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जलवायु परिवर्तन के चलते बिहार में फिर बढ़ रही फाइलेरिया?

पिछले साल अगस्त में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक, 1901 से 2022 तक के अधिकतम तापमान और बारिश के आंकड़े सभी जिलों में अधिकतम तमापन में बढ़ोतरी के संकेत देते हैं। वहीं, बारिश के पैटर्न में आम तौर पर गिरावट दिख रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल के जलवायु अनुमान बताते हैं कि 2070 तक ज़्यादातर जिलों में अधिकतम तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही मानसून और सर्दियों में बारिश के पैटर्न में भी उतार-चढ़ाव होगा।

cropped nisha kumari.jpeg Reported By Nisha Kumari |
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is filariasis increasing again in bihar due to climate change
फाइलेरिया मरीज़ कौशल्या देवी (बाएं) व आशा कार्यकर्ता और फाइलेरिया की मरीज़ प्रेमा देवी (दाएं)

बिहार के रोहतास जिले में अक्टूबर की एक उमस भरी दोपहर है। तुरंत बारिश खत्म हुई है, जिससे हवा में नमी है। रणविजय सिंह पैर में दर्द और बुखार की शिकायत लेकर डेहरी के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (सीएससी) आये हैं। वह कहते हैं, “एक दो साल से बारिश का मौसम आते ही पांव में दर्द और बुखार आने लगता है। पहले दर्द बढ़ने पर लोकल फार्मेसी से दवा लेकर खा लेता था, पर इस बार दर्द बढ़ने पर हॉस्पिटल आया हूँ।”


रणविजय लिम्फेडेमा के मरीज़ हैं। लिम्फेडेमा, हाथ-पैरों में दीर्घकालिक सूजन की बीमारी है। यह बीमारी लिम्फेटिक फाइलेरियासिस (एलएफ) नाम के परजीवी के संक्रमण से होती है, जिसे भारत में आमतौर पर हाथी पांव या एलिफेंटियासिस के नाम से जाना जाता है। फाइलेरियासिस एक मच्छर-जनित बीमारी है, जो क्यूलेक्स मच्छर से फैलती है। इसे आम बोलचाल में फाइलेरिया भी कहा जाता है।

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फाइलेरियासिस क्या है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, लिम्फेटिक फाइलेरियासिस एक ऐसी बीमारी है, जो वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडे में हाशिये पर है, क्योंकि ये रोग खराब स्वच्छता वाली जगहों पर रहने वाली गरीब आबादी को अपनी चपेट में लेती है। ये इन्फेक्शन तब होता है जब मच्छरों के जरिए परजीवी इंसानों में फैलता हैं। ये संक्रमण आमतौर पर बचपन में होता है और लिम्फेटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है। लिम्फेटिक सिस्टम, दरअसल लसीका तंत्र है, जो ऊतकों से अतिरिक्त तरल पदार्थ, अपशिष्ट और रोगजनकों को छानकर रक्तप्रवाह में वापस लाता है और संक्रमण से लड़ता है।


फाइलेरियासिस और अन्य उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारियां बिहार जैसे उष्णकटिबंधीय इलाकों के गरीब समुदायों में होती हैं। अनुमान है कि दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोग इन बीमारियों से संक्रमित हैं।

50 वर्षीय रणविजय को पहली बार लगभग 20-25 साल पहले उनके दाहिने हाथ में फाइलेरिया का पता चला था। 2023-24 में उन्हें बुखार और बाएं पैर में दर्द होने लगा। वह कहते हैं, “एक दवा दुकानदार ने बताया कि पैरों में भी फाइलेरिया हो गया है।” लेकिन, रणविजय तब तक अस्पताल नहीं गए। पिछले साल जब दर्द बेतहाशा बढ़ गया, तो वे कम्युनिटी हेल्थ सेंटर आए।

ranvijay singh sits outside the community health centre in rohtas
रोहतास में कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के बाहर बैठे रणविजय सिंह

ज़्यादातर मरीज़ों में फाइलेरिया के दर्दनाक और गंभीर रूप से विकृत करने वाले लक्षण लगभग 10-15 साल बाद दिखते हैं और इससे ज़िंदगी में हमेशा के लिए विकलांगता हो सकती है। दुनिया भर के 39 देशों के 65.7 करोड़ लोगों में इस बीमारी का खतरा है और इसका आधे से ज्यादा हिस्सा यानी लगभग 62% (40.43 करोड़) हिस्सा भारत में है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 2024 तक भारत में लिम्फोएडेमा (त्वचा और मांसपेशियों में सूजन) के 6.20 लाख से ज़्यादा मामले और हाइड्रोसील (अंडकोष में सूजन) के 1.21 लाख से ज़्यादा मामले सामने आए हैं।

ज़िला स्तरीय सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अकेले रोहतास में 2025 तक फाइलेरिया के 2,081 केस थे, जो 2024 के 1792 केस से ज़्यादा हैं। गौरतलब हो कि भारत ने 2027 तक इस बीमारी को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य रखा है, ऐसे में इस बीमारी के आंकड़ों में इजाफा चिंता की बात है।

बिहार में फाइलेरिया के स्टेट एडवाइजर डॉ. अनुज रावत कहते हैं, “मामलों में बढ़ोतरी को अक्सर दोबारा बीमारी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन भारत में अभी के फाइलेरिया के ज़्यादातर मामले नए इन्फेक्शन नहीं हैं, बल्कि बचपन में मिले पुराने मामले हैं यानी कि ये मामले लगभग 10-15 साल पुराने हैं।”

भारत ने साल 2004 में राष्ट्रीय फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के तहत सामूहिक स्तर पर दवा देना शुरू किया ताकि खून में माइक्रोफाइलेरिया को कम करके फाइलेरिया का संक्रमण रोका जा सके।

डॉ. अनुज कहते हैं, “अगर सामूहिक स्तर पर दवा देने के कार्यक्रम के पहले पांच सालों में हमने अपनी आबादी को भारत सरकार और डब्ल्यूएचओ द्वारा बताई गई डोज़ दी होती, तो निश्चित रूप से लिम्फेटिक फाइलेरियासिस का संक्रमण रुक गया होता और हमें ये मौजूदा मामले नहीं देखने को मिलते। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका।”

2004 में तय किया गया लक्ष्य पूरा नहीं हुआ और इसे साल 2015 तक और बाद में 2017 तक बढ़ा दिया गया। डब्ल्यूएचओ ने शुरू में 2020 का टारगेट तय किया था, जिसे बाद में बढ़ाकर साल 2030 कर दिया गया।

नेशनल सेंटर फॉर वेक्टर-बॉर्न डिज़ीज़ कंट्रोल के अनुसार, बिहार के सभी 38 ज़िले फाइलेरिया के लिए एंडेमिक (एक ऐसी बीमारी जो किसी इलाके में आबादी में हमेशा मौजूद रहती है, आमतौर पर पूरे साल) हैं। डॉ. अनुज बताते हैं, “बिहार में लिम्फेटिक फाइलेरियासिस के लगभग 1.58 लाख मामले हैं, जो भारत में कुल मामलों का 25% है। वहीं, भारत में हाइड्रोसिल के कुल मामलों का 40% बिहार में है।”

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

जलवायु परिवर्तन, एक वैश्विक घटना के तौर पर हमारे घरों के बहुत करीब आ गया है। दूसरी पर्यावरणीय परिस्थितियों (पर्यावरण, वातावरण या परिवेश से संबंधित) के उलट फाइलेरिया जैसी मच्छर-जनित बीमारियां क्यूलेक्स मच्छरों से फैलती हैं। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि मच्छर जनित बीमारियों पर जलवायु परिवर्तन के असर को समझने के लिए, हमें स्थानीय स्तर पर मच्छरों के प्रजनन चक्र और इकोसिस्टम (पर्यावरण तंत्र) को समझने की जरूरत है।

भारतीय मौसमविज्ञान विभाग के बिहार केंद्र में वैज्ञानिक आशीष कुमार कहते हैं, “पिछले 5-10 सालों में, बिहार का जलवायु धीरे-धीरे बदला है। हीटवेव, अनियमित बारिश, बिजली गिरना और शीतहलर ज़्यादा बार आने लगी हैं। इन चरम घटनाओं के होने की तीव्रता भी बढ़ गई है। इसलिए हम कोई अंदाज़ा लगाने लायक पैटर्न नहीं देख सकते।”

आशीष ने बताया कि आम तौर पर, दक्षिण बिहार में उत्तर बिहार के मुकाबले कम बारिश होती थी। लेकिन, 2025 में दक्षिण बिहार में ज़्यादा बारिश हुई, जबकि उत्तर बिहार में कम बारिश हुई। इससे पता चलता है कि मॉनसून का बर्ताव कितना अप्रत्याशित हो गया है। बिहार की आर्द्रता के लिए भी यही बात लागू होती है। बढ़ते तापमान से हवा में नमी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है। इस वजह से अब हमलोग बारिश न होने पर भी ज़्यादा नमी देख रहे हैं। इससे कभी-कभी अचानक तेज़ बारिश भी हो सकती है।

बिहार की पारिस्थितिकी, क्यूलेक्स जैसे मच्छरों के फूलने-फलने का माहौल बनाती है। डॉ. अनुज बताते हैं, “क्यूलेक्स एक जंगली मच्छर है। यह गंदी जगहों पर रहता है और हमारे राज्य में सफाई की जो हालत है और जिस तरह से शहरीकरण हो रहा है और हम अपने आस-पास लगातार गंदा पानी जमा करते रहते हैं, वे इन मच्छरों के पनपने के लिए एकदम सही जगहें हैं। और अब हम जलवायु परिवर्तन भी देख रहे हैं, जिससे क्यूलेक्स मच्छरों के रहने की जगहें बढ़ रही हैं। इससे इन्हें फैलने का भी पर्याप्त समय मिल रहा है।”

night blood survey for filariasis eradication
फाइलेरिया उन्मूलन के लिए नाइट ब्लड सर्वे

पिछले साल अगस्त में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक, 1901 से 2022 तक के अधिकतम तापमान और बारिश के आंकड़े सभी जिलों में अधिकतम तमापन में बढ़ोतरी के संकेत देते हैं। वहीं, बारिश के पैटर्न में आम तौर पर गिरावट दिख रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल के जलवायु अनुमान बताते हैं कि 2070 तक ज़्यादातर जिलों में अधिकतम तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही मानसून और सर्दियों में बारिश के पैटर्न में भी उतार-चढ़ाव होगा।

तापमान में ये बढ़ोतरी मच्छर जनित रोगों की इजाफा में भूमिका निभाती है। ICMR में वेक्टर कंट्रोल रिसर्च सेंटर के डायरेक्टर डॉ. अश्विनी कुमार ने बताया, “तापमान में एक डिग्री से भी कम की बढ़ोतरी से मच्छर ऊपर की ओर बढ़ सकते हैं और ज़्यादा ऊंचाई पर जगह बना सकते हैं और इस तरह जैसे-जैसे उनका फैलाव बढ़ेगा, फाइलेरिया के संक्रमण का खतरा भी बढ़ेगा।”

चिंता देवी डेहरी ब्लॉक के लोहारडीह गांव की एक आशा कार्यकर्ता हैं। वह याद करती हैं, “2-3 साल पहले जब बारिश होती थी, तब सारे मच्छर मर जाते थे, पर अब ऐसा नहीं है। अब मच्छर नहीं मरते चाहे कितनी भी बारिश हो जाए या हवा चले।”

लेकिन बिहार जैसे राज्यों में जलवायु परिवर्तन का मतलब अब सिर्फ़ तापमान का बढ़ना नहीं है। NRDC इंडिया में क्लाइमेट रेजिलिएंस और हेल्थ के लीड अभियंत तिवारी कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन मच्छर से होने वाली बीमारियों के जोखिम को कई गुणा बढ़ा देती है। बारिश के बदलते पैटर्न और बढ़ती नमी, डेंगू जैसी गंभीर बीमारियों और फाइलेरिया जैसे पुराने खतरों, दोनों के फैलने की आशंका को असरदार तरीके से बढ़ा रही है। हम एक खतरनाक तालमेल देख रहे हैं, जहाँ नमी मच्छरों का ज़िंदा रहना पक्का करती है, जबकि गर्मी परजीवियों का विकास तेज करती है।”

एनआरडीसी एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो दुनिया भर के लोगों को हवा, पानी और जंगलों पर अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है।

62 साल की कौशल्या देवी, डेहरी ब्लॉक के लोहारडीह गांव की फाइलेरिया की मरीज़ हैं। उन्हें पिछले साल अगस्त में पहली बार फाइलेरिया के बारे में पता चला। पता चलने से तीन महीने पहले उनके पैर में बार-बार सूजन के साथ बुखार आने लगा था। उन्होंने होम्योपैथिक दवाएं खाईं, लेकिन उनसे कुछ ही दिनों तक आराम मिला। वह कहती हैं, “जब भी मेरा पैर पानी में जाता है तो बहुत ज़्यादा दर्द होता है। इससे दर्द व सूजन और बढ़ जाती है। बारिश के मौसम में मुझे सबसे ज़्यादा तकलीफ होती है।”

डॉ. अनुज कहते हैं, “मौसम में बदलाव से फाइलेरिया के मरीज़ों में सूजन की गंभीर समस्याएँ और बिगड़ सकती हैं। बारिश के पानी के संपर्क में आने से घाव बढ़ जाते हैं, जिससे संक्रमण और दर्द होता है।”

संक्रमण खत्म करने में चुनौतियां

बिहार की ज़्यादातर आबादी गांवों में रहती है, जहां साफ-सफाई अभी भी एक बड़ी चुनौती है। क्यूलेक्स जैसे मच्छरों के लिए, चाहे हम कितने भी साफ हों या हमारे शहर कितने भी साफ हों, बारिश और नमी के पैटर्न में थोड़ा सा बदलाव मच्छरों के पनपने के लिए अच्छा माहौल बना देता है। हर मच्छर खतरनाक नहीं होता, लेकिन अगर कोई मच्छर किसी मरीज़ के संपर्क में आता है और उसे काटता है, तो उसमें बीमारी फैलने का खतरा होता है। इसलिए फाइलेरिया को अक्सर “पॉकेट डिज़ीज़” भी कहा जाता है।

डॉ. अनुज कहते हैं, “पहले, हमारा प्रोग्राम इतने सालों तक इसलिए प्रभावित रहा क्योंकि हम हमेशा ज़िले को एक इम्प्लीमेंटेशन यूनिट मानते थे। लेकिन 2023 में ब्लॉकस्तरीय रणनीति अपनाई गई, और अब ब्लॉक को एक इम्प्लीमेंटेशन यूनिट माना जाता है। हम माइक्रोफाइलेरिया संक्रमण देखते हैं। अगर संक्रमण दर 1% से कम है तो उन ज़िलों को सामुदायिक तौर पर दवा देने के कार्यक्रम से छूट दी जा सकती है। अगर हमारी कुल 100% योग्य आबादी का 80% से 90% हिस्सा भी दवा का इस्तेमाल करता है, तो निश्चित रूप से 4 से 5 साल में हम दिखा पाएंगे कि इसका संक्रमण कम हो गया है।”

सरकारी कार्यक्रम और दवाओं के बारे में जानकारी की कमी इस बीमारी के संक्रमण को रोकने में एक और चुनौती है। रोहतास ज़िले के अकोढ़ीगोला ब्लॉक के टेट्रादह की रहने वाली 45 साल की प्रेमा देवी, एक आशा कार्यकर्ता और फाइलेरिया की मरीज़ हैं। वह कहती हैं, “स्थानीय लोग सरकार की दी गई इन दवाओं पर भरोसा नहीं करते। उन्हें डर लगता है कि सरकारी दवा से उन्हें नुकसान हो सकता है। मैं खुद फाइलेरिया की मरीज़ हूँ, और जब मैं समझाने की कोशिश करती हूँ, तो वे कहते हैं कि आप दवा इसलिए लेती हैं क्योंकि आपको यह बीमारी है। हम यह दवा क्यों लें?”

सरकारी कार्यक्रम के तहत हर साल दो बार दवाइयां दी जाती हैं। डॉ. अनुज बताते हैं, “अभी 4 जिलों – अररिया, किशनगंज, मधेपुरा और अरवल को इस कार्यक्रम से छूट मिली हुई है। वहां, माइक्रोफाइलेरिया रेट 1% से कम है क्योंकि दवा का सेवन ज़्यादा था।”

filaria mda elimination drive

नीति की कमियां

भारत के पास एक समर्पित राष्ट्रीय मच्छर-जनित रोग योजना और एक जलवायु परिवर्तन शमन और अनुकूलन योजना है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना ​​है कि अभी भी वे नीतिगत स्तर पर दोनों को जोड़ने में सक्षम नहीं हो सके हैं।

डॉ. अनुज कहते हैं, “इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च और नेशनल सेंटर फ़ॉर वेक्टर बोर्न डिज़ीज़ कंट्रोल जैसी रिसर्च संस्थाएँ परजीवी फैलाने वाले कीटों और उनके पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन कर रहे हैं और साथ ही मच्छरों में फ़ाइलेरियल डीएनए का पता लगा रहे हैं।

“मेरा मानना ​​है कि जलवायु से होने वाली मच्छर-जनित बीमारी के जोखिम पर ध्यान देने के लिए जलवायु आंकड़ों को रोगों की निगरानी से जोड़ने वाला एक समर्पित ढांचा होना ज़रूरी है,” उन्होंने कहा।

अभियंत कहते हैं कि अगर सबसे सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित लोगों, खासकर जलवायु परिवर्तन की वजह से बेघर हुए लोगों की रक्षा करना है, तो हमें आपदा आने से पहले ही काम करना होगा। योजना बनाने, चेतावनी देने और जानें बचाने के लिए वास्तविक समय के मौसम डेटा का इस्तेमाल करना चाहिए।

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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निशा कुमारी एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह लॉन्ग-फॉर्म और इन्वेस्टिगेटिव फॉर्मेट के माध्यम से पर्यावरण, पब्लिक हेल्थ और सोशल जस्टिस से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं—खासकर इस बात पर कि ये मुद्दे जाति, जेंडर और वर्ग से कैसे जुड़े हैं।

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