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जॉर्ज एवरेस्ट की पहल पर 1854 में बना मानिकपुर टीला उपेक्षा का शिकार

फारबिसगंज अनुमंडल अंतर्गत मानिकपुर स्थित ऐतिहासिक बुर्ज आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। देखरेख और रख-रखाव के अभाव में अब ये बुर्ज जर्जर होने लगा है।

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अररिया: अररिया जिले के फारबिसगंज अनुमंडल अंतर्गत मानिकपुर स्थित ऐतिहासिक बुर्ज आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। देखरेख और रख-रखाव के अभाव में अब ये बुर्ज जर्जर होने लगा है। बुर्ज पर अब झाड़ियां उगकर इसके अस्तित्व को खत्म कर रही हैं और इस स्थिति का जिम्मेदार जिला प्रशासन है क्योंकि ठीक एनएच 57 के बगल में बना ये बुर्ज आने जाने वाले लोगों की नजर से छुप नहीं सकता।

लेकिन, आज इसकी स्थिति इतनी खराब हो गई है कि इसके चारों ओर सीढ़ी के किनारे लगी लोहे की रेलिंग पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है।

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हालांकि इस बुर्ज को पुनर्जीवित करने के लिए 2022 में एसएसबी के द्वारा जीर्णोद्धार भी किया गया था। उसके बाद इसकी सूरत थोड़ी बदली थी। यहां एक तिरंगे स्थाई रूप से लगा दिया गया। लेकिन आज तक इसकी स्थिति बदल नहीं पाई है और यह अपना अस्तित्व होता नजर आ रहा है।


1854 रखी गई थी इसकी आधारशिला

डायरेक्टर जनरल ऑफ सर्वे सर जॉर्ज एवरेस्ट की पहल पर एसएस वाग ने 1854 में मानिकपुर टीले की आधारशिला रखी थी। तब पहाड़ों का मुआयना करने के लिए सर्वे हुआ था। त्रिकोणमितीय पद्धति से पहाड़ों का ऊंचाई निकाला गया था। मानिकपुर टीले से त्रिकोणमितीय पद्धति से पहाड़ों की ऊंचाई मापी गई थी। जब मानिकपुर टीले से एवरेस्ट को मापी गई थी तब उसकी ऊंचाई 29 हजार फीट था। तब एवरेस्ट को सबसे ऊंची वाली पहाड़ में शुमार किया गया था। सरकारी उपेक्षा के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर का यह ऐतिहासिक बुर्ज अपनी पहचान खो रहा है।

दो दशक पहले मिला था बुर्ज का रूप

इस टीले को दो दशक पहले तत्कालीन सांसद सुखदेव पासवान ने अपनी निधि से 11 लाख रुपये खर्च कर बुर्ज का रूप दिया था। उस समय इस बुर्ज की सुंदरता देखने योग्य थी। दूर-दूर से लोग इस बुर्ज को देखने आते थे। दूर से पटना के गोलघर जैसा दिखने वाला यह बुर्ज काफी दर्शकों के लिए उपयोगी साबित हो रहा था, क्योंकि उस समय इस बुर्ज से हिमालय पर्वत श्रृंखला के बीच कंचनजंगा का वह पहाड़ जो पूरी तरह से बर्फ से ढका होता था, साफ नजर आता था। लोग इस बुर्ज का ऐतिहासिक महत्व रखते हुए इसके पहचान को रखने की कोशिश में जुटे रहते थे। जिले के पर्यटक यहां आने भी लगे थे, लेकिन आहिस्ता आहिस्ता यह बुर्ज देखरेख के अभाव में खंडहर जैसा हो गया। लोग अब इसकी स्थिति को देखकर काफी चिंतित नजर आ रहे हैं।

सड़क बनाने के लिए इसे हटाने की थी योजना

पहले यह बुज सिर्फ मिट्टी के टीले के रूप में था। लेकिन जब एनच 57 का निर्माण शुरू हुआ, तो यह बुर्ज सड़क के बीचों बीच आ गया था। ठेकेदारों का कहना था कि इस मिट्टी के टीले को हटाकर सड़क को बीच से बनाया जाएगा। लेकिन उस समय बुर्ज की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों ने एकजुटता दिखाई थी।
फिर एक दशक पहले भी ऐसी ही नौबत आई। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना अंतर्गत ईस्ट वेस्ट कॉरिडोर के तहत फोरलेन रोड का निर्माण हो रहा था, तो यह बुर्ज रोड के बीच में आ गया था। निर्माण एजेंसी इसे तोड़ने के लिए तत्पर थी, मगर ग्रामीणों की एकजुटता को लेकर मानिकपुर टीले के पास फोरलेन को कर्व कर दिया गया। तब इस बुर्ज की जान बच पाई वरना यह ऐतिहासिक धरोहर सड़क के नीचे दबकर खत्म हो जाता।

लीगेसी ऑफ हेरिटेज पुस्तक में है इसका जिक्र

पर्वतारोही व फारबिसगंज निवासी स्वर्गीय कर्नल अजीत दत्त की लिखी लीगेसी ऑफ हेरिटेज पुस्तक में मानिकपुर बुर्ज का जिक्र है। पुस्तक में इस बुर्ज को माउंट एवरेस्ट की त्रिकोणमितीय पद्धति से ऊंचाई मापने का आधार बिंदु बताया गया है। कर्नल अजीत दत्त ने कहा था कि ज्योग्राफिकल सोसाइटी ऑफ लंदन के मैप में मानिकपुर की चर्चा है। मानिकपुर में सिर्फ मिट्टी का टीला दिखता था। लेकिन, इससे एवरेस्ट की ऊंचाई 29 हजार फीट मापी गयी थी। हिमालय का रेंज इस ओर करीब 24 सौ किलोमीटर है, जो पाकिस्तान से शुरू होता है। पाकिस्तान का नंगा पर्वत और अरुणाचल प्रदेश से सटे नामचे बरवा पर्वत इसके रेंज में रहा है।

स्थानीय लोगों की मांग थी कि ये पर्यटक स्थल में तब्दील हो। बुर्ज की खास बात यह कि एवरेस्ट सहित अन्य पहाड़ों को मापने वाला यह मानिकपुर बुर्ज अमर कथा शिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु की पंचायत के ठीक बगल में स्थित है। यहां के लोग चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित कर इसे पर्यटक स्थल में बदला जाए।

ऐसा नहीं है कि यह मानिकपुर का बुर्ज सिर्फ जिले वासियों के लिए ही पर्यटन के रूप में दिखता है। बल्कि इस रास्ते से कई ऐसे भ्रमणकारी निकले हैं जिन्होंने इस बुर्ज को जरूर नजदीक जाकर देखा है। ऐसे ही पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए साइकिल से पूरी दुनिया का भ्रमण करने निकले चीन के पर्यटक वर्ष 2021 में यहां से गुजरे थे। तीनों चीनी पर्यटक मानिकपुर स्थित टीला पहुंचे। उन्होंने टीले पर चढ़कर उसका जायजा लिया। इस दौरान जिला परिषद सदस्य स्थानीय दिलीप पटेल ने चीनी पर्यटकों का स्वागत करते हुए उन्हें पुष्प देकर स्वागत किया था। जिप सदस्य ने चीनी पर्यटकों को मानिकपुर टीले के महत्व के बारे बताया। जिप सदस्य दिलीप पटेल बताया कि यह मानिकपुर का वही बुर्ज है, जिसकी आधारशिला विगत 1854 में डायरेक्टर जनरल ऑफ सर्वे सरचार्ज एवरेस्ट ने रखी थी।

टीला पर भ्रमण के बाद सभी पर्यटक फारबिसगंज के रास्ते पटना के लिए निकल गए थे। इस दौरान साइकिल पर सवार सभी चीनी पर्यटकों को देखने के लिए जगह-जगह लोगों की भीड़ लगी रही। पर्यटकों की भाषा किसी को समझ में नहीं आ रही थी लेकिन लोग उन्हें देखने के लिए आते रहे।

भ्रमण में शामिल चीनी पर्यटक सोंगलीन ने बताया कि वह अपने मित्रों के साथ पर्यावरण संतुलन के लिए पूरे विश्व भ्रमण पर निकले हैं। वह पहले पटना के रास्ते वाराणसी जाएंगे और फिर दिल्ली के बाद पाकिस्तान जाएंगे। भ्रमण के दौरान अंतिम देश नेपाल जाने की भी बात उन्होंने बताई थी।

इसी तरह से कई और देसी भी पर्यटक भी इस टीले पर जाकर अपनी तस्वीर खिंचवा चुके हैं और उनका मानना है कि एनएच 57 के बगल में होने के कारण यह काफी महत्वपूर्ण और दर्शनीय स्थल है।

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