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बिहार में जीवित पेंशनधारियों को मृत बता कर पेंशन रोका जा रहा है?

कटिहार जिले में ज़ैतून निशां जैसी बुज़ुर्ग विधवा महिलाओं को सरकारी दस्तावेजों में मृत दिखाकर उनकी पेंशन रोक दी गई है, जबकि वे जिंदा हैं और बीते लोकसभा चुनाव में वोट तक डाल चुकी हैं।

Tanzil Asif is founder and CEO of Main Media Reported By Tanzil Asif |
Published On :
in bihar, the pension of living pensioners is being stopped by declaring them dead

ज़ैतून निशां बिहार के एक गाँव में सामान्य रूप से अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं। लेकिन, सरकार ये नहीं मानती। सरकारी तंत्र की मानें तो जैतून मृत हैं।


मामला कटिहार जिले के कदवा प्रखंड का है, जहां चन्दहर पंचायत निवासी ज़ैतून को हर महीने विधवा पेंशन के रूप में 400 रुपये मिलते थे। कई साल पहले उनके पति का देहांत हो चुका है, और तब से वे लक्ष्मीबाई सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के तहत मिल रही इस सहायता पर निर्भर थीं।

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बिहार में लक्ष्मीबाई सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की विधवाओं को राज्य सरकार पेंशन देती है। इस योजना का लाभ उन आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को मिलता है जिनकी वार्षिक पारिवारिक आय 60,000 रुपये से कम हो।


सरकारी कागज़ों में मृत

सरकार के ई-लाभार्थी पोर्टल elabharthi.bihar.gov.in पर जब हमने ज़ैतून का आधार कार्ड नंबर डाला। लाभार्थी की वर्त्तमान स्थिति के नीचे लिखा आया “लाभार्थी का पेंशन स्टॉप किया गया है।” उसी के आगे अगले कॉलम में हटाने का कारण में बताया गया है “सत्‍यापन/जांच के समय लाभार्थी का मृत पाया जाना।”

उनके परिवार में बस एक बेटी है जिसकी शादी हो गई है। अकेले होने के कारण ज़ैतून सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने में असमर्थ हैं।

तरस खाइये उस सिस्टम पर जिससे चलती-फिरती एक बुज़ुर्ग विधवा मृत नज़र आ जाती है। लेकिन वोट लेने के लिए वही महिला वापस जीवित हो जाती है। जैतून का नाम बाकायदा मतदाता सूची में दर्ज है और बीते लोकसभा चुनाव में उन्होंने वोट भी किया है। इतना ही नहीं वो हर महीने सरकार को अपने फिंगर प्रिंट के सहारे सरकारी राशन भी लेती हैं, लेकिन सरकार ने आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में ऐसी क्या जांच करवायी होगा, जिससे जैतून मृत पाई गईं?

हालांकि ज़ैतून अकेली नहीं है। कुछ दिनों पहले हमने कटिहार जिले के आजमनगर प्रखंड अंतर्गत मुकुरिया पंचायत के जितवारपुर गांव में रहने वाली शेहरून खातून की कहानी सामने लाई थी, जिनके साथ भी यही हुआ है।

सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे बुज़ुर्ग

चन्दहर के ही रहने वाले अजीमुद्दीन मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना का लाख उठाते हैं। बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना के तहत 60 से 79 साल की आयु के वृद्धों को हर महीने 400 रुपये और 80 साल या उससे अधिक आयु के वृद्धों को 500 रुपये पेंशन के रूप में मिलते हैं।

करीब तीन साल पहले अजीमुद्दीन को भी मृतक घोषित कर दिया गया था। स्थानीय नेताओं की मदद से उन्होंने सरकारी दफ्तरों की दौड़ लगाई, जिससे तीन सालों में बात सिर्फ इतनी आगे बढ़ी कि अब ई-लाभार्थी पोर्टल पर लाभार्थी की वर्त्तमान स्थिति में लिखा आ रहा है कि “ब्लॉक से सत्यापन हो चुका है।” लेकिन इस सत्यापन के बाद भी कुछ अधिकारियों के लिए शायद अजीमुद्दीन के ज़िंदा होने की बात पर भरोसा नहीं है। इसलिए लाभार्थी का जीवन प्रमाणीकरण स्थिति में अब भी लिखा है – “लाभार्थी का जीवन प्रमाणीकरण सत्यापित नहीं हुआ है।”

स्थानीय कांग्रेस नेता इमाम जाफर अपने क्षेत्र के ऐसे लोगों को वापस पेंशन दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। उन्होंने इस समस्या के लिए पंचायत और प्रखंड स्तर के अधिकारियों की उदासीनता को जिम्मेदार ठहराया। उनके अनुसार, सिर्फ चंदहर पंचायत में ही दर्जनों जीवित लोगों को पेंशन सूची में मृत घोषित कर दिया गया है।

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तंजील आसिफ एक मल्टीमीडिया पत्रकार-सह-उद्यमी हैं। वह 'मैं मीडिया' के संस्थापक और सीईओ हैं। समय-समय पर अन्य प्रकाशनों के लिए भी सीमांचल से ख़बरें लिखते रहे हैं। उनकी ख़बरें The Wire, The Quint, Outlook Magazine, Two Circles, the Milli Gazette आदि में छप चुकी हैं। तंज़ील एक Josh Talks स्पीकर, एक इंजीनियर और एक पार्ट टाइम कवि भी हैं। उन्होंने दिल्ली के भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) से मीडिया की पढ़ाई और जामिआ मिलिया इस्लामिआ से B.Tech की पढ़ाई की है।

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