बिहार में नीलगाय और किसान के बीच टकराव आम है। नीलगायों का झुंड सबसे पौष्टिक फसलों—पारंपरिक दालों जैसे मसूर, अरहर और मूंग—को अपना निशाना बनाता है। अपनी फसल बचाने की जद्दोजहद में, किसान खेती का अपना पूरा तरीका बदल दे रहे हैं। वे आसानी से नष्ट होने वाली पारंपरिक दालों की खेती छोड़ रहे हैं, और उनकी जगह गेहूं और धान जैसी सख्त, लेकिन बहुत अधिक पानी सोखने वाली फसलें लगा रहे हैंI
पारंपरिक दलहनी फसलें प्रकृति की डॉक्टर होती हैं; वे प्राकृतिक रूप से मिट्टी में नाइट्रोजन घोलकर उसे जीवन देती हैं। दालों के बिना, मिट्टी को खुद को ठीक करने का समय और पोषण नहीं मिलता।
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बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्य में दलहनों का उत्पादन कम रहा है और मुख्य रूप से घरेलू खपत के लिए ही किया जाता है।
आंकड़ों के अनुसार बिहार में दलहन का रकबा करीब 6% है, 2020-21 से 2022-23 के बीच दलहन के खेती के रकबे में निरंतर गिरावट दर्ज़ की गई है, 2023-24 में कुल खेती का रकबा बढ़ा, तो दलहन के रकबे में भी थोड़ी बढ़ोत्तरी आई। बिहार में दलहन की खेती का क्षेत्रफल 2022-23 में 433.9 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 2023-24 में 468 हजार हेक्टेयर हो गया। हालांकि, इसी अवधि के दौरान विभिन्न दलहनों की पैदावार में काफी गिरावट आई। 2024-25 में कुल खेती का रकबा बढ़ने के बावजूद दलहन के रकबे में गिरावट दर्ज़ की गई।
दलहन की पैदावार में पटना और नालंदा के बाद भोजपुर तीसरा बड़ा जिला है, लेकिन भोजपुर में दलहन का रकबा तेज़ी से घट रहा है। 2022-23 में यहाँ 9.6 हज़ार हेक्टर में दाल की खेती हो रही थी, जो 2023-24 में घट कर कर 8 हज़ार हेक्टर और 2024-25 में घटकर 7.6 हज़ार हेक्टर हो गयी है।
नीलगाय आमतौर पर 75 से 300 मीटर की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका शरीर घोड़े जैसा और सिर मृग (एंटीलोप) जैसा होता है। शरीर का रंग गहरा नीला या हल्का भूरा होने की वजह से इसे नीलगाय कहा जाता है। इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि इसमें “गाय जैसी भूख, घोड़े जैसी रफ्तार और कुत्ते जैसी सतर्कता” होती है।
Wildlife Institute of India के साइंटिस्ट के NPS चौहान के एक शोध के अनुसार, भारत में कुछ जंगली प्रजातियों की स्थानीय स्तर पर अत्यधिक बढ़ती संख्या एक गंभीर प्रबंधन समस्या बनकर उभरी है। इसका मुख्य कारण यह है कि कई प्रजातियाँ अपना प्राकृतिक आवास खो चुकी हैं और मानव-परिवर्तित वातावरण के अनुसार खुद को ढाल चुकी हैं। लंबे समय तक चलने वाली प्रजनन गतिविधि और प्राकृतिक शिकारी जीवों की कमी के कारण नीलगायों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है।
आगे यह भी बताया गया है कि नीलगाय अधिकांश कृषि फसलों को भारी नुकसान पहुँचाने में सक्षम होती हैं। गेहूँ, चना और सरसों जैसी फसलों को नुकसान केवल चरने से ही नहीं, बल्कि खेतों में चलने-फिरने, रौंदने और वहीं आराम करने के कारण भी होता है। जिन क्षेत्रों में नीलगायों की संख्या कम है, वहाँ गेहूँ, चना और मूंग की फसलों को क्रमशः लगभग 20–30%, 40–55% और 40–45% तक नुकसान होता है। जबकि जिन क्षेत्रों में नीलगायों की संख्या अधिक है, वहाँ यही नुकसान बढ़कर गेहूँ में 35–60%, चना में 50–70% और मूंग में 45–60% तक पहुँच जाता है।
बिहार के 38 में से 31 ज़िलों में नीलगाय का प्रभाव माना जाता है। 2024 में नीलगाय की अनुमानित संख्या करीब 3 लाख थी। बिहार सरकार के अनुरोध पर, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2015 में नीलगाय को हानिकारक जीव (वर्मिन) की श्रेणी में रखा, जिससे इस जानवर का बड़े पैमाने पर शिकार का रास्ता साफ हो गया। वर्ष 2022–23 में 6,648 नीलगायों को मारा गया, जबकि 2023–24 में यह संख्या 3,329 और 2024-25 के फ़रवरी तक 4279 नीलगायों को मार गिराया गया था।
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