गंगा नदी के विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य के किनारे बसे कहलगांव के मलदह गांव में रात का अंधेरा निस्तब्धता नहीं, ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट और जेसीबी की गरज लाता है। इन दैत्याकार उपकरणों की मदद से गंगा से अवैध तरीके से रेत का खनन किया जाता है।
स्थानीय मछुआरे रामाश्रय मंडल बताते हैं, “रात में बालू निकालने वाला ट्रैक्टर नदी पर उतर जाता है और पुलिस के आने से पहले सब गायब हो जाता है।” वह हमें खनन माफियाओं द्वारा गंगा नदी में किये जा रहे अंधाधुंध रेत खनन के बारे में बता रहे हैं।
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“हमलोग नाव नहीं ले जा सकते हैं नदी में, क्योंकि अवैध खनन से नदी की धारा ही बदल गई है,” उन्होंने कहा। हालांकि ये समस्या सिर्फ रामाश्रय मंडल के गांव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बिहार की ज्यादातर नदियों पर रेत माफिया का कब्जा है।
गौरतलब हो कि बिहार में कुल 8 बारहमासी (साल भर बहने वाली) व करीब 600 मौसमी नदियां बहती हैं। बारहमासी नदियों में गंगा, कोसी, गंडक, बागमती, कमला-बलान, महानंदा आदि शामिल हैं। ये नदियां बिहार के लिए जीवन रेखा का काम करती हैं, लेकिन इनमें हो रहे अवैध रेत खनन के चलते इन नदियों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। साथ ही इससे पर्यावरणीय संकट भी पैदा हो रहा है।
प्रशासनिक ढील और रेत माफिया की ताकत
अवैध खनन पर रोक के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम- 1986 और खनिज विकास व विनियमन अधिनियम- 1957 लागू है मगर जमीन पर इसका असर नहीं है।
अवैध खनन रोकने के लिए बिहार सरकार की तरफ से समय समय पर अभियान भी चलाया जाता है, लेकिन इसका भी कोई खास असर अवैध खनन पर नहीं पड़ा है। जिला स्तर पर खनन बंदोबस्त समितियां बनती हैं, लेकिन इनके जरिए निगरानी की व्यवस्था लगभग निष्क्रिय है।
2025 में आर्थिक अपराध इकाई ने 13 जिलों में रेत माफिया के नेटवर्क की सूची बनाई थी, जिसमें भागलपुर का नाम प्रमुख रूप से शामिल था।
आर्थिक अपराध इकाई की रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि यहां रेत खनन में राजनीतिक संरक्षण और संगठित अपराध का गहरा जाल फैला है। खनन विभाग के अनुसार, बिहार में लगभग 300 घाट अधिकृत हैं, लेकिन ईमानदारी से काम करने वाले लाइसेंसधारियों को भी माफिया की धमकियों का सामना करना पड़ता है। अगस्त 2025 तक राज्य भर में 700 से ज़्यादा गाड़ियां जब्त की गईं, मगर भागलपुर जिले में कार्रवाई का असर सीमित रहा।
रेत, नदी की प्राकृतिक संरचना को थामने वाली परत होती है। लेकिन अवैध खनन ने नदी तल को इतना खोखला कर दिया है कि कई इलाकों में जलधारा का रुख बदल गया है। कुछ स्थानों पर नदी का प्रवाह तेज़ होने के कारण तटबंध टूटने की घटनाएं बढ़ गई हैं। रेत खत्म होने से भूजल स्तर गिर रहा है, जिससे खेतों की सिंचाई पर असर पड़ रहा है। मछलियों, पक्षियों और जलीय जीवों का पारिस्थितिकी तंत्र बर्बाद हो रहा है।
डॉल्फिन के अस्तित्व पर संकट
बिहार पहले से ही जलवायु जोखिम वाला राज्य माना जाता है। एक ओर तापमान में वर्ष दर वर्ष वृद्धि हो रही है, तो दूसरी ओर मानसून की अनिश्चितता और बाढ़ का चक्र तेजी से बदल रहा है। अवैध रेत खनन से नदियों की जल संचय क्षमता घटती जा रही है, जिससे बाढ़ के समय जल का फैलाव बढ़ रहा है। दूसरी तरफ, जब सूखा पड़ता है, तो नदी तल में पानी टिक नहीं पाता, जिससे सूखे इलाकों में जल संकट और बढ़ जाता है। यह दोहरी मार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कई गुना बढ़ा देती है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (पटना) की एक रिपोर्ट (2023-25) बताती है कि रेत खनन ने गंगा नदी की गहराई और प्रवाह दिशा में खतरनाक बदलाव किया है।
अत्यधिक उत्खनन से नदी तल में 3 मीटर तक की गहराई बढ़ी है, जिससे नदी किनारे के गांवों में कटाव की घटनाओं में 28% तक का इजाफा हुआ है।
जल विशेषज्ञ दीनानाथ मिश्र कहते हैं, “रेत नदी के लिए फिल्टर की तरह काम करती है। जब उसे निकाल दिया जाता है, तो नदी खुद अपनी मिट्टी काटने लगती है। भागलपुर में यही हो रहा है।”
भागलपुर का विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य भारत का इकलौता मीठे पानी का डॉल्फिन संरक्षित क्षेत्र है, जो गंगा की लगभग 50 किलोमीटर लंबी पट्टी में फैला हुआ है। लेकिन अवैध रेत खनन ने डॉल्फिन, कछुआ, जलीय पक्षी और मछलियों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के वैज्ञानिक गोपाल शर्मा के मुताबिक, डॉल्फिन के भोजन और प्रजनन क्षेत्र बालू खनन की वजह से तबाह हो रहे हैं। गंगा की प्राकृतिक गहराई और प्रवाह में बदलाव से उनका पारिस्थितिकी चक्र टूट गया है।”
आंकड़े बताते हैं कि डॉल्फिन अभयारण्य क्षेत्र में अब केवल 150–155 डॉल्फिन ही शेष बचे हैं, जबकि एक दशक पहले यह आंकड़ा करीब 250 था। जलजीव विशेषज्ञ तरुण नायर की टीम के अध्ययन के अनुसार, रेत निकासी वाले घाटों के पास डॉल्फिन की उपस्थिति 70% कम हो गई है, क्योंकि मशीनों के शोर और रासायनिक जोखिम ने उनके भोजन स्रोत (छोटी मछलियों) को खत्म कर दिया है।
जिला खनिज विकास पदाधिकारी महेश्वर पासवान ने कहा, “गेरुआ नदी का यूनिट-2 बालू घाट को, जो गंगा डॉल्फ़िन अभयारण्य के नजदीक स्थित है, पर्यावरणीय स्वीकृति न मिलने के कारण फिलहाल बंद रखा गया है। जिले में कुल 11 बालू घाट हैं, जिनमें से दो वर्तमान में संचालित हैं, चार की बंदोबस्ती प्रक्रिया जारी है और पांच पूरी तरह बंद हैं।”
स्थानीय समुदाय पर प्रभाव
कहलगांव, नवगछिया, और सुल्तानगंज के आसपास हजारों लोग मछली पकड़ने और नाव परिवहन पर निर्भर हैं। लेकिन, अब गंगा की धारा में बने गहरे गड्ढों और अनियमित प्रवाह से छोटी नाव डूबने लगी है। स्थानीय नाविक सुब्रत मंडल बताते हैं, “पहले नाव से नदी पार करने में दस मिनट लगते थे। अब बीच में बालू का गड्ढा और गहराई इतनी है कि नाव का संतुलन बिगड़ जाता है। फिर सोचिए, डॉल्फिन कैसे बचेगी?”
खनन माफिया इस हद तक दुस्साहसी हो गये हैं कि वे सरकारी प्रतिबंधों को भी नहीं मानते हैं। सरकार मानसून के सीजन में जून से सितंबर तक बालू खनन पर रोक लगाती है ताकि पारिस्थितिकी को नुकसान नहीं पहुंचे। इस साल भी मानसून में रोक थी, मगर अवैध खनन जारी रहा। भागलपुर जिले में कम से कम 47 अवैध घाटों पर लगातार बालू का खनन हुआ। इनमें से अधिकांश गंगा के दक्षिणी तट पर थे।
खनन विभाग ने हाल ही में भागलपुर में दो सदस्यीय जांच समिति गठित की है, जो लाइसेंसधारी डंप साइटों और परिवहन की वास्तविकता की जांच कर रही है।
अवैध खनन का असर न सिर्फ नदी पर, बल्कि पूरे गंगा बेसिन के जलवायु संतुलन पर पड़ रहा है। भारतीय पर्यावरण मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट बताती है कि गंगा क्षेत्र में कटाव और सूखापन दोनों में वृद्धि हुई है, जिससे माइक्रो-क्लाइमेट बदल रहा है और आसपास के क्षेत्रों में औसत तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है ।
क्या कहते हैं जानकार
भागलपुर के पर्यावरण कार्यकर्ता शशांक भारती कहते हैं, “जब तक सरकार रेत को केवल राजस्व का स्रोत मानती रहेगी, तब तक गंगा सिर्फ कागज़ पर जीवित रहेगी। जरूरत है नदी पारिस्थितिकी को विकास के केंद्र में लाने की।”
विशेषज्ञ डॉ. सत्यप्रकाश सिंह (भारतीय जल संसाधन संस्थान) और डॉ. अशोक कुमार (बिहार पर्यावरण परिषद) का कहना है कि प्रत्येक घाट पर ड्रोन और जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) से मॉनिटरिंग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। “साथ ही, स्थानीय मछुआरों और पंचायतों को निगरानी समिति में शामिल करना जरूरी है। इसके अलावा बालू के वैकल्पिक स्रोतों (फ्लाई ऐश, क्रश्ड स्टोन डस्ट) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए व नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करने और जल स्तर बनाए रखने पर जोर देना चाहिए। इन सुझावों के सफल कार्यान्वयन से ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और स्थायी विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा,” उन्होंने कहा।
अवैध रेत खनन पर कार्रवाई को लेकर जिला खनिज विकास पदाधिकारी महेश्वर पासवान ने बताया कि इसे रोकने के लिए लगातार छापेमारी अभियान चलाए जा रहे हैं और बालू घाटों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, ताकि 24×7 निगरानी रखी जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि अवैध खनन में पकड़े जाने पर संबंधित लोगों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाती है।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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