आप फर्ज करिए कि बिहार के किसी सरकारी विभाग में कोई टेंडर निकला है और दर्जनों कंपनियों ने ठेके के लिए टेंडर भरा है और उनमें से एक कंपनी को टेंडर मिल गया है। पूरी टेंडर प्रक्रिया को आप देखेंगे, तो पहली नजर में लगेगा कि प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई होगी। मगर, हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बिहार के एक आईएएस संजीव हंस के खिलाफ जांच की, तो पता चला कि कई सरकारी विभागों में प्रोजेक्ट्स को लेकर टेंडर प्रक्रिया में भारी अनियमितता बरती गई और एक व्यवस्थित तरीके से गोरखधंधा किया गया।
इस पूरे गोरखधंधे के खुलासे के पीछे साल 2023 में संजीव हंस और पूर्व राष्ट्रीय जनता दल (राजद) विधायक गुलाब यादव के खिलाफ दर्ज हुई एक एफआईआर है। ये एफआईआर पटना के रूपसपुर थाने में दानापुर कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दर्ज हुई थी। एफआईआर एक महिला वकील ने दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने संजीव हंस और गुलाब यादव पर कई बार गैंगरेप करने के संगीन आरोप लगाये थे।
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महिला वकील ने अपनी शिकायत में कहा था कि कुछ वकीलों ने उनका संपर्क विधायक गुलाब यादव से कराया था। गुलाब यादव ने महिला वकील से कहा था कि वह उन्हें बिहार महिला आयोग का चेयरमैन बना देगा और महिला को फरवरी 2016 में बायोडाटा लेकर अपने फ्लैट में बुलाया था। वहां गुलाब यादव ने कथित तौर पर बंदूक की नोंक पर महिला वकील से रेप किया और बाद में उसकी मांग में सिंदूर डालकर कहा कि उन्होंने उससे शादी कर ली है और कोर्ट में रजिस्ट्री वह अपनी पत्नी को तलाक देने के बाद कराएंगे। इसके बाद 8 जुलाई 2017 को गुलाब यादव ने महिला वकील को पुणे बुलाया, जहां उन्होंने महिला का संपर्क संजीव हंस से कराया। महिला की शिकायत के मुताबिक, पुणे में संजीव हंस और गुलाब यादव दोनों ने मिलकर उससे गैंगरेप किया। महिला ने शिकायत में बताया था कि गैंगरेप के चलते वह गर्भवती हो गई थी और उसे एक बच्चा भी हुआ।
इस शिकायत के खिलाफ संजीव हंस, पटना हाईकोर्ट गये, तो पटना हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पूरी परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट का विचार है कि आवेदनकर्ता (आरोपी) के खिलाफ रेप का केस नहीं बनता है क्योंकि अव्वल तो इस मामले में एफआईआर, घटना होने के काफी समय बाद दर्ज कराई गई व एफआईआर पढ़कर लगता है कि शिकायकर्ता ने झूठी कहानी बनाई है। कोर्ट ने संजीव हंस के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया।
जो एफआईआर कोर्ट ने रद्द की, उसी से फंसे संजीव हंस
रूपसपुर थाने में दर्ज उस एफआईआर में पुलिस ने इंडियन पीनल कोड (अब भारतीय न्याय संहिता) की धारा 420 भी लगाई थी, जो धोखाधड़ी से जुड़ी हुई है।
दिलचस्प है कि रूपसपुर थाने में दर्ज एफआईआर, जिसे पटना हाईकोर्ट ने रद्द कर दी थी, के आधार पर ईडी ने प्राथमिक जांच की व बिहार की विशेष निगरानी इकाई (स्पेशल विजिलेंस यूनिट) में संजीव हंस व गुलाब यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। ईडी सूत्रों ने बताया कि विजिलेंस में दर्ज एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की गई और जांच में पाया गया कि संजीव हंस ने बिहार सरकार में और केंद्र सरकार में विभिन्न पदों पर रहते हुए भ्रष्ट तरीकों से अकूत पैसे बनाए। ईडी की जांच में पता चला कि वर्ष 2018 से 2023 के बीच संजीव हंस ने भ्रष्ट तरीके से रुपये बनाए।
ईडी ने इस मामले में पिछले साल अक्टूबर में संजीव हंस को गिरफ्तार किया और पूछताछ के बाद 16 दिसम्बर को इस मामले में पहली छापेमारी की। ईडी ने छापेमारी कर प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 के तहत संजीव हंस और उनके सहयोगियों प्रवीण चौधरी, पुष्पराज बजाज और उनके परिवारों के नाम सात अचल संपत्तियों – नागपुर में जमीनों के तीन टुकड़े, दिल्ली में एक और जयपुर में तीन फ्लैट को अटैच किया जिनकी अनुमानित कीमत लगभग 23.72 करोड़ रुपये है। इसके अलावा ईडी ने विभिन्न बैंक खातों में करोड़ों रुपये भी पाये और उन्हें फ्रीज किया।
16 दिसम्बर की कार्रवाई को लेकर ईडी ने बताया कि जांच में पता चला कि संजीव हंस कुछ निजी व्यक्तियों और संस्थाओं के साथ मिलकर भ्रष्ट आचरण में लिप्त हैं और धनशोधन में उनके सहयोगियों की भूमिका भी है। इसी के मद्देनजर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, जयपुर, पटना, पुणे, चंडीगढ़, अमृतसर, नागपुर में विभिन्न स्थानों पर तलाशी ली गई। तलाशी अभियान के दौरान, संजीव हंस के एक करीबी सहयोगी के परिवार के सदस्यों के नए खोले गए डीमैट खातों में पाए गए 60 करोड़ रुपये (लगभग) मूल्य के शेयर और उनमें 6 करोड़ रुपये (लगभग) की भारी नकदी जमा वाले 70 बैंक खातों को फ्रीज किया गया। इसके अलावा, इस मामले में कुल जब्ती में संजीव हंस के पटना और दिल्ली परिसरों से बरामद क्रमशः 80 लाख रुपये और 65 लाख रुपये की कीमत के सोने के गहने, लग्जरी घड़ियां और 25 लाख रुपये की अस्पष्टीकृत नकदी शामिल हैं। ईडी के मुताबिक, कुल 1.07 करोड़ रुपये, 11 लाख रुपये (लगभग) मूल्य के 13 किलोग्राम चांदी के बुलियन और 1.5 किलोग्राम सोने के बुलियन-आभूषण, 1.25 करोड़ रुपये (लगभग) मूल्य के आभूषण और 20 लाख रुपये मूल्य की विदेशी मुद्रा उनके सहयोगियों के परिसरों से जब्त की गई।
‘100 करोड़ रुपये की संपत्ति बनाई’
ईडी की एफआईआर के अनुसार, संजीव हंस ने अनैतिक तरीके से रुपये उगाही कर लगभग 100 करोड़ रुपये की संपत्तियां बनाई। इनमें से 60 करोड़ रुपये उन्होंने बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड के चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर रहते हुए एक इलेक्ट्रिकल कंपनी को स्मार्ट मीटर सप्लाई करने का 3300 करोड़ रुपये का ठेका दिलाने के एवज में लिये।
दिसम्बर में ही प्रवर्तन निदेशालय ने संजीव हंस व गुलाब यादव समेत पांच लोगों के खिलाफ विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल किया था। लेकिन कोर्ट ने इस मामले में संज्ञान नहीं लिया था क्योंकि वह बिहार सरकार से कार्रवाई की रजामंदी चाह रहा था। लगभग चार महीने बाद यानी इस साल अप्रैल में बिहार सरकार ने कार्रवाई की रजामंदी दे दी जिसके बाद कोर्ट ने सुनवाई शुरू की।
संजीव हंस बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। मूल रूप से वह पंजाब के रहने वाले हैं। उनके पिता भी सिविल सेवा में थे, तो जाहिर तौर पर उनकी रूचि भी सिविल सेवा में जगी और बीटेक करने के बाद उन्होंने यूपीएससी (यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन) की तैयारी शुरू कर दी और वर्ष 1997 में यूपीएससी क्रैक कर आईएएस बन गये। बताया जाता है कि उनकी पहली नियुक्ति बांका जिले में एसडीएम के पद पर हुई। इसके बाद वह विभिन्न जिलों के डीएम बने। इसके बाद वह बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग, स्वास्थ्य विभाग, सामान्य प्रशासन विभाग, ऊर्जा विभाग समेत कई विभागों में शीर्ष पदों पर रहे। वह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी अफसरों में से एक माने जाते हैं। यही वजह रही कि विभिन्न विभागों में उन्हें न सिर्फ शीर्ष पद मिले, बल्कि कई नई परियोजनाएं शुरू करने का भी श्रेय उनको मिला।
जब राम विलास पासवान मोदी सरकार में केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्री थे, तो संजीव हंस उनके निजी सचिव हुआ करते थे। रिकॉर्ड बताते हैं कि जुलाई 2014 से मई 2019 यानी लगभग पांच साल तक संजीव हंस, राम विलास पासवान के निजी सचिव थे।
ईडी ने अपनी चार्जशीट में बताया कि नेशनल कंज्यूमर डिसप्युट्स रिड्रेसल कमिशन (एनसीडीआरसी), जो उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अधीन आता है, में मुंबई की एक रियल्टी कंपनी का मामला चल रहा था, जिसमें कंपनी के पक्ष में फैसला दिलाने के एवज में संजीव हंस ने एक करोड़ रुपये घूस लिये थे।
रिशु श्री, जिसने मध्यस्थ की भूमिका निभाई
टेंडर के इस खेल के संजीव हंस इकलौते खिलाड़ी नहीं हैं। ईडी की जांच में लगभग आधा दर्जन विभागों के अधिकारियों की मिलीभगत सामने आई है। ईडी सूत्रों ने बताया कि कम से कम सात अधिकारियों के नाम सामने आये हैं, जिन्होंने टेंडर भरने वाली कंपनियों से घूस लेकर उनके टेंडर को पास कर उन्हें ठेके दिये और उनके बिल पास किये। उनके ठिकानों पर सर्च ऑपरेशन चलाकर 11.68 करोड़ रुपये नकद के अलावा बहुत सारी संपत्तियों के दस्तावेज बरामद किये गये।
ईडी के सूत्रों के मुताबिक, घूस देकर अपना टेंडर पास करवाने की इच्छुक कंपनियां संबंधित विभागों के उन अफसरों को घूस दिया करती थीं, जिनके पास टेंडर पास कराने का अधिकार रहता था। लेकिन, ये कंपनियां सीधे इन अफसरों से संपर्क नहीं कर करती थीं। ये लोग एक व्यक्ति के मार्फत अफसरों तक पहुंचते थे और इस व्यक्ति की सत्ता के गलियारे में गहरी पैठ है, लेकिन दिलचस्प है कि वे व्यक्ति न तो सरकारी अफसर है और न ही किसी कंपनी का मालिक। बताया जाता है कि यही व्यक्ति टेंडर के इस पूरे खेल का असली खिलाड़ी है और वो व्यक्ति है रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशु श्री।
बताया जाता है कि रिशु श्री, संजीव हंस समेत अन्य सरकारी अफसरों के काफी करीब था और वह जिस कंपनी की अनुशंसा करता था, टेंडर उसी कंपनी को मिलता था और इसके बदले वह अफसरों को कंपनी से पैसे दिलवाता था। यानी कि वह अधिकारियों और ठेके की ख्वाहिशमंद कंपनियों के बीच कड़ी का काम करता था तथा इसके बदले कंपनियों से कमिशन लेता था। इतना ही नहीं, उसने कई कंपनियों में निवेश कर रखा था, जिन्हें सरकारी कामों का ठेका मिला हुआ था।
पूरे मामले की जांच अब भी जारी है और ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़े सरकारी अफसर जांच की जद में आ सकते हैं।
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