28 वर्षीया रुपमा देवी (बदला हुआ नाम) की ससुराल कटिहार जिला के बरारी प्रखंड के एक तटबंध पर है, जहां वह अपने चार बच्चों और बूढ़ी सास के साथ रहती हैं। शादी के बाद वह 2008 की बाढ़ में विस्थापित उस परिवार का हिस्सा बनी जिसके पास रहने के लिए दो कमरों का फूस का मकान और आमदनी, रोज़गार के लिए पलायन पर टिकी हुई है। “पति दिल्ली में रहकर परिवार का खर्च चलाते हैं और मैं घर संभालती हूं,” वह बताती हैं। तटबंध पर आने से पहले उनका अपनी ज़मीन पर घर था और परिवार का गुज़र बसर खेत में मज़दूरी करके होता था। लेकिन, हर साल आने वाली बाढ़ ने सबकुछ बदल दिया।
वह बताती हैं, “अभी तो नदी या बारिश के पानी का डर नहीं है, पर बाढ़ के समय तटबंध की दूसरी तरफ पानी बढ़ने से डर बना रहता है। हर वक़्त चिंता लगी रहती है।”
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इसी तटबंध पर थोड़ी दूर 43 वर्षीय नूरुल हक़ (बदला हुआ नाम) का घर है जो पहले अपने पैतृक ज़मीन पर खेतीबाड़ी करते थे। आज अपने छह सदस्यों वाले परिवार के पालन-पोषण के लिए ईंट-भट्ठा में कामकाज और घर के आसपास ही दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर हैं।
“बस अब यही क़िस्मत है। इस उम्र में दिल्ली-पंजाब जाकर नहीं कमा सकते, बेटियों की शादी का टेंशन है। परिवार को ऐसे हाल में अकेले छोड़ कर नहीं जा सकते,” वह कहते हैं। वह हाई प्रेशर (उच्च रक्तचाप) के मरीज़ हैं। हाई प्रेशर की मुख्य वजहों में एक वजह तनाव भी है।
कटिहार समेत बिहार के कोसी क्षेत्र में बाढ़ के कारण विस्थापन और अन्य परेशानियां कोई नयी घटना नहीं है। लेकिन सच ये है कि बाढ़ से होनेवाली क्षति महज़ पानी भरने से लेकर पानी उतर जाने के दौरान के नुक़सान तक सीमित नहीं रहती। बाढ़ से होनेवाले नुकसान में एक बड़ा हिस्सा बाढ़ पीड़ितों के मन-मस्तिष्क पर लम्बे समय तक बाढ़ का सदमा समाये रहना भी है जिसे प्रायः नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
इस उपेक्षा को 2008 की भीषण कोसी बाढ़ से समझा जा सकता है, जिसको लेकर विश्व बैंक के वैश्विक आपदा न्यूनीकरण और स्थिति बहाली समूह ने बिहार सरकार के नवनिर्मित बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण सोसाइटी के साथ मिलकर एक व्यापक आवश्यकता मूल्यांकन किया था। इस मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य रिकवरी परियोजना के लिए प्राथमिकताओं को निर्धारित करना, आवास, कृषि, सड़कों और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख क्षेत्रों में नुकसान का आकलन करना और तात्कालिक, मध्यम और दीर्घकालिक आवश्यकताओं की पहचान करना था। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस आकलन में सिर्फ़ भौतिक ढांचों पर ज़्यादा ध्यान दिया गया। रिपोर्ट में स्वास्थ्य के आकलन में भी महज़ स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण पर ही ज़ोर दिया गया।
बाढ़ और लोगों की चिंताएं
कोसी नदी बेसिन क्षेत्र बिहार में 11,070 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। कोसी नदी बिहार के कटिहार समेत आठ ज़िलों से गुज़रती है और अक्सर बाढ़ लाती है।
बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं और मॉनसून में अत्यधिक बारिश पूरे कोसी क्षेत्र और विशेष कर कटिहार को बाढ़ के दोहरे प्रकोप से रूबरू होना पड़ता है। बाढ़ पीड़ितों के मन-मस्तिष्क पर ये गहरा असर छोड़ती है। किसी को घर जलमग्न रहने की चिंता सताती रहती है तो कहीं तीन सीजन के बजाये दो सीजन ही फसल उगा पाने की कसक छोटे-बड़े किसानों को चिंता में डाल देती है।
मनसाही ब्लॉक की चितोरिया पंचायत निवासी जीतेन्द्र पासवान बीते वर्षों के बाढ़ के अनुभवों को याद करते हुए बताते हैं कि बाढ़ आने से तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। लोगों को खुद की और परिवार की सुरक्षा की चिंता के साथ-साथ मवेशियों को बचाने की चिंता हर साल बाढ़ के प्रकोप के साथ बढ़ती ही जाती है। “हमारे इलाक़े में सर्पदंश और बाढ़ में फंसे परिवारों के सदस्यों को भूख से मरते देखना मन को विचलित किये रहता है,” वह बताते हैं, “प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा मिलना मुहाल है तो फिर मानसिक स्वास्थ्य तो बहुत दूर की बात है।”

बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति
कोसी क्षेत्र में बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका अहम मानी जाती है, परन्तु स्वास्थ्य और विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत कम संस्थाएं काम करती हैं। आत्मविश्वास फाउंडेशन के संस्थापक विजय कुमार बताते हैं कि लोगों में व्याप्त मानसिक तनाव, अवसाद और विशेषकर रोज़गार के लिए पलायन को मजबूर परिवारों में अपनों से बिछड़ने का दर्द साफ़ झलकता है पर फण्ड के अभाव के कारण हमलोग काउंसलर और प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ स्वयंसेवकों की टीम नहीं बना पाते हैं।
कटिहार के शाज़ फाउंडेशन के संस्थापक इन्तेसार आलम कहते हैं कि बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य की जांच तक की सुविधा नहीं होने के कारण ये समस्या अक्सर अनदेखी रह जाती है।
दोनों ही स्वयंसेवी संस्थाओं के संस्थापक मानते हैं कि उनकी जानकारी में उनके क्षेत्र में बाढ़ के दौरान राहत शिविरों में या बाढ़ का पानी उतरने के बाद समुदायों में मानसिक चिकित्सा के लिए आपदा मित्र या मनोचिकित्सक द्वारा काउंसलिंग नहीं दी गयी और न ही कभी टेली-मानस के प्रचार-प्रसार के लिए कोई कार्य किया गया।
टेली मानस, भारत सरकार की एक टोल-फ्री पहल है, जिसे अक्टूबर 2022 में शुरू किया गया गया। ये सेवा 24/7 चलती है। कोई भी व्यक्ति टोल-फ्री नंबर 14416 या 1800-891-4416 पर फोन कर मानसिक स्वास्थ्य सहायता ले सकता है। ये पूरी तरह नि:शुल्क है और फोन करने वालों की जानकारी गोपनीय रखी जाती है। इस पहल में लोगों को विशेषज्ञ परामर्श और दवा के लिए ई-प्रिस्क्रिप्शन दी जाती है।
बिहार में कुल तीन टेली-मानस केंद्र हैं। इनमें से एक केंद्र भागलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में चल रहा है। संस्था के अधीक्षक ने मेल के जरिए बताया कि संस्था के मनोचिकित्सा विभाग की निगरानी में टेली-मानस द्वारा तनाव, चिंता और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए परामर्श दिया जाता है जिसमें बाढ़ पीड़ित भी शामिल हैं।
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक
अकादमिक शोधकर्ता एंड्रू क्रैबट्री ने अपने अध्ययन में वर्ष 2008 की कोसी बाढ़ के 18 महीने बाद लोगों में रोज़गार ख़त्म होने और भविष्य की अनिश्चितता के कारण पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) के लक्षणों का ज़िक्र किया है। वह सुझाव के तौर पर व्यावसायिक सहायता और मनो-सामाजिक हस्तक्षेप को आपदा जोखिम न्यूनीकरण में एकीकृत करने पर ज़ोर देते हैं।
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान (बेंगलुरु) के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. दिनकरन दामोदरन बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन से बढ़ते और बदलते आपदा का स्वरूप मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। वह बताते हैं, “बाढ़ के दौरान रिलीफ कैम्प का घर से दूर होना, रोज़गार प्रभावित होना, घर बह जाना या क्षतिग्रस्त होना और अपनों को बाढ़ की चपेट में खोना बाढ़ पीड़ितों को भय, अवसाद और अनिश्चितताओं से भर देता है।”

वह मानसिक स्वास्थ्य के बिगड़ने के लक्षणों को रेखांकित करते हुए कहते हैं, “बाढ़ जोखिम वाले इलाकों में अगर किसी को अक्सर बुरे सपने, बाढ़ की भयावह यादें, बात-बात में बाढ़ से होनेवाले नुकसान की चिंता, नदी किनारे जाने से डर या किसी विशेष कार्य या स्थल पर जान-बूझ कर जाने से बचने की प्रवृत्ति बनी रहती है, तो इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। कई बार यह सीने में दर्द, जोड़ो में दर्द और अशांत मन, बेचैनी जैसे लक्षणों के रूप में भी देखा जा सकता है।”
वह सलाह देते हैं कि बाढ़ के 2-3 महीने बाद भी अगर किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण मौजूद हो तो उसे एक बार मनोचिकित्सक से पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर की जांच करानी चाहिए। लोग नज़दीकी सदर अस्पताल जाकर ज़िला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत मनोवैज्ञानिक और नैदानिक मनोचिकित्सक से परामर्श ले सकते हैं।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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