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बदलते मौसम में समस्तीपुर के किसानों का फलों की ओर बढ़ता कदम

वित्तवर्ष 2023-2024 में बिहार में 42.7 हेक्टेयर में केले की खेती हुई जिससे 1903 टन केले का उत्पादन हुआ। वहीं, समस्तीपुर की बात करें, तो यहां 2.41 हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों ने केले की खेती की, जिससे 111.34 टन केला उत्पादित हुआ, जो राज्य के कुल उत्पादन का 5.9% है।

cropped ramjee kumar.jpeg Reported By Ramjee Kumar |
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a fruit farmer in samastipur bihar

बिहार: समस्तीपुर जिले के पूसा के मलिकौर गांव के रहने वाले किसान अनोज राय अपने खेत की मेड़ पर खड़े हैं। एक तरफ अनाज की फसल लगी है और दूसरी तरफ फलों के पेड़। उन्हें अनाज की फसलों से उम्मीद नहीं है। वह कहते हैं, “खेती मेहनत का काम नहीं, किस्मत का खेल हो गया है। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी तेज़ गर्मी, कभी बेमौसम बारिश। समझ ही नहीं आता कि क्या बोएं।” अनोज बताते हैं, “खेती की शुरुआत धान, गेहूं और मक्का से की थी। एक समय था जब एक बीघा खेत में 8-10 क्विंटल धान बिना ज़्यादा लागत के ऊपज जाता था। न रासायनिक खाद की जरूरत पड़ती थी न कीटनाशक दवा की। अब 14-15 क्विंटल उपज के बावजूद लागत भी नहीं निकल पाती क्योंकि लागत काफी बढ़ गई है।”


अनाज की खेती में अनिश्चितता के चलते अनोज फल उगाने पर जोर दे रहे हैं। वह अब अनाज उगाने के साथ साथ आम, नींबू, केला, अमरूद और लीची की खेती कर रहे हैं।

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अनोज की तरह बालमुकुंद पांडे भी पहले गेहूं, मक्का और दाल उगाते थे। अब उनके खेत में नींबू, केला, पपीता और आंवला हैं। उन्होंने कहा, “पहले वार्षिक दो-ढाई लाख बचते भी नहीं थे। अब 5 एकड़ से 7-8 लाख रुपये तक आमदनी हो जाती है जबकि सारा काम मजदूरों से होता है।”


समस्तीपुर जिले के ताजपुर कोटिया निवासी संजय सिंह मिक्स फ्रूट की खेती कर रहे हैं। उनके बगीचे में अमरूद, केला, नींबू, बेर, लीची, आम के साथ सब्जियों की भी खेती होती है। “20 एकड़ में फैले बगीचे से सालाना 50-55 लाख रुपये का टर्नओवर और 20-25 लाख रुपये की शुद्ध बचत होती है,” संजय सिंह कहते हैं, “बदलते मौसम में 15-20 दिन आगे चलकर खेती करना जरूरी है, तभी मुनाफा संभव है।”

वित्तवर्ष 2023-2024 में बिहार में 42.7 हेक्टेयर में केले की खेती हुई जिससे 1903 टन केले का उत्पादन हुआ। वहीं, समस्तीपुर की बात करें, तो यहां 2.41 हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों ने केले की खेती की, जिससे 111.34 टन केला उत्पादित हुआ, जो राज्य के कुल उत्पादन का 5.9% है। इसी तरह, राज्य में 29.38 हेक्टेयर में 455.39 टन अमरूद का उत्पादन हुआ। वहीं, समस्तीपुर में 11.40 टन अमरूद का उत्पादन दर्ज किया गया, जो राज्य के कुल उत्पादन का 2.5% है।

fruit farmer anoj roy
समस्तीपुर के किसान अनोज राय

आंकड़े बताते हैं कि राज्य के 39.21 हेक्टेयर क्षेत्र में लीची की खेती की गई, जहां से 345.05 टन लीची का उत्पादन हुआ। इसमें से 17.46 टन लीची का उत्पादन अकेले समस्तीपुर में हुआ, जो कुल उत्पादन का 5.1% है। आम की बात करें, तो बिहार में कुल 1926.00 टन आम का उत्पादन हुआ, जिसमें से 6.7 प्रतिशत हिस्सेदारी समस्तीपुर की रही। समस्तीपुर में कुल 29.60 टन आम का उत्पादन हुआ।

मौसम में बदलाव

अनाज की जगह फलों की खेती की तरफ किसानों का रुझान बढ़ने के पीछे मुख्य वजह मौसम में आया अप्रत्याशित बदलाव है।

अनोज कहते हैं, “पहले मौसम अनुमान के मुताबिक चलता था। बरसात समय पर आती थी, सर्दी लंबी रहती थी। गर्मी सहने लायक होती थी। अब सब उल्टा पुल्टा हो गया है। इस बदले हुए मौसम ने किसानों को अपने फैसले बदलने पर मजबूर किया है।”

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू) के कृषि मौसम विज्ञान विभाग द्वारा 2020 से 2025 के बीच दर्ज मौसम आंकड़ों के अनुसार, समस्तीपुर जिले में तापमान, आर्द्रता और धूप के पैटर्न में बदलाव आया है। इस अवधि में औसत अधिकतम तापमान में लगभग 1.9 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान में करीब 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही, वर्षा वितरण में असमानता बढ़ी है, जबकि धूप वाले दिनों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है।

मौसम की इन परिस्थितियों ने आम, लीची, केला, पपीता और अमरूद जैसे फलों में प्रकाश संश्लेषण और शर्करा संचय को बढ़ावा दिया है, जिससे फलों की गुणवत्ता और मिठास में सुधार देखा गया है।

आरपीसीएयू के मौसम अध्ययन और विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, प्रातःकालीन उच्च सापेक्षिक आर्द्रता (89-92 प्रतिशत) और 18 से 31 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहने वाला औसत तापमान फल फसलों में फूल आने, परागण और फल सेट के लिए अनुकूल सिद्ध हुआ है। वहीं, कम लेकिन रुक-रुक कर हुई बारिश से मिट्टी में वातन (aeration) और सूक्ष्मजीवी गतिविधि बढ़ी, जिससे जड़ों की सक्रियता और पोषक तत्व अवशोषण में सुधार हुआ। यही कारण है कि समस्तीपुर के किसान पारंपरिक फसलों की बजाय फल खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।

a litchi orchard in samastipur
समस्तीपुर में लीची का बाग

नुकसान की भरपाई के लिए बीमा नहीं

किसान फलों की खेती की तरफ मुड़े हैं, लेकिन उनकी कुछ चिंताएं भी हैं। मसलन कि फलों के लिए बीमा नहीं होना।

गौरतलब हो कि बिहार में चरम मौसमी गतिविधियों में इजाफा हुआ है, जिससे फल किसानों को कभी कभी भारी नुकसान हो जाता है, लेकिन फलों के लिए बीमा का प्रावधान नहीं है।

अनोज राय कहते हैं, “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत धान-गेहूं मक्का का बीमा है, लेकिन फल की खेती बीमा से बाहर है। और ना ही राज्य सरकार की फसल सहायता योजना में इसे शामिल किया गया है। अगर कीटों के हमले या चरम मौसमी गतिविधि से बाग उजड़ गया तो किसान कहां जाएगा?”

वहीं, संजय सिंह कहते हैं, “सारी योजनाएं फसली खेती को केंद्रित कर बनाई जाती है, बागवानी के लिए कहीं से रास्ता नहीं दिखता।”

फल किसानों की चिंता केवल फलों के नुकसान पर मुआवजा नहीं मिलना ही नहीं है। कोल्ड स्टोरेज का भी अभाव है, जिस कारण किसान ज्यादा दिनों तक पके फलों को रख नहीं सकते हैं, नतीजतन कई बार कम कीमत पर भी उन्हें फलों को बेच देना पड़ता है, जिससे उनके मुनाफे की मार्जिन कम हो जाती है। इन वजहों से बहुत सारे किसान अब भी फलों की खेती की तरफ रुख करने से कतरा रहे हैं। इसके अलावा दूसरी समस्या ये है कि ज्यादातर किसानों के पास जमीन कम है। ऐसे में अगर वे फलों की खेती करेंगे, तो अनाज कहां से लायेंगे?

बालमुकुंद बताते हैं, “समस्तीपुर के 80-90% किसान छोटे जोत वाले हैं। उनके लिए बागवानी एक ‘महंगा दांव’ है, क्योंकि फल आने में समय लगता है और शुरुआती लागत बहुत ज्यादा है। यह रास्ता हर किसान के लिए आसान नहीं है। नुकसान की भरपाई का कोई पुख्ता सुरक्षा कवच नहीं है। बागवानी ना तो फसल सुरक्षा में है, और ना तो फसल बीमा में। ग्रुप फार्मिंग, क्लस्टर खेती, यह सब कागजी बातें हैं धरातल पर यह शायद ही दिखता है।”

balmukund pandey in his lemon orchard
बालमुकुंद पांडे अपने नींबू के बगीचे में

हालांकि, बागवानी कीट-रोग प्रबंधन योजना के तहत छिड़काव खर्च पर 75 प्रतिशत का अनुदान दिया जाता है।

समस्तीपुर जिला उद्यान पदाधिकारी, डॉ. तारिक असलम ने कहा, “बागवानी कीट-रोग प्रबंधन योजना के तहत बिहार सरकार, आम, लीची, अमरूद, केला और पपीता जैसे फलों पर छिड़काव खर्च पर 75 प्रतिशत अनुदान देती है। वहीं, एकीकृत बागवानी मिशन के माध्यम से फलदार पौधों के रोपण और देखभाल पर 50 से 75 प्रतिशत तक सहायता उपलब्ध है।”

जानकार बताते हैं कि फलों की खेती फिलहाल मुनाफा दे रही है, लेकिन ये जलवायु परिवर्तन का दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकती है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा) के कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर एस. के. सिंह कहते हैं कि बागवानी जलवायु परिवर्तन के दौर में एक विकल्प हो सकती है, समाधान नहीं। “फल की खेती में लाभ है, लेकिन मौसम की मार, बाजार और भंडारण की तैयारी के बिना यह बड़ा जोखिम बन सकती है। छोटे किसानों के लिए मिश्रित खेती ज्यादा सुरक्षित मॉडल है,” उन्होंने कहा।

फलों की खेती करने वाले किसान भी ये समझने लगे हैं। अनोज राय, बागवानी को बेहतर आमदनी के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं, लेकिन बाज़ार सुरक्षा और बीमा नहीं होने के कारण उनमें एक डर भी है। ऐसे में सवाल ये है कि सरकार इस डर को खत्म करने के लिए कोई ठोस कदम उठाती है या किसानों को उनके हाल पर छोड़ देती है।

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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रामजी कुमार बिहार के समस्तीपुर ज़िले के एक कृषि पत्रकार हैं और उन्हें पत्रकारिता में छह वर्ष से अधिक का अनुभव है। वे वर्तमान में ‘कृषि जागरण’ से जुड़े हैं और कृषि, किसानों, जलवायु परिवर्तन, ग्रामीण आजीविका तथा ऊर्जा से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

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