर जनसंख्या वृद्धि को इसका सबूत बताया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि यहां जनसंख्या वृद्धि के पीछे ग़रीबी और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसी सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ कहीं अधिक जिम्मेदार हैं, न कि कोई षड्यंत्र या घुसपैठ। पिछले साल केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सीमांचल में हिंदू स्वाभिमान यात्रा निकालते हुए “लव जिहाद”, हिंदू सुरक्षा और इस क्षेत्र में NRC की ज़रूरत का हवाला दिया; साथ ही चेताया कि अगर NRC लागू नहीं किया गया तो हिंदुओं को कश्मीर और बांग्लादेश की तरह अपना घर छोड़ना पड़ सकता है।
ये तमाम दावे और आरोप एक व्यापक वैचारिक रणनीति के हिस्सा हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम वोटरों को संदेह के घेरे में लाकर उनके मताधिकार की वैधता को कमज़ोर करना है। इसी संदर्भ में, मतदाता सूची का यह संशोधन एक तटस्थ प्रशासनिक प्रक्रिया न लगकर एक चुनावी छंटनी उपकरण की तरह दिखता है, जो किसी एक विशेष समुदाय को निशाना बना सकता है।
डर का विस्तार
संविधान की दृष्टि में मतदाता सूची बनाना एक प्रशासनिक प्रक्रिया माना जाता है। लेकिन व्यवहार में वर्तमान संशोधन कई गंभीर मुद्दों, जैसे डोमिसाइल (स्थायी निवास), आगामी जनगणना पर असर और ‘अवैध प्रवास’ के बहाने गैर-नागरिकों की छंटनी, को छूता है।
हम पहले ही देख चुके हैं कि रोहिंग्या मुसलमानों का क्या हश्र हुआ है। जब किसी क्षेत्र के निवासियों को ही अवैध प्रवासी मानने की धारणा बनती है, तो इससे उनकी जान और स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है और वे कभी भी निर्वासन (डिपोर्टेशन) के खतरे में आ सकते हैं। क्या मतदाता सूची से बाहर किए जा रहे लोगों का भी आगे ऐसा ही हाल होगा?
अवैध प्रवासियों के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का रवैया भी संतोषजनक नहीं रहा है। मोहम्मद सलीमुल्लाह मामले में, रोहिंग्या को म्यांमार निर्वासित किए जाने की गंभीरता समझाने के बावजूद, कोर्ट ने इसे ‘गैर-मुद्दा’ करार दिया। हाल ही की एक सुनवाई में, जब रोहिंग्या के अवैध निर्वासन के वास्तविक उदाहरणों पर दखल की मांग की गई तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे महज “कल्पनाओं का पुलिंदा” बता दिया।
SIR के संदर्भ में रोहिंग्या जैसा खतरा भले दूर का लगे, लेकिन सीमांचल के मुस्लिमों के लिए नागरिकता और अवैध प्रवास की अवधारणा भी उतनी ही संवेदनशील है। सूची से बाहर होना सिर्फ वोट का अधिकार खोना नहीं, बल्कि आजीविका, पहचान और सुरक्षा संकट में डाल सकता है।
SIR को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स समेत कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और जॉयमाल्या बागची की पीठ मामले की सुनवाई कर रही है। उम्मीद की जा रही है कि अदालत इस मामले में जमीन से जुड़ी हकीकतों को ध्यान में रखते हुए फैसला देगी।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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